आधुनिक चिकित्सा पर शक! - Naya India
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आधुनिक चिकित्सा पर शक!

एक पुराना व्यंग्य है कि कोई भी काम बिगड़ जाए तो घबराएं नहीं, शांति से यह सोचें कि उसकी जिम्मेदारी किसके सर मढ़ी जा सकती है। भारत की मौजूदा सरकार इस काम में माहिर है। नोटबंदी का फैसला गलत हुआ तो सोशल मीडिया के जरिए यह प्रचार करा दिया गया है कि बेईमान बैंकरों की वजह से नोटबंदी फेल हुई है। जीएसटी का कानून सिरे नहीं चढ़ा तो उसके लिए प्रचार किया गया को छोटे कारोबारी चोर हैं, जिनक वजह से यह कानून सफल नहीं हो रहा है। इसी तरह कोकोना वायरस को संभालने में सरकार विफल रही है तो सुनियोजित तरीके से पूरे देश में आयुर्वेद बनाम एलोपैथी की बहस चलाई गई और यह प्रचार किया गया कि देश के खराब डॉक्टरों की वजह से देश में इतने लोगों की मौत हुई है। अपने को बचाने के लिए पूरी चिकित्सा बिरादरी को विलेन बनाने का यह खेल बहुत खतरनाक है, जिसका लंबे समय में बड़ा असर होना है।

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कोरोना वायरस को संभालने में सरकार की नाकामी और प्रभावित लोगों को किसी किस्म की मदद उपलब्ध कराने में सरकारों की अक्षमता ने देश में इसके असर को कई गुना बढ़ा दिया है। लेकिन ऐसा दुनिया के किसी देश में नहीं हुआ कि अपनी अक्षमता या अपने कुप्रंबधन पर परदा डालने के लिए पूरी आधुनिक चिकित्सा पद्धति को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाए। दुनिया के दूसरे देशों में भी एलोपैथी के अलावा वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति है। होमियोपैथी कोई भारत की खोज नहीं है। डॉक्टर हेनमेन जर्मनी के थे और यूरोपीय देशों में भी लोग होमियोपैथी इलाज कराते हैं। लेकिन कहीं भी यह सुनने को नहीं मिला कि महामारी के बीच डॉक्टरों को बदनाम किया जा रहा हो और मौतों का ठीकरा उनके सर फोड़ा जा रहा हो।

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भारत में इलाज के सही प्रोटोकॉल की वजह से लोगों की मौतें हुई हैं लेकिन उनके लिए डॉक्टरों से ज्यादा सरकार के वैज्ञानिक और चिकित्सा सलाहकार जिम्मेदार हैं। विजय राघवन, वीके पॉल, रणदीप गुलेरिया जैसे लोग जिम्मेदार हैं, जिन्होंने महामारी के बीच कोई चिकित्सा नीति नहीं बनाई और टेलीविजन पर बैठ कर हर दिन नई-नई बातें बताते रहे। लेकिन उनको जिम्मेदार ठहराने की बजाय आधुनिक चिकित्सा पद्धति, अस्पताल और डॉक्टरों को विलेन बनाया जाने लगा है। पतंजलि समूह के रामदेव झूठे-सच्चे आंकड़े पेश कर आधुनिक चिकित्सा पद्धति को बदनाम कर रहे हैं। उसके स्टूपिड साइंस बताया जा रहा है। हालांकि यह सरकार को उसकी नाकामी से बचाने के प्रयासों के अलावा और कुछ नहीं है।

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कहां तो सरकार को इस सेक्टर में नए निवेश करना चाहिए। महामारी से सबक लेकर ज्यादा से ज्यादा अस्पताल बनाने चाहिए, मेडिकल व नर्सिंग कॉलेज खोलने चाहिए, रिसर्च सुविधाओं का व विकास करना चाहिए, टेस्टिंग लैब्स बढ़ाने चाहिए, दवा और वैक्सीन निर्माण की सुविधाओं का विस्तार करना चाहिए तो उलटे इस सेक्टर को बदनाम करने का अभियान शुरू कर दिया गया। दुनिया में इस समय सारे देश आधुनिका चिकित्सा पद्धति की सुविधाओं के विस्तार में लगे हैं और भारत में इसे स्टूपिड साइंस बताने का अभियान चल रहा है। इसी तरह से इसे लेकर प्रचार चलता रहा तो बची खुची व्यवस्था का भी भट्ठा बैठेगा।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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