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तालिबान और औवेसी

Asaduddin Owaisi

asaduddin owaisi taliban Afghanistan राजनीतिक पार्टी चला रहे और खुद कई बार से लोकसभा में चुने गए ऑल इंडिया एमआईएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी तालिबान का पक्ष लिया है लेकिन उनका अंदाज थोड़ा अलग था। उन्होंने बाकी लोगों से दो कदम आगे बढ़ कर उलटे भारत पर ही आरोप लगा दिए कि भारत के लोग किस मुंह से अफगानिस्तान की महिलाओं के समर्थन और उन पर तालिबान के जुल्म की बात कर रहे हैं, भारत में तो खुद ही महिलाओं की हालत बहुत खराब है। ओवैसी ने अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जा करने के चार दिन बाद 19 अगस्त को एक कार्यक्रम में कहा, ‘एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में नौ में से एक बच्ची की मौत पांच साल से कम उम्र में हो जाती है। यहां महिलाओं के खिलाफ अपराध बहुत होता है। लेकिन यहां की सरकार इस बात को लेकर चिंतित हैं कि अफगानिस्तान में महिलाओं के साथ क्या हो रहा है। क्या यहां ऐसा नहीं हो रहा है?’ सोचें, यह तालिबान के शासन और महिलाओं पर उसके अत्याचार को वैधता दिलाने वाला बयान है और बहुत होशियारी से इसमें यह भी बताया जा रहा है कि भारत में महिलाओं खास कर हिंदू महिलाओं की स्थिति तालिबान के शासन वाली महिलाओं से भी बदतर है।

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ओवैसी इतने पर नहीं रूके हैं उन्होंने सरकार को तालिबान से वार्ता की भी सलाह दोहराई है। ओवैसी ने याद दिलाया है कि उन्होंने पहले भी कहा था कि भारत को तालिबान से वार्ता करनी चाहिए। यह भी तालिबान को वैधता दिलाने के प्रयास का हिस्सा है। उन्होंने तालिबान और अफगानिस्तान पर भारत सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए सरकार से अपील की है कि वह तालिबान से बातचीत के कूटनीतिक रास्तों को खोले। ओवैसी ने एक ट्विट में लोकसभा में दिए उनके भाषण का वीडियो भी पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने 2013 की कांग्रेस सरकार के वक्त ही कहा था कि ‘अफगानिस्तान से एक दिन अमेरिकी सैनिकों की वापसी जरूर हो जाएगी। ऐसे में भारत के हितों की रक्षा के लिए तालिबान के साथ एक राजनयिक स्तर पर बात शुरू करनी होगी’। सोचें, एक तरफ दुनिया के आतंकवादियों संगठनों का जश्न है और दूसरी ओर भारत के चुने हुए नेताओं और धार्मिक, सामाजिक संगठनों की ओर से तालिबान को वैधता दिलाने का ऐसा प्रयास है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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