हेगड़े को पता नहीं कि वे क्या कह रहे हैं!

भाजपा के सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री अनंत हेगड़े को महात्मा गांधी के बारे में पता नहीं है। उनको आजादी की लड़ाई के बारे में भी पता नहीं है। और उनको यह भी पता नहीं है कि गांधी के विरोध में वे जो कह रहे हैं वह क्या है। उन्हें गांधी पसंद नहीं हैं, यह किसी से छिपी हुई बात नहीं है। उनकी पार्टी के ज्यादातर नेताओं को भी गांधी पसंद नहीं हैं। उन्हें न गांधी की अहिंसा पसंद है और न उनका सर्वधर्म समभाव पसंद है। वे जिस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं उसमें गांधी को मुस्लिम और पाकिस्तानपरस्त माना जाता है। उनकी हत्या को किसी न किसी तरीके से जायज ठहराया जाता है और उनके हत्यारे को महिमामंडित किया जाता है। भले कहा कुछ भी जाता हो पर बुनियादी रूप से अनंत हेगड़े हों या प्रज्ञा सिंह ठाकुर, वे उस विचारधारा के प्रतिनिधि हैं, जो गांधी विचार के बिल्कुल विपरीत है।

अनंत हेगड़े ने गांधी का नाम लिए बगैर जो कुछ भी कहा उस पर उनकी पार्टी ने उनसे जवाब मांगा और उन्होंने बड़े निर्दोष अंदाज में कह दिया कि उन्होंने तो गांधी का नाम ही नहीं लिया था। उन्होंने गांधी का नाम नहीं लिया तो उन्हें बताना चाहिए कि वे किसके सत्याग्रह, उपवास, अहिंसक प्रतिरोध आदि को ड्रामा बता रहे थे? उन्होंने बेंगलुरू के एक कार्यक्रम में कहा- कुछ लोग कहते रहते हैं कि हमें आजादी किसी के सत्याग्रह से मिली थी। अंग्रेजों ने हमें आजादी परेशान होकर दी थी। इतिहास की ऐसी किताबें पढ़ कर मेरा खून खौलने लगता है। हमारे देश में ऐसे लोगों को महात्मा की उपाधि दी जाती है। सवाल है कि अपने इस भाषण में वे किसके सत्याग्रह और किस महात्मा की बात कर रहे थे?

अगर उनमें हिम्मत है तो वे कहें कि वे सचमुच गांधी के बारे में ऐसा सोचते हैं। ध्यान रहे गांधी ने सबसे पहले भय छोड़ने का सबक दिया था। उनका पहला संदेश निर्भय बनने का था। इसके बाद ही सत्य और अहिंसा दोनों का सिद्धांत आता है। गांधी हमेशा मानते रहे कि अगर आप निर्भय नहीं होंगे तो न सत्य बोल सकते हैं और न अहिंसक हो सकते हैं। उनकी अहिंसा का सिद्धांत निर्भयता से निकला था। वे मानते थे कि साहस का मतलब हिंसा नहीं है असली साहस अहिंसा में है। हिंसा के भय से अहिंसा का जन्म नहीं होता है। उन्होंने ‘हिंद स्वराज’ में लिखा- अगर मैं सजा मिलने के भय से चोरी करना छोड़ूंगा तो सजा मिलने का भय खत्म होते ही फिर चोरी करने लगूंगा। यानी सजा मिलने का भय चोरी नहीं करने का कारण नहीं होना चाहिए। हिंसा होने का भय अहिंसा के जन्म का कारण नहीं है। इसी तरह असत्य बोलते हुए पकड़े जाने का भय सत्य बोलने का कारण नहीं होना चाहिए।

