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राणा अयूब को क्यों मलाला बनाना?

भारत के ज्यादातर पढ़े-लिखे लोग भी राणा अयूब को नहीं जानते हैं। वे अमेरिकी अखबार ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ में कॉलम लिखती हैं और नरेंद्र मोदी सरकार की घोषित आलोचक हैं। ऐसे ही आतिश तासीर को भी देश के ज्यादातर लोग नहीं जानते हैं। वे पत्रकार हैं और तवलीन सिंह के बेटे हैं। तवलीन सिंह भी पत्रकार हैं और कांग्रेस, खासकर सोनिया गांधी परिवार की घनघोर आलोचक हैं। एक जमाने में वे नरेंद्र मोदी की समर्थक रही हैं। इन दिनों वे मोदी सरकार की नीतियों के विरोध में लिखती हैं, इसके बावजूद सोनिया गांधी के परिवार के प्रति उनकी नफरत कम नहीं हुई है। आकार पटेल को भी देश के ज्यादातर लोग नहीं जानते हैं। वे भी स्तंभकार हैं और एमनेस्टी इंडिया के प्रमुख रहे हैं। इन तीन नामों- राणा अयूब, आतिश तासीर और आकार पटेल में क्या समानता है? ये तीनों ऐसे पत्रकार हैं, जिनके खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों ने कार्रवाई की है और उस कार्रवाई की सुर्खियां पूरी दुनिया में बनी हैं। पूरी दुनिया के मीडिया संस्थान और यहां तक की सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाएं भी इनके समर्थन में उतरी हैं। इनके खिलाफ हुई कार्रवाई ने दुनिया की नजरों में भारत के लोकतंत्र का मान घटाया है। इन पर हुई कार्रवाई की वजह से दुनिया में यह धारणा बनी है कि भारत एक असहिष्णु और प्रेस की आजादी खत्म करने वाला देश बन गया है।

क्या ये तीनों इतने महत्वपूर्ण हैं या इनके लिखे से सचमुच भारत की सरकार या एक देश के नाते भारत की छवि खराब हो रही थी, जो इनके खिलाफ इतनी शिद्दत से कार्रवाई की गई? ये लोग जो लिख रहे हैं उसे पढ़ने वालों की संख्या बहुत मामूली है और उससे प्रभावित होने वालों की संख्या तो और भी कम है। अगर सरकार यह सोचती है कि इनके लिखने या बोलने से दुनिया में भारत की छवि खराब हो रही है तो यह सरासर गलतफहमी है। किसी भी देश या सरकार के बारे में धारणा किसी पत्रकार या स्तंभकार के लिखने से नहीं बनती है। सरकारों के बारे में धारणा उसके कामकाज से बनती है। राणा अयूब, आतिश तासीर और आकार पटेल के लिखने-बोलने से भारत सरकार की जितनी छवि नहीं खराब हुई उससे ज्यादा खराब इनके ऊपर कार्रवाई करने के काम से हुई है।

राणा अयूब क्या लिखती हैं यह ज्यादातर लोगों को पता नहीं है लेकिन इस बात की चर्चा पूरी दुनिया में हुई कि ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ ने उनके समर्थन में एक पन्ने का विज्ञापन प्रकाशित किया। इस अमेरिकी अखबार ने ‘कोएलिशन अगेंस्ट ऑनलाइन वायलेंस’ के साथ मिल कर ‘वाशिंगटन पोस्ट प्रेस फ्रीडम पार्टनरशिप’ के तहत पूरे पन्ने का बयान जारी किया। इसमें कहा गया है, ‘तकरीबन हर दिन राणा अयूब को हिंसा और मौत की धमकियां मिलती हैं। वो पक्षपातपूर्ण जांच और ऑनलाइन उत्पीड़न का निशाना बन रही हैं। परोपकार कार्यों से जुड़े उनके बैंक खाते को सील कर दिया गया। पत्रकारों को अभियोजन और बदनामी से नहीं डरना चाहिए’। क्या यह पढ़ कर अफगानिस्तान की मलाला यूसुफजई का ध्यान नहीं आ रहा है, जिन्हें लड़कियों की शिक्षा की बात करने के लिए गोली मार दी गई थी और उसके बाद वे पूरी दुनिया में कट्टरपंथी इस्लाम के सार्थक विरोध का प्रतीक बन गईं? उनको नोबल पुरस्कार भी मिला। क्या उसी तरह भारत के हिंदू कट्टरपंथी और सरकार दोनों मिल कर राणा अयूब को एक प्रतीक नहीं बना रहे हैं? क्या उनसे पूरी दुनिया में यह मैसेज नहीं जा रहा है कि भारत में हिंदू कट्टरपंथी संगठन और सरकार भी एक महिला के लेखन से घबरा रहे हैं और उसके खिलाफ अभियान चला रहे हैं, उसे मारने की धमकी दे रहे हैं और उसे बदनाम कर रहे हैं?

