अमर सिंह तब और अब

काफी लंबे समय के बाद एक समय के बेहद चर्चित नेता अमर सिंह के बारे में कोई खबर पढ़ी। यह खबर अब तक की उनकी शख्सियत के एकदम विपरीत थी। उन्होंने अपने पुराने दोस्त व फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन से विगत में उनके खिलाफ बुरा भला कहने के लिए माफी मांगी।  मैंने अमर सिंह की हैसियत तब देखी जबकि वे राजनीति में उभर ही रहे थे व उनका देश की राजनीति व पत्रकारिता में बहुत जलवा था। देश की जानी मानी अभिनेत्रियों से लेकर उद्योगपति उनके बहुत करीबी माने जाते थे। एक अखबार का मालिक तो उनके इतने करीब था कि जब अमिताभ बच्चन के पिता हरिवंश राय बच्चन का 2003 में देहांत हुआ तो इस अखबार ने उनकी अमरसिंह के साथ वाली इतनी तस्वीरें छापी कि यह संदेह होने लगा कि वास्तव में किसकी मृत्यु हुई है व अखबार किस को श्रद्धांजलि देना चाहता था।

मेरे तत्कालीन स्थानीय संपादक (हरिशंकर व्यासजी नहीं) ने मुझसे उनका इंटरव्यू करने को कहा। उनकी एक खासियत थी कि इंटरव्यू करने के पहले ही वह इशारा कर देते थे कि वे किस तरह का इंटरव्यू चाहते हैं। उन्होंने उन्हें बहुत समझाते हुए, बताते हुए कहा कि ऐसा लिखना कि मजा आ जाए।

मैं अमर सिंह से उनके ग्रेटर कैलाश स्थित घर पर मिला। मैंने अपने इंटरव्यू में एक ही बात लिखी कि देखने में तो वे मोटे थुलथुल दुकानदार नजर आते हैं मगर वे वास्तव में ठाकुर है। मेरे उन संपादक महोदय ने उसमें कुछ सुधार किए व इस पंक्ति को काटकर यह लिखा कि देखने में तो वे व्यापारी नजर आते हैं मगर वास्तव में वे राजपूत है। इसके साथ ही मुझे भी प्रसन्न करते हुए इंटरव्यू में लिख दिया कि जनसत्ता के विशेष संवाददाता की उनके साथ बातचीत। जबकि मैं उस समय केवल प्रधान संवाददाता था।

इस संपादक ने वरिष्ठता के बावजूद मुझे विशेष संवाददाता नहीं बनने दिया। जब इंटरव्यू छप गया तो एक दिन अमर सिंह ने मुझे फोन कर चाय पीने के लिए आमंत्रित किया। जब मैं चाय पीकर उनके घर से चलने लगा तो उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा कि मैं आपका यह अहसान कभी नहीं भूलूंगा क्योंकि मुलायम सिंह यादव के यहां मेरी स्थिति महज रखैल जैसी थी मगर आपने यह इंटरव्यू करके मानो मेरी मांग में सिंदूर भर दिया।

उसके बाद मेरा व उनका कभी मिलना नहीं हुआ क्योंकि मेरे वरिष्ठों तक उनकी पहुंच थी। उनकी हैसियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में पोटा के मुद्दे पर संसद में ऐतिहासिक बहस हुई जो कि देर रात तक चली तो उस बहस में हिस्सा लेने की जगह मेरे अखबार के तमाम वरिष्ठ सहयोगी अमरसिंह के घर पर चले गए क्योंकि उस दिन उनकी जुड़वा बेटियों का जन्मदिन था। जिसमें देश की जानी मानी हस्तियां आई हुई थी।

