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Wednesday, May 12, 2021
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कोरोना की दूसरी लहर से बचें!

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अजीत द्विवेदीhttp://www.nayaindia.com
पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

लोगों को सरकारों के फैलाए झूठ में नहीं फंसना चाहिए और न नेताओं के आचरण का अनुसरण करना चाहिए। वे चुनाव लड़ रहे हैं, प्रचार कर रहे हैं तो उनको सत्ता मिलनी है। वे मास्क नहीं लगा रहे हैं तो कारण यह है कि उन्हें अपने चेहरे का प्रचार करना है। आम आदमी को न तो अपनी ब्रांडिंग करनी है और न उसे सत्ता मिलनी है। खामख्वाह जान चली जाएगी। इस बात को गांठ बांध कर रखें कि सरकारें झूठ फैला रही हैं। कोरोना कम घातक है या मामूली बुखार की तरह है या भारत के लोगों की इम्यूनिटी कमाल की है या लोगों को इसके साथ रहना सीख लेना चाहिए, जैसी बातें लोगों को मूर्ख बनाने के लिए कही जा रही हैं। इनका मकसद सिर्फ इतना भर है कि सरकारों की विफलता पर परदा डाला जा सके। असल में कोरोना की दूसरी लहर की हकीकत ज्यादा भयावह है।

सबसे भयावह यह है कि केंद्र और राज्यों की सरकारों ने एक साल का समय मिलने के बावजूद कुछ नहीं किया है। सरकारें इस भ्रम में रहीं कि लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ रही है, हर्ड इम्यूनिटी बढ़ रही है और कोरोना अपने आप खत्म हो जाएगा। तभी पिछले साल अक्टूबर में जब केसेज कम होने शुरू हुए तो सबने अपनी अपनी पीठ थपथपानी शुरू कर दी। स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे में सुधार करने या बेड्स, आईसीयू, वेंटिलेटर की संख्या बढ़ाने या डॉक्टरों व नर्सिंग स्टाफ की भरती करने या दवा और वैक्सीन के शोध पर खर्च बढ़ाने या अस्पताल और मेडिकल कॉलेज खोलने की बजाय सरकारें अपने रोजमर्रा के काम में बिजी हो गईं। तभी जब दूसरी लहर आई तो देश उसी हालत में दिख रहा है, जिस हालत में पहली लहर के पीक के समय था। तब भी वैसी ही अफरातफरी थी जैसी आज है। आज भी लोग अस्पतालों में भरती होने के लिए भटक रहे हैं। कहीं वैक्सीन की कतार लगी है तो कहीं जीवनरक्षक दवाओं की कालाबाजारी हो रही है।

चाहे महाराष्ट्र की सरकार हो या मध्य प्रदेश और दिल्ली की, सब कह रहे हैं कि लॉकडाउन नहीं लगाया जाएगा क्योंकि लोगों की आर्थिक स्थिति डावांडोल है। सवाल है कि सरकार ने एक साल में लोगों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए क्या किया या क्या ऐसा काम किया, जिससे लॉकडाउन लगाने की जरूरत न पड़े? क्या कहीं पर भी नए अस्पताल बने हैं या नए स्वास्थ्यकर्मी भरती किए गए हैं? अगर अस्पताल में बेड्स नहीं बढ़े हैं, डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ नहीं बहाल हुए हैं, दवा और वैक्सीन की आपूर्ति पर्याप्त नहीं है तो फिर लॉकडाउन के अलावा क्या रास्ता बचता है? बहरहाल, सरकारें चाहे जो कहें, आम लोगों को कोरोना की दूसरी लहर से डरना और बचना चाहिए। जहां तक हो सके पहले जैसी सावधानी बरतनी होगी, यात्राओं से बचना होगा और मास्क, सेनिटाइजर, सोशल डिस्टेंसिंग को उसी तरह से अपनाना होगा, जैसे पहली लहर में अपनाया हुआ था।

इसका कारण यह है कि दूसरी लहर पहले के मुकाबले ज्यादा खतरनाक है। ऐसा नहीं है कि यह  सिर्फ तेजी से फैल रहा है, बल्कि इसकी मारक क्षमता भी बढ़ रही है। इसके अलावा यह पहले के मुकाबले शरीर के दूसरे अंगों को ज्यादा नुकसान पहुंचाने में सक्षम हो गया है। ध्यान रहे दुनिया में अब तक कोविड-19 के साढ़े चार हजार वैरिएंट मिले हैं। भारत में भी 40-50 वैरिएंट मिल गए हैं। लेकिन अभी तक यह पता नहीं है कि देश में इतनी तेजी से जो फैल रहा है वह कौन सा स्ट्रेन है या म्यूटेशन के बाद उसका स्वरूप क्या है। अभी तक सिर्फ अंदाजा लगाया जा रहा है कि यह ब्रिटेन वाला स्ट्रेन हो सकता है या भारत का अपना कोई स्ट्रेन हो सकता है। पंजाब में मिल रहे नए केसेज में 80 फीसदी ब्रिटेन वाले स्ट्रेन के हैं तो महाराष्ट्र में 20 फीसदी तक मामले भारत के अपने स्ट्रेन के हैं। इस बारे में पक्के तौर पर तभी पता चलेगा, जब कोरोना के पांच फीसदी सैंपल की जीनोम सिक्वेंसिंग। अभी सिर्फ एक फीसदी सैंपल की जांच हो रही है। इसके आधार पर कुछ भी पक्के तौर से नहीं कहा जा सकता है।

