माया, अखिलेश, ममता कैसे समझें?

विपक्ष अशक्त है क्योंकि क्षत्रपों में समझ नहीं है कि रामलला के आगे नरेंद्र मोदी के साष्टांग प्रणाम से मोदी ब्रांड जो चमका है वह लंबी आयु लिए हुए है। मायावती, अखिलेश सोच रहे होंगे कि अयोध्या का शो कुछ दिन चलेगा फिर लोग बेरोजगार, बीमारी, बरबादी में अयोध्या भूल जाएंगे। जात और अपनी चिंता में वोट करेंगे।

ऐसा नहीं होना है। हिसाब से क्षत्रपों को अब तक समझ जाना चाहिए कि नरेंद्र मोदी कैलेंडर राजनीति करते हैं। कैलेंडर में एक के बाद एक इवेंट बना कर लोगों को रिझाते हैं। आने वाले महीनों और 2024 तक के कैलेंडर में वे कई हिंदू झांकियों को प्लान कर चुके होंगे, जिससे हिंदू अनिवार्यतः बावले तालियां बजाते मिलेंगे, बीमार और भूखे भी उछलते हुए होंगे।

जैसे यूपी में बनारस में शिव मंदिर और गंगा के बीच कॉरिडोर, बाबा विश्वनाथ मंदिर परिसर का कायाकल्प है तो अयोध्या में लोकसभा चुनाव से पहले राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा है। अपने को आश्चर्य नहीं होगा कि अनुच्छेद 370 हटाने के बाद पांच अगस्त के दिन ही मंदिर निर्माण के भूमि पूजन की तारीख नरेंद्र मोदी ने तय की है तो वे अगली पांच अगस्त को भी कोई और हिंदू एजेंडे जैसे समान नागरिक संहिता यानी कॉमन सिविल कोड का फैसला संसद में करा डालें। उसके बाद की पांच अगस्त को भी ऐसा कोई एजेंडा बने और आगे दुनिया से नरेंद्र मोदी का आह्नान हो कि उनके पांच साल में पांच अगस्त भारत में क्रांति का दिन है।

बात-बात में क्या गजब संभावना बनी। पर क्या ऐसे मायावती, अखिलेश, ममता बनर्जी सोचते होंगे? यदि सोचते हुए होते तो क्या ये एलायंस बनाने की चिंता में नहीं होते? अलग-अलग राजनीति करके भाजपा-मोदी-योगी को मजबूत बना रहे होते या साझा रणनीति की उधेड़बुन में होते? पूरे देश की राजनीति यूपी से जब बनती-बिगडती है तो वहां मायावती, अखिलेश और कांग्रेस तीनों का अलग-अलग रहना भगवा राजनीति के सफल होते जाने की गारंटी ही है। इतने मुसलमान, इतने यादव या इतने दलित की गणित और जातीय फॉर्मूलों का तब तक मतलब नहीं है जब तक सारे विपक्षी वोट करो-मरो के अंदाज में एकजुट नहीं हों। वैसा होगा तभी अयोध्या के मोदी के आगे विपक्ष खड़ा हो सकेगा। उसका विकल्प घरों तक पहुंच सकेगा।

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