अयोध्या और सांप्रदायिक सौहार्द का सवाल

गत तीस सितंबर को अयोध्या विध्वंस मामले में लखनऊ की विशेष सीबीआई अदालत का निर्णय आया। न्यायालय ने छह दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा गिराए जाने को पूर्व निर्धारित आपराधिक षड़यंत्र मानने से इंकार करते हुए सभी 49 (जीवित 32) आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। जैसे ही अदालत का यह फैसला आया, वैसे ही स्वघोषित सेकुलरिस्टों और वामपंथियों का प्रलाप प्रारंभ हो गया।  कांग्रेस ने जहां इस निर्णय को “तर्कविहीन” बता दिया, वही वामपंथियों ने इसे “न्याय पर आघात” की संज्ञा दे दी। मुस्लिम समाज के स्वघोषित प्रतिनिधि और लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी अदालत पर तंज कसते हुए पूछा, “क्या मस्जिद जादू से गिर गई थी?”

इस संदर्भ में जितने आलेख समाचारपत्रों में प्रकाशित हुए- उसमें से अधिकांश का एक ही स्वर था- यह “खंडहरों में न्याय जैसा है”, “संवैधानिक मूल्यों के प्रतिकूल निर्णय है”, “न्यायिक असफलता है” और “जांच एजेंसी सीबीआई से सही काम नहीं किया” इत्यादि।  स्वयंभू सेकुलरिस्ट वर्ग विशेष अदालत के हालिया निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय की भावना के प्रतिकूल बता रहा है। इसके लिए वह विगत वर्ष 9 नवंबर को शीर्ष अदालत द्वारा की गई उस टिप्पणी को आधार बना रहा है, जिसमें उसने कहा था, “1992 में बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना कानून का घोर उल्लंघन था।” यदि इस आक्षेप को आधार बनाया जाए, तो 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला मामले में क्या हुआ था?

सर्वोच्च न्यायालय ने 2 फरवरी 2012 को इस मामले में 122 आवंटनों को यह कहते हुए निरस्त कर दिया था कि 2008 में तत्कालीन संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री ए.राजा के रहते स्पैक्ट्रम आंवटन में “असंवैधानिक और मनमानी” प्रक्रिया अपनाई गई थी। किंतु पांच वर्ष पश्चात 21 दिसंबर 2017 को विशेष अदालत ने मुख्य अभियुक्त ए.राजा और कनिमोई सहित सभी आरोपियों को साक्ष्यों के आभाव में बरी कर दिया।

आज जो वर्ग (कांग्रेस सहित) अयोध्या विध्वंस मामले में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी का हवाला देकर विशेष अदालत के फैसले पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहा है, उसने टूजी मामले में शीर्ष अदालत की भावना के उलट निचली अदालत के निर्णय को “विजय” और “न्याय” का प्रतीक बताकर पूर्व महालेखा परीक्षक (कैग) विनोद राय से माफी की मांग की थी। क्या इस पृष्ठभूमि में कांग्रेस, वामपंथी सहित तथाकथित सेकुलरिस्ट- भारतीय मुस्लिम समाज से माफी मांगेंगे, जिसने दशकों तक उन्हे भ्रम में रखा?

ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि जब किसी बड़ी “आपराधिक घटना” में “आरोपी” को वांछित सज़ा नहीं मिल पाई। 1947 में देश का रक्तरंजित विभाजन हुआ। इसे स्वीकार करने वालों में कांग्रेस दल भी एक पक्ष था। पाकिस्तान के लिए वामपंथियों ने मुस्लिम लीग और अंग्रेजों की हर प्रकार की मदद की। इसका परिणाम यह हुआ कि सांप्रदायिक दंगे में हिंदू-मुस्लिम समाज के लाखों लोग मारे गए। 1.5 करोड़ से अधिक लोग विस्थापित हो गए और करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हो गया। क्या इसके लिए कांग्रेस या वामपंथियों की जवाबदेही निर्धारित हुई?- नहीं।

वर्ष 1962 के युद्ध में भारत ने चीन के हाथों शर्मनाक पराजय झेली। उस समय भारतीय वामपंथी वैचारिक समानता के कारण साम्यवादी चीन का समर्थन करते हुए देशविरोधी गतिविधियों में लिप्त रहे। क्या किसी वामपंथी को न्यायिक रूप से दंडित किया गया? क्या देश में 1975-77 के दौरान आपातकाल थोपने वाली तत्कालीन इंदिरा सरकार और उसके पैरोकारों पर भारतीय संविधान को 21 माह तक बंदी बनाए रखने का दोषी सिद्ध किया गया?- नहीं।

वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख सुरक्षाकर्मियों ने हत्या कर दी। परिणामस्वरूप, दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में सिखों का “प्रायोजित” नरसंहार हुआ। एक आंकड़े के अनुसार, इसमें 8,000-17,000 निरपराध सिखों की हत्या हुई थी। तब इस नरसंहार को न्यायोचित ठहराते हुए राजीव गांधी ने कहा था, “जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती थोड़ी हिलती है।” क्या इसके लिए राजीव गांधी अपने जीवनकाल में दंडित हुए?- नहीं।