दूसरी लहर में फैल रहे वायरस की जांच की एक रिपोर्ट यह है कि नए वैरिएंट्स में फेफड़े को खराब करने की क्षमता ज्यादा है। पहले कोरोना का वायरस सात दिन में लंग्स के 50 से 70 फीसदी हिस्से को संक्रमित करता था। दूसरी लहर में जो स्ट्रेन मिल रहे हैं वे यही काम दो से तीन दिन में कर दे रहे हैं। दो से तीन दिन में लंग्स का 50 से 70 फीसदी हिस्सा संक्रमित हो जाता है। मरीजों को इसका पता लगता है, तब तक नुकसान हो गया होता है। इन दिनों तेजी से बढ़ते मामलों की वजह से टेस्टिंग बढ़ गई है और लैब्स पर बहुत दबाव है, जिसकी वजह से वे देर से रिपोर्ट दे रहे हैं। जब तक रिपोर्ट मिलती है और कोरोना संक्रमण की पुष्टि होती है, तब तक वायरस फेफड़े को संक्रमित कर चुका होता है। यही कारण है कि देश में मृत्यु दर भी तेजी से बढ़ रही है। भारत की आबादी बड़ी है और संक्रमितों की संख्या ज्यादा है, इसलिए मृत्यु दर कम दिख रही है। दूसरे, भारत में दो-तिहाई आबादी 35 साल से कम उम्र के लोगों की है। अगर 45 से 75 साल के उम्र के लोगों की मृत्यु दर का आंकड़ा अलग करें तो भारत में भी इटली और ब्राजील की तरह तस्वीर दिखेगी।

दो और बातें लोगों को जान लेनी चाहिए। पहली बात यह कि एंटीबॉडी शरीर में नहीं टिक रही है। कोरोना संक्रमण से ठीक होने के तुरंत बाद जिन लोगों की एंटीबॉडी 35 थी वह एक महीने के अंदर घट कर 20 या उससे भी नीचे आ जा रही है। दुनिया में संक्रमण से ठीक होने वाले 20 फीसदी लोगों में एंटीबॉडी डेढ़ सौ दिन से भी कम रही। यानी छह महीने से पहले ही वे ऐसी स्थिति में आ गए कि उनको फिर संक्रमण हो सकता है। दूसरी बात यह है कि वैक्सीन बहुत असरदार नहीं है। इसका कारण यह है कि दुनिया में साढ़े चार हजार म्यूटेशन हुआ है इसलिए कोई दावे के साथ नहीं कह सकता है कि वैक्सीन हर म्यूटेशन के खिलाफ असरदार है। इसी  वजह से है दोनों डोज लेने वाले लोगों को भी संक्रमण हो रहा है। 

इस बीच भारत एक बार फिर दुनिया का दूसरा सर्वाधिक संक्रमित देश बन गया है। फरवरी में भारत दुनिया के सर्वाधिक संक्रमित देशों की सूची में तीसरे स्थान पर पहुंच गया था। अमेरिका और ब्राजील उससे ऊपर थे। लेकिन पिछले 11 दिन में देश में 12 लाख के करीब नए संक्रमित मिले हैं और अब ब्राजील को पीछे छोड़ कर भारत दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। हर दिन संक्रमण का नया रिकार्ड बन रहा है। 24 घंटे में मिलने वाले संक्रमितों की संख्या डेढ़ लाख से ऊपर पहुंच गई है। तभी सरकारों ने कांटेक्ट ट्रेसिंग करने से हाथ खड़े कर दिए हैं। भारत जैसे सीमित स्वास्थ्यकर्मियों और फ्रंटलाइन वर्कर्स वाले देश में संभव ही नहीं है कि हर दिन डेढ़-पौने दो लाख लोगों की कांटेक्ट ट्रेसिंग हो। तभी खतरा ज्यादा बढ़ गया है। पिछले साल जिस हर्ड इम्यूनिटी की चर्चा हो रही थी अब कहीं भी उसकी बात नहीं हो रही है क्योंकि भारत में हुए सीरो सर्वे के औसत के हिसाब से अभी तक 30-40 करोड़ लोग ही संक्रमित हुए हैं एक सौ करोड़ के करीब लोग संक्रमण से अछूते हैं, ऐसे में हर्ड इम्यूनिटी संभव नहीं है। देश में तीन महीने में अभी 10 करोड़ यानी छह-सात फीसदी लोगों को ही टीका लगा है। जब तक 20 फीसदी से ज्यादा लोगों को टीका नहीं लगता है, तब तक उससे हासिल होने वाली सुरक्षा के बारे में नहीं सोचा जा सकता है। इसलिए लोगों के सामने सावधानी बरतने और खुद को बचाने वाले उपाय करने के सिवा और कोई रास्ता नहीं है।

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