यूपी के पायलटों के गजब किस्से!

हमारे देश में विमान चालको याकि पायलटों का मामला गजब रहा है। कुछ पायलटों ने उड़ान करते-करते राजनीति की तो कईयों  ने नेताओं का विमान चला कर जलवा, नामा-दामा कमाया। इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी विमान पायलट से नेता  और फिर प्रधानमंत्री बन गए थे। जबकि उनके छोटे बेटे संजय गांधी तो इतने शक्तिशाली हो गए थे कि आपातकाल में वहीं सरकार चलाते थे व उनका हुक्म कानून हुआ करता था। राजेश पायलट केंद्रीय मंत्री बने जबकि उनका पायलट नाम लिए बेटे सचिन पायलट का विमान राजस्थान के राजनीतिक बवंडर में हिचकोले खा रहा है। फिलहाल कुछ पायलटों का समय ठीक नहीं चल रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पायलट उड़ान संबंधी नियमों का उल्लघंन करने के आरोप में फंस गया हैं। केंद्र में अपनी पार्टी भाजपा के होने के बावजूद डायरेक्टर जनरल सिविल एविएशन और ब्यूरो ऑफ सिविल एविएशन सिक्योरिटी ने इस विमान चालक प्रज्ञेय मिश्रा के खिलाफ दो मामलो में शिकायत मिलने के बाद अपनी कार्रवाई शुरू कर दी है।

उत्तर प्रदेश सरकार के ही विमान चालक के रूप में काम कर रहे कैप्टन अरविंद सिंह ने शिकायत की है कि प्रज्ञेय मिश्रा की गलत हरकतों के कारण मुख्यमंत्री की जिदंगी खतरे में पड़ती रही है। उन्होंने अपनी शिकायत में कहा है कि हालांकि उत्तर प्रदेश नागरिक विमानन विभाग ने उन्हें हैलीकाप्टर विंग विमान उड़ाने के लिए रखा था मगर वे लगातार फिक्सविंग एयरक्राफ्ट विमान तक उड़ा रहे हैं।

यह उत्तर प्रदेश नगर विमानन कानून का उल्लघंन है जिसके तहत मुख्यमंत्री के पायलट केवल एक तरह का विमान ही उड़ा सकते हैं। इस मामले में 17 मार्च 2017 को उत्तर प्रदेश नागर विमानन विभाग ने अपर सचिव सत्यप्रकाश तिवारी को स्पष्ट किया है कि हैलीकाप्टर उड़ाने वाले विमान चालक को सामान्य विमान उड़ाने का अधिकार नहीं है। बताया जाता है कि मिश्रा के पास फिक्सविंग विमान उड़ाने का लाइसेंस था मगर जब इस बारे में आरटीआई के तहत डीजीपीए से स्पष्टीकरण मांगा तो उसने बताया कि उन्होंने मिश्रा को कभी भी दोनों तरह के विमान उड़ाने की अनुमति नहीं दी।

इसकी 5 अक्टूबर 2019 को डीजीपीए से इस मामले की शिकायत की और जीसीए के प्रमुख अरूण कुमार के मुताबिक उन्होंने इस मामले में जांच करनी शुरू करवा दी। जबकि कैंप्टन सिंह के मुताबिक विमान के चालक को एटीसी के बीच फोन पर होने वाली बातचीत से पता चलता है कि किसकी अनुमति व अधिकार के तहत सब कर रहे हैं जोकि बहुत गलत है। जबकि सबको पता है कि आपात स्थिति में दोनों विमान उड़ाने वाले चालको के दिमाग में भ्रम भी पैदा हो सकता है। ऐसा करके वे मुख्यमंत्री की जिदंगी खतरे में डाल रहे हैं।

यहां यह याद दिलाना जरूरी हो जाता है कि 9 जनवरी 2020 को दिल्ली के एक पत्रकार रजनीश कपूर ने विमान सुरक्षा ब्यूरो के महानिदेशक राकेश को इस बारे में सूचित किया व उन्हें बताया था कि मिश्रा ने एयरपोर्ट तक जाने के लिए विमान चालक को मिलने वाला एयरपोर्ट एंट्री पास तक गलत तरीके से हासिल किया। उन्होंने आज तक अपने अनुभव के जरूरी दस्तावेज तक जमा नहीं कराएं।

एक समय था जब उत्तर प्रदेश के सत्ता गलियारो में उन्हें ट्रिपल एस के नाम से जाना जाता था। वे तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के आंख, नाक कान ही नहीं मानो सबकुछ बन गए थे। मतलब शंशाक शेखर सिंह उनके दाहिने हाथ माने जाते थे व तब कहते थे कि वे ही प्रदेश के एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जोकि बिना पहले से समय लिए मायावती के दफ्तर तक जा सकते थे। वे उनके बेहद विश्वासपात्र व्यक्ति थे। मुख्यमंत्री अपनी सरकार व पार्टी का विस्तार करने के पहले अक्सर उनकी सलाह लिया करती थी। उन्हें मायावती का संकट मोचक भी माना जाता था।

