India Afghanistan Policy Taliban तालिबान से क्या बनेगी भारत की बात?
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तालिबान से क्या बनेगी भारत की बात?

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India Afghanistan Policy Taliban अच्छा है कि भारत ने सही समय पर वार्ता शुरू कर दी और आगे बातचीत का रास्ता खुला रखा। लेकिन अब भारत को मजबूत खुफिया तंत्र के साथ इस पर नजर रखनी होगी कि तालिबान की सरपरस्ती में फलने-फूलने वाले अलकायदा, इस्लामिक स्टेट, लश्कर ए तैयबा और जैश ए मोहम्मद जैसे आतंकवादी संगठन क्या करते हैं। अलकायदा ने फिलस्तीन, लेवांत, सोमालिया आदि इस्लाम की जमीन को दुश्मनों से मुक्त कराने की बात कही तो उसमें कश्मीर का भी जिक्र किया।

यह लाख टके का सवाल है कि भारत ने तालिबान के साथ जो वार्ता शुरू की है वह किसी मुकाम तक पहुंचेगी या दो-चार दिन की सनसनी बन कर रह जाएगी? घरेलू राजनीति में तो सनसनी बनाने के लिए कुछ घटनाक्रम रचे जाते हैं लेकिन आमतौर पर कूटनीति में कोई भी काम सनसनी बनाने के लिए नहीं किया जाता है। तभी उम्मीद करनी चाहिए कि अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जा करने से पहले भारत ने परदे के पीछे जो वार्ता शुरू की थी, कतर में हुई आधिकारिक वार्ता उसकी ही परिणति हो! अगर ऐसा है तो यह संभावना बनती है कि आने वाले दिनों में भारत और तालिबान के बीच दोस्ती न भी हो तब भी कामचलाऊ संबंध बने रहेंगे और दोनों एक-दूसरे के हितों को नुकसान पहुंचाने से बचेंगे। परंतु दोनों के बीच कामचलाऊ संबंध का भी बने रहना कई ऐसी परिस्थितियों पर निर्भर करेगा, जो हो सकता है कि इन दोनों के वश में भी नहीं हों। इसलिए भारत को बातचीत शुरू होने के बाद भी बहुत सावधानी से आगे बढ़ना होगा। भारत की मौजूदा सरकार को घरेलू राजनीतिक कारणों से भी तालिबान के साथ संबंधों में बहुत सावधानी बरतनी पड़ेगी।

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कह सकते हैं कि भारत ने बहुत सही समय पर तालिबान के साथ वार्ता शुरू की है। संयुक्त राष्ट्र संघ में एक प्रस्ताव के जरिए थोड़े समय पहले तक आतंकवादी संगठन के रूप में सूचीबद्ध किए गए तालिबान के साथ भारत का बातचीत शुरू करना इस बात का संकेत है कि भारत ने इस हकीकत को स्वीकार कर लिया है कि अफगानिस्तान में तालिबान का शासन आ गया है और वे भारत के इस पड़ोसी देश के वैध शासक होंगे। जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने पिछले दिनों कहा था- इस तथ्य की अनदेखी नहीं करनी होगी कि अफगानिस्तान में तालिबान का शासन आ गया है। इसलिए यह बहस का विषय नहीं होना चाहिए कि तालिबान का शासन अमेरिका के साथ हुए समझौते की वजह से आया है या तालिबान ने ताकत के दम पर कब्जा किया है। जैसे भी किया उसने कब्जा कर लिया और देर-सबेर दुनिया के देश उसे मान्यता देंगे। संयुक्त राष्ट्र संघ ने उसे मान्यता देने की पहल कर भी दी है, जिसमें भारत भी शामिल है। आखिर सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष के नाते भारत के दस्तखत से यह प्रस्ताव मंजूर हुआ कि अफगानिस्तान दूसरे देशों में सक्रिय आतंकवादी समूहों को समर्थन नहीं देगा। इसका मतलब है कि अफगानिस्तान में तालिबान के शासन को स्वीकार कर लिया गया और जब एक बार उसका अस्तित्व मंजूर कर लिया गया तो कूटनीति का सिद्धांत कहता है कि किसी भी देश को प्राकृतिक रूप से अपना शत्रु नहीं मानना चाहिए।

India Afghanistan Policy Taliban

इसी कूटनीतिक सिद्धांत का पालन करते हुए भारत ने तालिबान से वार्ता शुरू की है। यह सही है कि तालिबान के राजनीतिक कार्यालय के प्रतिनिधि शेर मोहम्मद अब्बास स्टैनकजई कतर में भारत के दूतावास में पहुंचे और वहां भारत के राजदूत दीपक मित्तल से बातचीत की। यह संभव नहीं है कि स्टैनकजई ने अपनी पहल पर बात की या एक दिन अचानक उठे और भारतीय दूतावास पहुंच गए वार्ता करने के लिए। भारत ने इस पर विचार किया होगा और मंजूरी दी होगी तभी वे वार्ता के लिए पहुंचे थे। अच्छी बात यह है कि स्टैनकजई भारत में रहे हैं। वे देहरादून के इंडियन मिलिट्री एकेडमी के कैडर रहे हैं। भारत को जानते हैं और कूटनीति भी जानते हैं। तालिबान के पहले शासन में यानी 1996 से 2001 के बीच वे अफगानिस्तान के उप विदेश मंत्री थे।