उन्होने अपनी जिदंगी के शाही मजे लिए। वह बेहद शक्तिशाली हो गए थे। जब मनमोहन सिंह की सरकार परमाणु करार के मुद्दे पर खतरे में पड़ी तो उन्होंने मुलायम सिंह को समझा कर समाजवादी पार्टी के 39 सांसदों का उन्हें समर्थन दिलवाया। मुलायमसिंह यादव पर उनका प्रभाव इतना ज्यादा था कि वे अपने परिवार के सदस्यों तक की अनदेखी कर देते थे। उनकी मनमानी के चलते ही आजम खान सरीखे करीब आधा दर्जन नेता उनकी पार्टी छोड़ कर चले गए व आजम खान के विरोध के बावजूद उन्होंने अपनी करीबी अभिनेत्री जयप्रदा को रामपुर के लोकसभा की टिकट दिलवा दी।

उनके मुलायम सिंह से संबंध को लेकर तरह-तरह की किवदंतियां है। वे समाजवादी पार्टी के सबसे ताकतवर नेता व महासचिव हुआ करते थे। वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे। मगर मुलायमसिंह यादव व उनके परिवार के सदस्य ने कभी उनके खिलाफ एक शब्द तक नहीं कहा। जब अमेरीका के साथ परमाणु समझौते के विरोधी वामपंथी दलों ने मनमोहनसिंह सरकार को दिया जाने वाला समर्थन वापस ले लिया व वह अल्पमत में आ गई तो मुसलमानों के करीब जानी जाने वाली समाजवादी पार्टी ने यह जानते हुए भी कि मुसलमान अमेरिका से नाराज है मनमोहन सरकार को अमर सिंह के कहने पर समर्थन दे दिया। उसकी सपा को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी।

मेरा मानना है कि अमरसिंह में शेर का एक खास गुण था। मैंने डिस्कवरी चैनल में देखा है कि जब शेर को किसी भैसे का शिकार करना होता है तो वह पहले उसे झुंड से अलग करता है फिर उसे मार कर खाता है। अमर सिंह के अंदर भी यही गुण था। पहले उन्होंने अंबानी बंधुओं में दरार डालकर उन्हें बरबाद कर दिया। उन्हें जनवरी 2010 में उनकी हरकतों के कारण समाजवादी पार्टी ने दल से निकाल दिया। अगले साल उन्होंने अपना दल राष्ट्रीय लोकमंच बना लिया जिसने 2012 के उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावों में 403 सीटों पर 360 उम्मीदवार खड़े किए। उनका चुनाव चिन्ह बाल्टी था। तब अमरसिंह को ‘बाल्टी बाबा’ कहा जाने लगा। उनके व जयप्रदा समेत उनका एक भी उम्मीदवार चुनाव नहीं जीता।

उन्होंने 2014 में लोकसभा चुनाव में अजीत सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल के टिकट पर जयप्रदा समेत चुनाव लड़ा व बुरी तरह से चुनाव हार गए। उन्हें किडनी की बीमारी के कारण विदेश के एक अस्पताल में भरती कराया गया। मनमोहन सिंह सरकार बचाने के कारण उनका नाम नोट के बदले वोट कांड से जुड़ा और फिर  उन्हें जेल भी जाना पड़ा। बाद में उन्होंने राजनीति से सन्यास लेने का ऐलान कर दिया मगर वे 2016 में समाजवादी पार्टी में पुनः वापस आए व राज्यसभा के लिए चुने गए।

अब वे अखिलेश यादव को समाजवादी नहीं बल्कि नमाजवादी ठहराते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ कर रहे हैं। पहले उनका एक कथित टेप सार्वजनिक हुआ था जिसमें वे देश की बड़ी बड़ी हस्तियों से बहुत घटिया अश्लील बातें कर रहे थे। उन्होंने इसके प्रसारण पर रोक लगवा दी मगर एक जानी मानी पत्रिका ने इसे काफी  छाप दिया। उनके अमिताभ व उनके परिवार से भी रिश्ते बहुत खराब हो गए। उनके बारे में हमारे कानपुर की एक कहावत पूरी तरह से लागू होती है कि उनके मुंह में तो बवासीर है जो कि हर तरफ गंदगी ही फैलाती है। अब वे अमिताभ से माफी मांग रहे हैं।

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