भागवत का कहा और संघ व सिख

एक पुरानी कहावत है कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं। जिसने यह कहावत बनाई वह वास्तव में बहुत बड़ा विद्वान था। मैंने तो अपने जीवन में इस कहावत को शब्दशः सत्य होते देखा है। जब तक मैंने ताजमहल नहीं देखा था तो मुझे दुनिया की सबसे अहम इमारतों में से एक लगता था। जैसा कि उसे देखने वाले सोचते थे। मगर जब मैंने उसे पहली बार करीब से व गंभीरता से देखा तो मेरा मोहभंग हो गया।

मैंने देखा कि उसके निर्माण में लगाया गया संगमरमर तो मेरी सोसायटी के फ्लैटों में लगाए गए संगमरमर के पत्थरों से भी ज्यादा घटिया था। इससे पहले मैं समझता था कि मेरे घर में ही घटिया संगमरमर लगा है। वैसे ही जब तक मैंने पूर्व संघ प्रमुख केएस सुदर्शन को नहीं देखा व सुना था। मैं उन्हें एक विद्वान व्यक्ति मानता था। जब पहली बार अयोध्या विध्वंस के मामले की सुनवाई करने वाले आयोग में उन्हें सुना तो लगा कि वे बेहद घबराए हुए एक डरपोक इंसान है।

फिर वे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी व लाल कृष्ण आडवाणी को अपनी बढ़ती उम्र के कारण अपने पद छोड़ देने की सलाह देने लगे जबकि आयु के हिसाब से संघ प्रमुख भी उनके समकक्ष थे। जहां तमाम बड़े भाजपा नेता अपनी हाजिरी लगाने व सत्ता में बने रहने के लिए उनका आशीर्वाद लेने जाते थे। यही अनुभव मौजूदा संघ प्रमुख भागवत को लेकर भी हुआ। उन्होंने पहले आरक्षण के खिलाफ बयानबाजी कर अपने खिलाफ मोर्चा खुलवाया व भाजपा की ऐसी-तैसी करवाई और हाल ही में उन्होंने अपने एतिहासिक दशहरा भाषण में एक ऐसा बयान दे दिया जोकि हिंदू व सिख के बीच दूरी बढ़ाने वाला माना जा रहा है।

संघ प्रमुख ने अपने भाषण में जो कहा कि उसका अर्थ बना कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है। इसकी पंजाब में जबरदस्त आलोचना की जा रही है। पंजाब के जाने-माने अखबारों जैसे पंजाबी ट्रिब्यून, नवां जमाना सरीखे अखबारो ने उनकी जमकर आलोचना की जाने लगी। यहां कि अकाल तख्त के ज्ञानी हरप्रीत सिंह व शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी तक ने उनके इस बयान की जमकर आलोचना की। राजग के सहयोगी शिरोमणि अकाली दल ने भी इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई।

पंजाबी विद्वान डा. सुखदेव सिंह ने तो इस बयान को खतरनाक व राष्ट्र विरोधी तक करार दे दिया। एसजीपीसी अध्यक्ष जत्थेदार गोविंद सिंह लोगोवाल ने तो सार्वजनिक रूप से उनके बयान की आलोचना की। संघ प्रमुख के इस बयान न मानो बर्फ में जम चुके पूर्व पुलिस अधिकारी से नेता बने सिमरनजीत सिंह मान के दिलो-दिमाग में जान डाल दी। उन्होंने इस मु्द्दे पर सिखो का आंदोलन छेड़ने की धमकी दी है। हालांकि इस मसले पर पंजाब में जगह-जगह विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सांसद व पूर्व उप मुख्यमंत्री सुखबीर बादल ने कहा है कि कोई भी उनके बयान से सहमत नहीं है व भारत तो फूलो के उस गुलदस्ते की तरह है जिसमें अलग-अलग धर्मों को मानने वाले समुदाय तरह-तरह के फूलो की तरह लगे हुए हैं।

सच्चाई यह है कि संघ भले ही सिखों को हिंदुओ से निकला हुआ मानता हो मगर संबंधों को लेकर दोनों वर्गों के बीच हमेशा से टकराव होता आया हैं। इस बार में सिख इतिहासकार ज्ञानी गंडा सिंह के मुताबिक 1875 को जब आर्य समाज ने अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश प्रकाशित की तो यह माना गया कि उसमें सिख गुरूओं के बारे में काफी आपत्तिजनक बाते है। इसे लेकर विभिन्न सिंह सभाओं ने आंदोलन छेड़ा। जब 1920 में एसजीपीसी का गठन हुआ तो उसने सिख कौन है यह बताने के लिए सिख-सिख रैहत मर्यादा कोड बनाया। उसने सिखों को अलग धर्म कहां।

संघ के आर्य समाज व सिखों दोनों से मतभेद रहे। इसमें संघ का यह मानना कि सभी धर्म हिंदू राष्ट्र का हिस्सा है, सिख अकाल तख्त को सख्त नापसंद था। अकाल तख्त के सलाहकार व सिख विद्वान डा. सुखप्रीत सिंह उबोके के मुताबिक संघ सोचता है सिखों ने मूल सोच को बचाने के लिए मुगल बादशाहों के साथ युद्ध किया। वह उन्हें जैन, बौद्ध की तरह हिंदू धर्म का हिस्सा मानती है जबकि सिख एक अलग पहचान रखने वाले अलग धर्म है। संघ की तरह भाजपा व जनसंघ ने जो सोच रखी उससे इस टकराव को और बढ़ावा मिला।

जालंधर में 1960 में तत्कालीन संघ प्रमुख गुरू गोलवलकर ने कहा कि पंजाबी हर पंजाबी की मातृभाषा है मगर उससे जुड़ी जनसंघ ने हिंदी बचाओ आंदोलन छेड़ दिया। उन्होंने 1961 की जनगणना में पंजाब के पंजाबी भाषी हिंदूओं से अपनी मातृभाषा पंजाबी की जगह हिंदी लिखवाने को कहा। इतना ही नहीं 1984 में जब आपरेशन ब्ल्यू स्टार हुआ तो भाजपा ने उसका समर्थन किया। हालांकि अरूण जेटली ने उसे ऐतिहासिक भूल करार दिया। संघ प्रमुख केएस सुदर्शन तो 1999 में जरनेल सिंह भिंडरावाला के मुख्यालय दमदमी टकसाल भी गए तब भाजपा व अकाली दल की राज्य में सरकार थी। बाद में भाजपा ने सिखों को जोड़ने के लिए राष्ट्रीय सिंह संगत बनाई।

इस पर जुलाई 2004 के अकाल तख्त ने संघ व संगत द्वारा गुरू ग्रंथ सहित के 400वें स्थापना पर्व को मनाए जाने वाले समारोह में सिखों को उनसे दूर रहने की सलाह दी। संघ के करीबी व राष्ट्रीय सिख संगत के संस्थापक सरदार रूल्दां सिंह ने एक बार मुझसे कहा था कि अकाली दल व भाजपा भले ही पंजाब व देश में सत्ता हासिल करने के लिए साथ जाए। वे भविष्य में  एक साथ नहीं रह सकते क्योंकि दोनों ही धर्म आधारित राजनीति करने वाले दल है जोकि एक दूसरे को कदापि सहन नहीं कर सकते हैं। अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह का कहना है हम संघ के विरोधी है, हिंदुओं के नहीं। वे हिंदूवाद फैलाए पर उन्हें यह बताने का अधिकार नहीं दिया जा सकता है कि सिख कौन है।

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