बंदूक थामे हाथ आखिर किसके हैं?

रामभक्त गोपाल या कपिल गुर्जर को किसी विचारधारा का प्रतिनिधि चेहरा मानना चाहिए या संशोधित नागरिकता कानून का विरोध करने वालों के ऊपर इनके गोली चलाने की घटना को इनका वैयक्तिक अपराध मान कर भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत इनके ऊपर मुकदमा चलना चाहिए? इस सवाल का जवाब आसान नहीं है। कहने को कहा जा सकता है कि इन दोनों युवाओं ने गुस्से में आकर फायरिंग की। हो सकता है कि ऐसा हो क्योंकि दिल्ली में सड़क पर ट्रैफिक के दौरान मामूली बातों को लेकर गोलियां चलती रही हैं और लोगों की जानें भी गई हैं। ‘रोड रेज’ दिल्ली में बहुत आम है। सो, संभव है कि 50 दिन से एक मुख्य मार्ग के बंद होने और लाखों लोगों को हो रही परेशानी से कुछ लोगों को ऐसा गुस्सा आए कि वे धरना खत्म कराने के लिए गोली चलाने पहुंच जाएं।

पर जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के पास पदयात्रा की तैयारी कर रहे छात्रों पर 30 जनवरी को हुई फायरिंग से दो फरवरी तक तीन बार गोली चलने की घटनाएं आईपीसी की धाराओं के तहत किसी सामान्य अपराध का संकेत नहीं हैं। गोली चलाने वाले युवाओं ने पुलिस को जो कुछ बताया है, गोली चलाते समय जो नारे लगाए हैं और अपनी जिस सोच का खुलासा किया है वह बेहद खतरनाक बदलाव का संकेत है। यह पिछले कुछ बरसों से देश के अलग अलग हिस्सों में हुई भीड़ की हिंसा से एक कदम आगे का घटनाक्रम है। हिंसक भीड़ का अपना दिमाग नहीं होता है। भीड़ लोगों को उन्मादी बनाती है और उस उन्माद की अवस्था में, त्वरित और सार्वजनिक ‘न्याय’ को अंजाम देना एक परिघटना है तो बिल्कुल सोच समझ कर, योजनाबद्ध तरीके से ‘त्वरित न्याय’ की सोचना एक अलग परिघटना है।

यहीं सोच रामभक्त गोपाल या कपिल गुर्जर को जामिया और शाहीन बाग खींच कर ले गई। सवाल है कि यह सोच आखिर कैसे बनी? क्या इसके पीछे पुलिस और प्रशासन की निष्क्रियता जिम्मेदार है, जिसने शाहीन बाग में धरने पर बैठे लोगों को वहां से नहीं हटाया, जिसकी वजह से लाखों लोगों को हर दिन परेशानी हो रही है? या धरने पर बैठे लोगों के ‘पहनावे’ को देख कर ‘हम और वे’ वाली भावना तीव्र हुई है और उसकी प्रतिक्रिया में गोलियां चल रही हैं? या ‘देश के गद्दारों को गोली मारो….. को’ जैसे नारे नौजवानों को उकसा रहे हैं कि वे एक खास किस्म के पहनावे वालों या केंद्र सरकार के बनाए किसी कानून का विरोध करने वालों को गद्दार और देशद्रोही मानें और उनके ऊपर हमला करें?

असल में देश में इस समय एक छद्म देशभक्ति का वातावरण बनाया जा रहा है, जिसमें लोगों को समझाया जा रहा है कि सरकार ही देश है और सरकार के बनाए हर कानून को सर झुका कर मानना ही देशभक्ति है। अगर कोई ऐसा नहीं करता है तो वह देशद्रोही और गद्दार है। पहनावे से विरोधियों को पहचानने और गद्दारों को गोली मारने का नैरेटिव इसी छद्म देशभक्ति के अखिल भारतीय प्रसार की योजना के तहत बनाया जा रहा है। निश्चित रूप से इसका लक्ष्य सिर्फ तात्कालिक नहीं है। सिर्फ दिल्ली का चुनाव जीतने के लिए या पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को हराने के लिए देशभक्ति के विमर्श को स्थापित करने का प्रयास नहीं हो रहा है, बल्कि यह दीर्घावधि की योजना का हिस्सा है।

