अयोध्याः घबराए हुए क्यों हैं ?

अयोध्या के राम मंदिर विवाद का फैसला अगले हफ्ते होनेवाला है। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले का इंतजार सरकार किस अदा में कर रही है। मानो कोई तूफान आनेवाला है, कोई बम फटनेवाला है या कोई युद्ध होनेवाला है। उसने हजारों अर्ध-सैनिकों को अयोध्या में डटा दिया है। सारे राज्यों के मुख्यमंत्रियों को सावधान कर दिया गया है। कोई आश्चर्य नहीं कि कई शहरों में धारा 144 भी लगा दी जाए।

इस तरह की तैयारी तो मैंने पिछले 65-70 साल में कभी देखी-सुनी नहीं। मैं स्वयं बड़े आंदोलनों में भाग लेता रहा हूं लेकिन किसी सरकार को मैंने इतना घबराया हुआ नहीं देखा। कुछ लोग यह अंदेशा जाहिर कर रहे हैं कि सरकार को शायद पता चल गया है कि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला क्या आनेवाला है ? यदि वह मंदिर के पक्ष में आता है तो मुसलमान भड़क उठेंगे और मस्जिद के पक्ष में आता है तो सारे देश में हिंदू उठ खड़े होंगे और यदि वह फैसला इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तरह आया तो दोनों पक्ष अधर में लटक जाएंगे।

मेरी राय में ये तीनों स्थितियां बुरी है। इन स्थितियों को सम्हालने के लिए सरकार जो अगाऊ इंतजाम कर रही है, वह ठीक ही है लेकिन इसके लिए हमारी सरकार ही जिम्मेदार है। कितने दुख की बात है कि राम मंदिर के मामले में आपसी समझौता करवाने में यह सरकार असमर्थ रही है। जो तीन लोगों का आयोग इस काम के लिए नियुक्त किया गया था, वह बिल्कुल निष्फल रहा।

चंद्रशेखरजी और नरसिंहरावजी के जमाने में यह समझौता होने को ही था लेकिन चंद्रशेखरजी की सरकार गिर गई और नरसिंहरावजी के जमाने में मस्जिद गिर गई। दोनों वक्तों में दोनों पक्षों के बीच मैंने सक्रिय मध्यस्थता की थी और मुझे सफलता की पूरी आशा थी।

अब भी यदि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बावजूद मामला उलझा रहता है तो मोदी सरकार से उम्मीद है कि वह हिंदुओं और मुसलमानों के बीच संवाद करके इस मामले को हमेशा के लिए हल करवाएगी। अदालत के एकतरफा फैसले से इतनी गहरी दरार पड़ेगी कि उसको पाटने में सदियां लग जाएंगी।

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