उन्होंने चीन, उज्बेकिस्तान, इंडोनेशिया, अमेरिका आदि देशों के साथ वार्ता में हिस्सा लिया और दक्षिण एशिया की भू-राजनीति के साथ साथ वैश्विक कूटनीति की बारीकियों को भी जानते हैं। तालिबान के काबुल पहुंचने से पहले ही स्टैनकजई ने भारत से संपर्क किया था और अपने संपर्कों के जरिए भारत को दूतावास खाली नहीं करने का संदेश भेजा था। उन्होंने भारतीय राजदूत से वार्ता में भी भरोसा दिलाया कि अफगानिस्तान अपनी जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ नहीं होने देगा और भारत के साथ कूटनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध रखना चाहता है।

तालिबान ने इस तरह का वादा फरवरी 2020 में हुए कतर समझौते में भी किया है। अमेरिका के साथ हुए इस समझौते पर अमेरिकी प्रतिनिधि जालमय खलीलजाद और तालिबान की ओर से उसके दूसरे सर्वोच्च नेता मुल्ला अब्दुल गनी बरादर ने दस्तखत किए हैं। उसमें भी तालिबान ने वादा किया है कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल दूसरे देशों के खिलाफ नहीं होने देगा। हालांकि उसके इस वादे पर पूरी तरह से यकीन करने का कोई कारण नहीं है। अमेरिका के शीर्ष सैन्य अधिकारी जनरल मार्क मिल्लै ने भी कहा है कि तालिबान एक क्रूर संगठन है और उसके बहुत बदलने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। इसके बावजूद उसके साथ बातचीत करते रहना इसलिए जरूरी है ताकि उस पर कतर समझौते या भारत के साथ किए गए वादे को पूरा करने का दबाव बनाए रखा जा सके। इस मामले में अपनी सीमाओं की सुरक्षा को मजबूत बनाते हुए, अपने खुफिया तंत्र को बेहतर बनाते हुए और भारत व तालिबान के साझा दोस्तों के साथ संपर्क रखते हुए भारत आगे बढ़ सकता है।

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भारत और तालिबान के साझा दोस्तों में चार देशों का नाम लिया जा सकता है। रूस और ईरान ऐसे देश हैं, जिनके साथ भारत के अच्छे संबंध हैं और तालिबान से भी इनके संबंध बेहतर हैं। इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब भी दोनों देशों के साझा दोस्त हैं। इन देशों को बीच में रखते हुए भारत तालिबान के साथ वार्ता भी कर सकता है, एक स्तर पर कूटनीतिक संबंध भी स्थापित कर सकता है और दोपक्षीय कारोबार भी शुरू कर सकता है। हालांकि एक कूटनीति दुश्मन के दुश्मन को दोस्त बनाने की भी होती है लेकिन उसका समय अब निकल गया है। अगर पूरे अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे से पहले भारत ने पंजशीर के लड़ाकों की मदद की होती, अमीरूल्ला सालेह पर दांव खेला होता या इस्लामिक स्टेट खुरासान की मदद करके उनको तालिबान से लड़ने में लगाया होता तो कुछ बात बन सकती थी। भारत अमेरिका को इस बात के लिए तैयार कर सकता था कि वह अपनी सेना को स्टैंडबाई मोड में रखे और अफगानी फौज की मदद के लिए भारत अपनी सेना भेजता तब भी कोई बात बन सकती थी। लेकिन उसका समय निकल गया है।

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अब भारत के पड़ोसी देश तालिबान को मान्यता देने को तैयार बैठे हैं, संयुक्त राष्ट्र संघ मान्यता देने को तैयार है, अमेरिका खुफिया एजेंसी के प्रमुख काबुल जाकर तालिबान से वार्ता कर रहे हैं, अमेरिका के शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने कतर में वार्ता की तो उसके बाद भारत के पास क्या विकल्प बचता है! सो, अच्छा है कि भारत ने सही समय पर वार्ता शुरू कर दी और आगे बातचीत का रास्ता खुला रखा। लेकिन अब भारत को मजबूत खुफिया तंत्र के साथ इस पर नजर रखनी होगी कि तालिबान की सरपरस्ती में फलने-फूलने वाले अलकायदा, इस्लामिक स्टेट, लश्कर ए तैयबा और जैश ए मोहम्मद जैसे आतंकवादी संगठन क्या करते हैं। अलकायदा ने फिलस्तीन, लेवांत, सोमालिया आदि इस्लाम की जमीन को दुश्मनों से मुक्त कराने की बात कही तो उसमें कश्मीर का भी जिक्र किया। जाहिर है तालिबान के सत्ता में आने से आतंकवादी संगठनों के हौसले बुलंद हैं और वे कश्मीर की तरफ बढ़ेंगे। उन्हें रोकने का पुख्ता कूटनीतिक और सामरिक बंदोबस्त भारत को करना होगा। इसके साथ ही पाकिस्तान के ऊपर स्थायी रूप से दबाव बनाए रखना होगा ताकि वह अपने छद्म युद्ध के लिए इन आतंकवादी संगठनों का इस्तेमाल न कर पाए। भारत को तालिबान से ज्यादा खतरा पाकिस्तान का है। तालिबान के पिछले शासन में भी पाकिस्तान ने पैसे देकर उनके भाड़े के आतंकियों को घाटी में भेजा था। India Afghanistan Policy Taliban

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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