इसी तरह, कश्मीर में 1985-90 के कालखंड में जिहादियों द्वारा हिंदुओं को इस्लाम के नाम पर मौत के घाट उतारा गया और उनकी महिलाओं का सरेआम बलात्कार हुआ। दर्जनों मंदिरों को जमींदोज कर दिए गए। स्थानीय समाचारपत्रों में आतंकवादी विज्ञापन देकर हिंदुओं को घाटी छोड़ने या मौत चुनने का विकल्प देते रहे। परिणामस्वरूप, पांच लाख कश्मीरी पंडित घाटी से पलायन कर गए। क्या इस जघन्य अपराध के लिए आजतक किसी दोषी को सज़ा मिली?- नहीं।

यह विडंबना है कि जिन लोगों ने इन उपरोक्त किसी भी बड़ी घटनाओं के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद नहीं की- वह बाबरी ढांचा विध्वंस मामले में विशेष अदालत के हालिया निर्णय से एकाएक “असंतुष्ट” हो गए। सच तो यह है कि समाज का जो वर्ग 30 सितंबर के निर्णय पर अपनी छाती पीट रहा है और फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देने की वकालत कर रहा है- उसने कभी नहीं चाहा कि अयोध्या समरसता का प्रतीक बने या हिंदू-मुस्लिम समाज के बीच एक सदियों पुराने विवाद का अंत हो। इसका कारण उनके, भारत की सनातन संस्कृति से घृणा करने और विशेष समुदाय के वोटबैंक पर गिद्ध-दृष्टि रखने में निहित है। वास्तव में, वह सभी अयोध्या मामले में “न्याय” के बजाय प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से “काफिर-कुफ्र” की उस अवधारण को पुष्ट करने का प्रयास रहे है, जिसके विषैले चिंतन का शिकार भारत आठवीं शताब्दी से हो रहा है।

इसी रूग्ण मानसिकता के पालनहार वामपंथियों, छद्म-सेकुलरिस्टों और मुस्लिम जनप्रतिनिधियों ने विवादित ढांचे के नीचे विशाल मंदिर होने के प्रामाणिक साक्ष्यों की बार-बार अवहेलना की, श्रीराम को काल्पनिक बताया, मुस्लिम समाज को वर्षों तक धोखे में रखा और कुतर्कों से अब राम का का चरित्रहनन कर रहे है- उसी ने करोड़ों रामभक्तों की आस्था और उनके विश्वास को मुस्लिम विरोधी और प्रतिगामी बताकर, रामजन्मभूमि आंदोलन में शामिल विभिन्न नेताओं-हिंदूवादी संगठनों को बाबरी ढांचा विध्वंस मामले में फंसा दिया।

अयोध्या को लेकर देश का सांप्रदायिक सौहार्द किसने बिगाड़ा? स्वतंत्रता के बाद असंख्य रामभक्तों को अपेक्षा थी कि जैसे सरदार पटेल के नेतृत्व में स्वतंत्रता के पश्चात सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ, वैसे ही अयोध्या, काशी, मथुरा सहित अन्य ऐतिहासिक अन्यायपूर्ण कृत्य का परिमार्जन भी राजनीतिक रूप से होगा। ऐसा इसलिए- क्योंकि इस्लामी आक्रमणकारियों ने “काफिर-कुफ्र” दर्शन से प्रभावित होकर जिन सैंकड़ों मंदिरों को जमींदोज करके उसके स्थान पर मस्जिदें खड़ी कर थी- वह सभी ढांचे इबादत के लिए नहीं, अपितु इस्लामी आक्रांताओं के राजनीतिक विजय स्तंभ के रूप में स्थापित किए गए थे, जिसका एकमात्र उद्देश्य पराजितों को नीचा दिखाना और उनका अपमान करना था। परंतु सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार पश्चात यह प्रक्रिया रुक गई। यह इसलिए हुआ- क्योंकि वामपंथ से प्रभावित पं.नेहरू की छत्रछाया में सांस ले रहे स्वतंत्र “सेकुलर” भारत में प्राचीन संस्कृति के गौरव और उसके प्रतीकों की बात करना- सांप्रदायिक और पिछड़ेपन की निशानी बन गया था।

पं.नेहरू की सुपुत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा 1969-70 में वामपंथी चिंतन को आत्मसात करने के बाद कांग्रेस का दृष्टिकोण अयोध्या मामले में और अधिक विकृत हो गया। श्रीराम के चरित्र, जीवनमूल्यों और विरासत को क्षत-विक्षत किया जाने लगा। विवादित ढांचे के नीचे विशाल राम मंदिर के अवशेष होने संबंधी भारतीय पुरातात्विक उत्खनन रिपोर्ट सामने आई, तब उसे छिपाकर मुस्लिम समाज को भ्रम से बाहर नहीं आने दिया। परिणामस्वरूप, कांग्रेस नीत संप्रगकाल के दौरान सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा देकर राम को काल्पनिक चरित्र बता दिया।

निसंदेह, गत वर्ष 9 नवंबर को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राम मंदिर के पुनर्निर्माण का रास्ता प्रशस्त करना, 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भूमिपूजन और अब 30 सितंबर को लखनऊ की विशेष अदालत द्वारा विध्वंस मामले में सभी अभियुक्तों का 28 वर्ष चले अभियोजन पश्चात दोषमुक्त होना- वामपंथियों, स्वघोषित सेकुलरवादियों और मुस्लिम जनप्रतिनिधियों द्वारा “सफेद झूठ” पर स्थापित विकृत नैरेटिव रूपी इमारत का भरभराकर गिरने जैसा है।

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