जवाबदेही तो तय करनी होगी

ऑस्ट्रेलिया की सेना ने अफगानिस्तान में जो किया, वह युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है। ऑस्ट्रेलिया जो लोग इसके लिए दोषी हैं, उन पर मुकदमा चलाने की बात कही है। मगर देखना होगा कि ये कार्यवाही कितनी पारदर्शी और अपराध के अनुपात में होती है। यह तो साफ है कि इस मामले में सिर्फ माफी मांग लेना काफी नहीं है। ऑस्ट्रेलियाई सेना के प्रमुख जनरल एंगस कैंपबेल ने पिछले हफ्ते स्वीकार किया कि अफगानिस्तान में तैनात उनके सैनिकों ने कम से कम 39 अफगान नागरिकों को गैर-कानूनी तरीके से मार डाला था। मारे गए कुछ लोग युद्ध में शामिल नहीं थे। कैंपबेल ने कहा- “मैं ईमानदारी से अफगान लोगों के खिलाफ ऑस्ट्रेलियाई सुरक्षा बलों के हर गलत काम के लिए बिना शर्त माफी मांगता हूं।” मामला 2005 से लेकर 2016 के बीच अफगानिस्तान में ऑस्ट्रेलिया सेना के युद्ध अपराधों से संबंधित है। जांचकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि युद्ध अपराधों के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाना होगा। कैंपबेल के मुताबिक जो सैनिक युद्ध अपराध में शामिल हैं, उन्हें अदालत का सामना करना पड़ेगा।

जांच में इस बात के पुख्ता सबूत मिले कि ऑस्ट्रेलियाई सेना में विशेष बल के 25 सैनिक कैदियों, किसानों और अन्य निहत्थे नागरिकों की हत्याओं में शामिल थे। इसी के साथ नागरिकों की 23 अवैध हत्याओं के भी पुख्ता सबूत हैं, जिनमें कम से कम 39 अफगान नागरिक मारे गए थे। सितंबर 2001 में अमेरिका में आतंकवादी हमले के बाद अफगानिस्तान में 2002 में ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों की तैनाती की गई थी। युद्ध अपराध का सिलसिला 2009 में शुरू हुआ, लेकिन ज्यादातर लोग 2012 से 2013 के बीच मारे गए। जांच में ऐसी कई घटनाएं भी सामने आई हैं, जिनमें सैनिकों ने पहले कैदियों को गोली मारी और फिर अपने बचाव में फर्जी सबूतों के इंतजाम किए। यह अच्छी बात है कि ऑस्ट्रेलियाई सेना ने इस तरह के व्यवहार ने अफगान लोगों के भरोसे को तोड़ना माना। उसने ऑस्ट्रेलियाई सुरक्षा बलों के महानिरीक्षक द्वारा की गई जांच की रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है। महानिरीक्षक ने 143 सिफारिशें की हैं। सेना ने उनको लागू करने के लिए एक व्यापक योजना बनाने का एलान भी किया है। ये अच्छी बात है। अब ऑस्ट्रेलियाई सेना को ऐसी मिसाल कायम करनी चाहिए, जिससे भविष्य में ना सिर्फ ऑस्ट्रेलियाई बल्कि किसी देश के सैनिक निर्भय होकर इस तरह के युद्ध अपराध करने का साहस ना जुटा पाएं।

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