ध्यान रहे भारत सरकार की एजेंसियों ने राणा अयूब के ऊपर धन शोधन के आरोप लगाए हैं और उनकी संपत्ति भी जब्त की है। इसी बहाने उनको विदेश जाने से भी रोक दिया गया था। दिल्ली हाई कोर्ट ने यह रोक हटाई है और उनको विदेश जाने की इजाजत दी। जांच एजेंसी ने अदालत में कहा कि वे विदेश जाती हैं तो हो सकता है कि नहीं लौटतीं। सोचें, अगर नहीं लौटतीं तो कौन सी आफत आ रही थी। हजारों करोड़ रुपए का घोटाला करके अनगिनत लोग देश से भाग गए और नहीं लौटे। सरकार को उनकी चिंता नहीं है, लेकिन राणा अयूब पर आरोप है कि उन्होंने परोपकार के कार्यों के लिए 2.69 करोड़ रुपए जुटाए, जिसमें गड़बड़ी हुई है तो उसकी इतनी चिंता है। इसकी जांच में एजेंसी ने उनकी 1.77 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त की है और खाते सील कर दिए हैं। फिर भी इस बात की जिद लगाए थी कि उनको विदेश नहीं जाने देंगे।

राणा अयूब अकेली पत्रकार नहीं हैं, जिनके साथ सरकार ऐसा बरताव कर रही है। आकार पटेल को भी बेंगलुरू हवाईअड्डे पर रोक लिया गया। वे अमेरिका जा रहे थे, लेकिन उनको जहाज में नहीं चढ़ने दिया गया। सीबीआई ने उनके खिलाफ लुकआउट सरकुलर जारी किया है, जिसके बारे में दिल्ली की एक अदालत ने यहां तक कहा कि सीबीआई को तत्काल सरकुलर वापस लेना चाहिए और एजेंसी के प्रमुख को आकार पटेल से माफी मांगनी चाहिए। बाद में सीबीआई की विशेष अदालत ने भी सरकुलर वापस लेने का आदेश दिया। आकार पटेल का मामला भी सारी दुनिया में चर्चित हुआ है। लेकिन देश की सबसे प्रीमियर एजेंसी कमर कस कर लगी है कि वह आकार पटेल को विदेश नहीं जाने देगी। ऐसे ही तवलीन सिंह और उनके बेटे आतिश तासीर का मामला है। तासीर के पिता पाकिस्तानी हैं, लेकिन भारतीय माता की वजह से उनको ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया यानी ओआईसी कार्ड मिला हुआ था। उन्होंने अमेरिका की ‘टाइम’ मैगजीन में प्रधानमंत्री मोदी के ऊपर आर्टिकल लिखा, जिसमें मोदी को ‘डिवाइडर इन चीफ’ बताया। इसके तुरंत बाद उनका ओआईसी कार्ड रद्द कर दिया गया। हालांकि बाद में उनको अमेरिका की नागरिकता मिल गई।

राणा अयूब, आकार पटेल और आतिश तासीर प्रतिनिधि नाम हैं। इस तरह के और भी कई चेहरे हैं, जो पत्रकार हैं, लेखक हैं या गैर सरकारी संगठनों से जुड़े हैं। उनके ऊपर छोटे-छोटे मामलों में केंद्रीय एजेंसियों ने बड़ी कार्रवाई की है। अगर इन्होंने कोई गलती की है तो कानूनी कार्रवाई जरूर होनी चाहिए लेकिन चुनिंदा कार्रवाई से ऐसा प्रतीत होता है कि जान बूझकर इनको निशाना बनाया जा रहा है। दूसरी अहम बात यह है कि केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई के साथ साथ सोशल मीडिया में इनको बदनाम करने और धमकी देने का अभियान भी चल रहा है, जो बेवजह इन्हें शहीद बना रहा है। अगर इनकी बौद्धिक गतिविधियों से सरकार या भारतीय जनता पार्टी को दिक्कत हो रही है तो उसका बौद्धिक तरीके से ही जवाब दिया जाना चाहिए। ये लोग जो लिख रहे हैं, कोई दूसरा बौद्धिक उसका जवाब दे सकता है। लेकिन अगर बौद्धिक गतिविधियों का जवाब केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई से दिया जा रहा है तो इसका मतलब है कि सरकार के पास सहिष्णुता की कमी तो है ही साथ ही अपनी विचारधारा के प्रति समर्पित बौद्धिकों की भी भारी कमी है।

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By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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