त्रासद है यह नया भारत

इतिहास रचने वालों को अपने खाते में वह उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल करनी होती है जो न केवल एक विरासत के रूप देखी जाती है, बल्कि इतिहास को भी नए सिरे से परिभाषित करती है। अगर जूलियस सीजर, एडोल्फ हिटलर, चर्चिल, रूजवेल्ट मार्गरेट थेचर जैसे नेताओं के बारे में काफी कुछ आने वाली पीढ़ियों को यह बताते हुए लिखा गया है कि इन लोगों ने सत्ता का कैसा उपयोग, दुरूपयोग या उसके जरिए वह क्या किया और क्या करने की कोशिशें कीं जिससे इतिहास की धारा बदली और देश बने। तभी कई बार जहन में सवाल उठता है यदि कभी वक्त आया तो नरेंद्र मोदी को लेकर क्या लिखा जाएगा?  उन्हें और उनके प्रधानमंत्रित्व काल को किस तरह से आगे की पीढियों के सामने रखा जाएगा?  कैसे इस वक्त को परिभाषित किया जाएगा, या कौनसा वक्त या काल उन्हें परिभाषित करेगा। मोदी जिस सत्ता को भोग और नियंत्रित कर रहे हैं, उस पर कितने न्यायोचित रूप से क्या और कितना लिखा जा सकेगा? क्या सत्ता देशहित में काम कर रही थी या फिर कुछ और मकसद थे? इनके जवाब क्या विरासत को वैधता प्रदान करने के लिए स्वाकार्य होंगे?

जनता की उम्मीदों और शक्ति को बढ़ाने वाले प्रधानमंत्री के रूप में चुने जाने के बावजूद नरेंद्र मोदी को अपने कार्यकाल में ऐसा कद हासिल करने और उसे भुनाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा है। उनके समर्थक तर्क दे सकती है कि नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कदमों ने उनकी ‘विरासत’ को तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई। लेकिन इसे क्या उनकी विरासत की शुरुआत मानेंगे या फिर पांच अगस्त को जो नई शुरूआत की गई, उसे विरासत का प्रारंभ माना जाए?

निसंदेह मोदी युग और नए भारत के लिए पांच अगस्त एक महत्त्वपूर्ण तारीख बन चुकी है। कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि इतिहास में पांच अगस्त की प्रासंगकिता और महत्त्व को उसी तरह देखा जाएगा जिस तरह हम आज 15 अगस्त और 26 जनवरी को दर्ज किए हुए हैं। लेकिन सवाल है कि क्या पांच अगस्त का दिन 15 अगस्त और 26 जनवरी की महत्ता के रूप में स्थापित हो पाएगा?

मेरा अनुमान भी उतना ही सही है जितना कि आपका।

कोई दो राय नहीं कि पांच अगस्त का दिन भारत के असंख्य हिंदुओं के लिए भावनात्मक रूप से एक गौरव का दिन बना है। अयोध्या में फिर से भगवान राम का मंदिर बने, यह भारत के हिंदुओं का सदियों से सपना रहा है। इसके नहीं होने से हिंदुओं को भावनात्मक रूप से यह आघात रहा कि उनकी आत्मा खो गई थी, जो कि अब पांच अगस्त को नरेंद्र मोदी के भूमि पूजन करने के बाद वह सही जगह पर प्रतिस्थापित हो गई है। हालांकि मथुरा और वाराणसी में यह अभी बाकी है।

लेकिन पांच अगस्त को भी जो आयोजन हुआ तो  उसमें भी जनभावनाओं को एक ऐसे समारोह में तब्दील कर दिया गया जो सिर्फ अपने ही लिए था। सारे दिन टीवी चैनलों के एंकर यह बताते और दिखाते रहे कि नए भारत के लिए अयोध्या में भगवान राम की वापसी ठीक वैसी ही है जैसे उनतीस साल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अयोध्या में आना। इसके साथ एक चित्र में यह भी दिखाया जाता है कि कैसे विशालकाय मोदी अपने साथ हाथ पकड़ कर छोटे-से भगवान राम को ले जा रहे हैं।  इस तस्वीर को जिस तरह से प्रचारिक और प्रसारित किया गया, उससे लग रहा था कि अयोध्या में अपने राजा की वापसी को लेकर किस हद तक उन्माद है। मैं अभी तक नहीं समझ पा रही हूं कि कौन तो राजा है और कौन भगवान जिसका कि इस तरह से स्वागत किया जा रहा है। लेकिन जिस चालाकी से पूरे देश में हर किसी को जानबूझ कर यह संदेश दिया गया कि पांच अगस्त 2020 का असल मकसद क्या था और किस रूप में इसे याद रखा जाना चाहिए, वह हैरानी भरा है।

अब जरा पांच अगस्त 2019 की ओर लौटें, जब नरेंद्र मोदी के गृहमंत्री अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रावधानों और 35 ए को निष्प्रभावी कर दिया था और राज्य को दो हिस्सों में बांट कर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश बना दिए थे तब भी पांच अगस्त का वह दिन नई शुरुआत लिए हुए था। उससे नई संभावनाएं दिखी थी। तब उम्मीद बंधी थी कि कश्मीर के इस नए युग में पंडितों की फिर से वापसी के आसार बनेंगे, विकास की शुरुआत होगी और आतंकवाद का खात्मा होगा। लेकिन एक साल बाद हम क्या देख रहे हैं कि कश्मीर अपने उसी पुराने ढर्रे पर है।

पांच अगस्त को दो फैसले किए गए, इन फैसलों को अमल में लाया गया। हालांकि स्पष्ट रूप से इन दोनों ही फैसलों पर मोदी की छाप है, उनकी भावनाएं हैं और अयोध्या में में तो उन्होंने एक राजा के तौर पर ही अपने को पेश किया है।

निश्चित रूप से, भारत की नई पीढ़ी के लिए नरेंद्र मोदी विकास के मसीहा के रूप में स्थापित हो चुके हैं। राम मंदिर को भी ऐसे विकास के तौर पर देखा जा रहा है जिससे रोजगार के अवसर पैदा होंगे। इस वर्ग के लिए मोदी देश के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं जो किए गए वादों को पूरा करके दिखा रहे हैं। इस तबके के लिए मोदी के नए भारत में नेतृत्व देने वाली नई फौज तैयार हो रही है। एक ऐसा नया भारत जहां समझदारी, देश के निर्बाध विकास और पुराने भारत के गौरव को एक उन्माद, निरर्थक और हताशा और बेसहारा वाली स्थिति में पहुंचा दिया गया है। जहां आलोचनाओं को सिरे से खारिज कर दिया जाता है, खुशामद करने वालों को सम्मान मिलता है, असहमति को बर्दाश्त नहीं किया जाता और राजधर्म की हत्या कर दी जाती है।

एक ऐसा नया भारत जिसमें हर त्रासदी, हर अवसर और हर भावना का राजनीतिकरण कर दिया जाना है, ताकि उसके भरपूर राजनीतिक लाभ उठाए जा सकें और वे भी किसके लिए, सिर्फ एक व्यक्ति प्रधानमंत्री के स्वयं के लिए और उन्हीं के द्वारा। उनके भक्तों के लिए पांच अगस्त का दिन मोदी दिवस के रूप में मनाया जाता रहेगा, जहां उन्हें याद किया जाएगा और उन्हीं के गीत गाए जाएंगे। लेकिन इतिहास भी ऐसा गान लिए हुए होगा?

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