गांधी के निर्भयता, सत्य और अहिंसा के सिद्धांत की मामूली समझ भी अनंत हेगड़े में होती और जो बात वो कह रहे हैं उसके प्रति तनिक भी प्रतिबद्धता होती तो खुल कर गांधी का नाम  लेते। लेकिन उन्होंने पहले ही होशियारी बरती। कूटनीति की। जैसे प्रधानमंत्री पाकिस्तान पर हमला करते हुए उसका नाम नहीं लेते हैं। वे पड़ोसी देश कहते हैं और सारा देश समझ जाता है कि उन्होंने किसको निशाना बनाया है। उसी तरह अनंत हेगड़े ने सारे ऐसे प्रतीकों का इस्तेमाल किया, जिससे लोग समझ जाएं कि वे गांधी पर निशाना साध रहे हैं पर गांधी का नाम नहीं लिया और इसे ही उन्होंने अपने बचाव का हथियार बनाया। सोचें, कैसी कायरता है? जिस व्यक्ति के साहस, सत्याग्रह, सत्य और अहिंसा के लिए प्रतिबद्धता ने दक्षिण अफ्रीका में भी और भारत में भी दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य को झुका दिया उस पर कैसे झूठे लोग, कैसी झूठी बातों से हमले कर रहे हैं! और उनमें इतना साहस भी नहीं है कि इसे स्वीकार कर सकें।

यकीन मानें अगर गांधी जीवित होते तो वे अनंत हेगड़े से कतई नाराज नहीं होते। उन्हें बस निर्भय होने का संदेश देते और इस बात के लिए प्रेरित करते कि वे अपनी बात खुल कर और ईमानदारी से कहें। अगर अनंत हेगड़े में इतना साहस नहीं है कि वे जिस बात को मानते हैं उसे खुल कर कह सकें तो उन्हें गांधी का नाम लेने का अधिकार नहीं है। गांधी में तो इतना साहस था कि वे अपने सबसे कट्टर विरोधी के साथ भी संवाद में विश्वास करते थे। उसकी आंखों में आंखें डाल कर अपनी बात कहते थे। उन्हें अपने विचारों पर पूरा यकीन था फिर भी दूसरे के विचारों का सम्मान करना वे जानते थे। वे हिंदू जन्मे थे, हिंदू धर्म में पूरी आस्था रखते थे और रामायण को दुनिया का सबसे पवित्र ग्रंथ मानते थे, उनके लिए राम का चरित्र सबसे आदर्श था और वे करुणा को सारे धर्मों का मूल मानते थे। उन्हें जीसस की यह बात भी अच्छी लगती थी कि अंततः कमजोर लोग ही धरती के मालिक होंगे और वे कुरान के पहले अध्याय सूरा फातेहा में अल्लाह को रब अल आलमीन कहे जाने में भी यकीन करते थे।

बहरहाल, अब अनंत हेगड़े को गांधी के बारे में क्या समझाना और अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई या भारत की सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए उनके प्रयासों के बारे में क्या बताना पर उन्हें और उनके वैचारिक गुरुओं के लिए यह समझ लेना जरूरी है कि गांधी 30 जनवरी 1948 को गोडसे की गोली से नहीं मरे थे और न भविष्य में कभी किसी प्रज्ञा ठाकुर या अनंत हेगड़े के बयानों से मरने वाले हैं। उन्होंने अपने जीवन और आचरण से जो संदेश दिया है वह अनंत काल तक जीवित रहने वाला है। ध्यान रहे नाम रख लेने भर से कोई न कोई अनंत होता है और न किसी को प्रज्ञा आती है। अंत में जैन क्रिश्चियन स्मट्स की कही वह बात लिखनी जरूरी है, जो उन्होंने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल से कही थी। स्मट्स और चर्चिल दोस्त थे। 1942 में जब गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन का ऐलान किया और करो या मरो का नारा दिया तब स्मट्स ने चर्चिल से कहा था- गांधी को कभी भी कम मत समझना। वे ईश्वर के आदमी हैं जबकि मैं और तुम तुच्छ मनुष्य हैं।

2 thoughts on “हेगड़े को पता नहीं कि वे क्या कह रहे हैं!

  1. जो भी कहा ,जितना भी कहा , गलत कुछ भी नही कहा।

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