बताया जाता था कि उन्होंने 46 प्रकार के विमान उड़ा कर 1200 घंटे उड़ान भरने का रिकार्ड बनाया था। वे बातचीत में बहुत माहिर थे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बदलते रहे मगर शशांक शेखर सिंह इस पद पर बने रहे और मुख्यमंत्रियों के विमान उड़ाते रहे। उन्होंने वीपी सिंह, नारायण दत्त तिवारी, मुलायम सिंह यादव से लेकर मायावती तक के विमान उड़ाए। हर मुख्यमंत्री से उनके बहुत अच्छे संबंध रहे। वे 1990 में राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में तब आए जब उन्हें सरकार ने नौकरशाही के आईएएस समान पद पर  नियुक्त किया गया। वे पूरे देश में एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्हे राज्य सरकार ने मुख्य सचिव के बराबर में नियुक्त किया गया। नागरिक उड्डयन विभाग के सामान्य पायलट से आईएएस  जमात के बॉस। सचमुच मुख्यमंत्रियो व राजनीतिक दलो का राज, जनाधार बनता बिगड़ता गया मगर शंशाक शेखर का पद, विकास  लगातार ऊंचा ही चढ़ता गया। जब वे देश के इतिहास में पायलट से मुख्यसचिव बने तब 550 आईएएस अफसरो की फौज उन्हें अपना बॉस मानने को मजबूर हुई।

वे मुख्यमंत्री मायावती के प्रधान सचिव बने और उनके आंख, नाक, कान माने जाते थे। बताते हैं कि वे सुबह-सुबह मुख्यमंत्री के घर पर पहुंच जाते थे। उनसे विभिन्न मामलो पर चर्चा करके दिनभर का अपना एजेंडा तय करते थे और रात 11 बजे जाकर मुख्यमंत्री को अपने काम की प्रगति देते थे। यह माना जाता था कि वे जो कह रहे हैं वे मायावती का आदेश है। वे तो उत्तर प्रदेश सरकार का मुखौटा ही नहीं बल्कि उसका चेहरा तक बन गए थे। वे प्रेस कांफ्रेंस करते व प्रतिनिधिमंडलो से मिलकर उनकी बाते मुख्यमंत्री तक पहुंचाते।बताया जाता है कि उनकी सफलता का राज उनका अपने आकाओं का मन जीत लेना था। विमान चालक के रूप में शशांक शेखर सिंह ने इतनी गजब की उड़ान भरी कि सब लोग देखते ही रह गए। वीपीसिंह उनसे इतने ज्‍यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने दिल्ली तक के आला नेताओं से उनकी तारीफ की। हालांकि सबसे पहले 1985 में तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने उन्हें सम्मान से ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी नियुक्त किया। वहां से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

चाहे कल्याण सिंह की सरकार रही हो या मुलायम सिंह यादव की अथवा मायावती की सबमें शशांक शेखर सिंह हमेशा अंहम पदों पर रहे। मायावती के मुख्यमंत्री बनने के बाद तो मानो उनकी किस्मत ही खुल गई। वे मुख्यमंत्री के नहीं बल्कि सरकार के पायलट माने जाते थे। सरकार के तमाम फैसलो में उनकी भूमिका होती थी। एनेक्सी के पांचवे तल पर वे मायावती के साथ सरकार व मुख्यमंत्री की छाया बनकर रहे। वे इतने मजबूत बन गए थे कि जब 2010 में उनका कार्यकाल समाप्त हुआ तो मायावती ने उन्हें दो साल का नौकरी विस्तार दिया।आईएएस लॉबी इस मामले को अदालत तक ले गई मगर कोई उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाया। 2012 में सरकार के अखिरी दिनों में उन्होंने खुद ही कैबिनेट सचिव पद से इस्तीफा दे दिया मगर 13 जून 2013 को दिमाग के केंसर से दिल्ली के मैक्स अस्पताल में महज 63 साल की उम्र में उनका देहांत हुआ। . वह चीफ सेक्रेटरी के पद तक पहुंचने वाले देश के पहले व अंतिम गैर-आईएएस अधिकारी थे। उनकी ताकत का अंदाजा तो इस बात से लगाया जा सकता है कि मनचाहा मंत्रालय पाने के लिए वरिष्ठ बसपा नेता उनके आगे हाथ जोड़ खड़े रहते थे। राज्य सरकार ने तो उन्हें काबीना मंत्री का पद देते हुए कैबिनेट सचिव बना दिया था मगर जब यह मामला अदालत में गया तो उनसे कैबिनेट मंत्री का दर्जा वापस ले लिया।

बहरहाल फिलहाल डीजीसीए ने जांच के चलते प्रज्ञेय मिश्रा का विमान चलाने का लाइसेंस निरस्त करते हुए उन्हें फ्लाइंग डयूटी से छह माह के लिए हटाया है। जो हो यूपी में पायलटों का मामला शुरू से दिलचस्प रहा है और अब भी कम विवाद नहीं है।

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