ध्यान रहे भारत में बहुसंख्यक हिंदू कभी भी हमलावर नहीं है। पांच हजार साल का ज्ञात इतिहास इस बात का गवाह है कि हिंदू हमलावर नहीं रहे और इसलिए उन्होंने कभी भी हमले की तकनीक या उसका रण कौशल विकसित नहीं किया। वे हमेशा रक्षात्मक रहे और इसलिए सिर्फ बचाव की तकनीक विकसित की। दूसरी ओर इस्लाम की आसमानी किताब में भले जो भी कहा गया हो पर असलियत में इसे मानने वाले हमेशा हमलावर रहे। सो, उन्होंने लड़ने की तकनीक विकसित की है। समय समय पर उनकी लड़ाई के अलग अलग हथियार होते हैं। यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि भारत में इस समय उनकी लड़ाई का हथियार भारतीय संविधान है। बहरहाल, यह अलग विचार का विषय है। फिलहाल चिंता का सबब यह है कि लंबे समय की एक योजना के तहत बहुसंख्यक हिंदुओं के ध्रुवीकरण का प्रयास हो रहा है और इस प्रयास में एक साथ कई काम हो रहे हैं।

युवाओं को हिंसक बनने की प्रेरणा देना एक काम है तो हिंदुओं की पहचान को मजबूत करना, सांप्रदायिक अस्मिता को मजबूती देना एक दूसरा काम है। यह अस्मिता की राजनीति का अगला पड़ाव है। ध्यान रहे भारत में हिंदू की अंतिम पहचान उसकी जाति होती है। धर्म बदलने के बाद भी जाति नहीं बदलती है। तभी धर्म को आधार बना कर इससे पहले जितने भी प्रयोग हुए हैं वह विफल हुए हैं। मंडल के समय जाति की अस्मिता वाली राजनीति ने कमंडल के जरिए होने वाली धर्म की अस्मिता वाली राजनीति को विफल कर दिया था। जो काम आज से 30 साल पहले नहीं हो सका था उसे अब अंजाम दिया जा रहा है। ध्यान रहे सामान्य समय में हिंदू का जो व्यवहार होता है वह चुनाव के समय, मतदान के समय बदल जाता है। इसका कारण यह है कि धर्म से ज्यादा जाति की अस्मिता प्रभावी हो जाती है। अब धार्मिक पहचान को मजबूती दी जा रही है ताकि धार्मिक अस्मिता को स्थायी रूप से राजनीतिक रूप दिया जा सके। कई विद्वान ऐसा मानते रहे हैं कि हिंदू आध्यात्मिकता वाला धर्म है और इस्लाम राजनीतिक धर्म है। अब हिंदू को भी राजनीतिक धर्म में तब्दील करने का प्रयास हो रहा है।

दूसरी बात यह है कि इस देश की बुनियादी तासीर धर्मनिरपेक्षता वाली है। आम हिंदू अपने रोजमर्रा के जीवन में व्यस्त रहता है। उसे बचपन से शिक्षा दी जाती है कि धर्म उसकी रक्षा करेगा। इसलिए धार्मिक होते हुए भी कभी उसे यह चिंता नहीं होती है कि उसे धर्म की रक्षा करनी है। तभी वह न तो अपने धर्म को संकट में मानता है और न उसका रक्षा के लिए उद्धत होता है। इस समय इस तासीर को बुनियादी रूप से बदल देने का प्रयास हो रहा है। सांप्रदायिक पहचान को मजबूती देने का प्रयास हो रहा है। यह बताया जा रहा है कि हिंदुओं को धर्म की रक्षा करनी है, अपने देश की रक्षा करनी है। इस सोच में ही युवा बंदूक उठा रहे हैं। बंदूक थामे हाथ सामने से भले गोपाल या कपिल के दिख रहे हैं पर उसके पीछे अनगिनत अदृश्य हाथ हैं, जो हजारों की संख्या में ऐसे नौजवान तैयार करने के लिए काम कर रहे हैं।

One thought on “बंदूक थामे हाथ आखिर किसके हैं?

  1. nishkarsh kya nikala apne khoda pahad aur nikala chuhiya ye to bata dete galat sahi kya hai,
    kya hindutwa khatare me hai ya islam

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