मैं तब भी बेबाक व अकेला था!

बाबरी मस्जिद ढांचे के ध्वंस का वक्त सेकुलर राजनीति का था। उन दिनों मीडिया में कोई हिंदू होने की समझ में हिंदू जन भावना पर बेबाकी मे कलम घसीटे, रिपोर्टिंग करे या कराए, यह असंभव था। जैसे आज पूरा मीडिया मोदी मीडिया है, भगवा रंग लिए है वैसे तब मीडिया प्रगतिशील, सेकुलर, वामपंथी, लाल रंग में रंगा हुआ था। उसी से करियर बनता था। लेकिन मैं तब भी वहीं था जो आज हूं। सनातनी हिंदू था और अखबार-पत्रकारिता में हिंदू जनउद्वेलन पर बेबाकी से लिखने वाला व रिपोर्टरों से भी बेबाक रिपोर्टिंग करवाने वाला। हां, 1983 में जब जनसत्ता निकला और इंदिरा गांधी की हत्या के बाद लोकसभा चुनाव आया तो पंजाब के मुद्दे, गैर-कांग्रेसवाद के चलते प्रभाषजी और जनसत्ता के तेवर में कुल मिला कर निचोड़ था कि कांग्रेस को बहुमत नहीं मिलेगा। वैसी समझ के बीच में अकेला था, जिसने मुजफ्फरपुर से ले कर लालकिले पर राजीव गांधी की सभाओं में भीड़, लोगों के हिंदू उद्वेलन को समझ कर लिखा कि कांग्रेस की अंतरधारा है। संपादकीय पेज के लेखों में मैंने बेबाकी से लिखा था कांग्रेस आज हिंदू अंतर्मन की पार्टी है। वह मजे से जीतेगी। चार सौ से ज्यादा सीट आने का अनुमान नहीं था लेकिन हिंदू भावना की सवारी करते हुए कांग्रेस है, यह बेबाकी से लेख, गपशप, रिपोर्टिंग में बताता रहा। जब शाहबानो केस हुआ और राजीव गांधी दबाव में आए तब उसकी हवा बिगड़ने का मेरा आकलन भी बेबाक था।  उसके बाद अयोध्या में अरूण नेहरू के मंदिर के ताले खुलवाने से ले कर वीपीसिंह की हवा, बोफोर्स और फिर पालनपुर के अधिवेशन में मंदिर आंदोलन के आडवाणी के फैसले के बीच मेरी गपशप, मेरा लिखा और बतौर जनसत्ता समाचार सेवा के प्रमुख के नाते मैंने जो स्टैंड लिया तो दिल्ली के मीडिया में तब यदि कोई नंबर एक कम्युनल पत्रकार था तो मैं ही था। समाजवादी, साम्यवादी, कांग्रेसी रंग के तमाम पत्रकार मुझे प्रतिक्रियावादी, संघी, दक्षिणपंथी मानते हुए खुन्नस पालते थे।

अपन ने किसी की परवाह नहीं की। अपने को जो समझ आया लिखते गए। वीपीसिंह से भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की उम्मीद हुई तो राजा के साथ खूब यात्रा की। देश बदलने की वैसी ही उम्मीद हुई जैसे 2014 सेपहले नरेंद्र मोदी से भारत बदलने का ख्याल बना था। दोनों ही नेताओं से धोखा खाया तो मंडल आयोग के बाद वीपीसिंह पर जो लिखा वह रिकार्ड़ है तो नोटबंदी के बाद नरेंद्र मोदी पर लिखा तो वह भी रिकार्ड में है। जैसे मौजूदा भगवा लंगूर सेना मुझे जैसा समझती है वैसे मंडल के बाद सामाजिक क्रांति के अनुयायी या मंदिर आंदोलन के वक्त सेकुलर-प्रगतिशील मीडिया अपने को कम्युनल, क्रांति विरोधी बताते थे। अपन ने चिंता नहीं की इसलिए क्योंकि वक्त के साथ मेरा विश्वास बढ़ता गया कि अंततः जीतता सत्य है। भाषण, जुमले, मसीहापना फेल होता है। साम्यवाद के ढहने से लेकर, सामाजिक न्याय के मसीहाओं की राजनीति के हस्र से ले कर भारत में कांग्रेस, गैर-कांग्रेसवाद, इंदिरा गांधी के इमरजेंसी के परिणाम और शाहबानोके बाद सेकुलर राजनीति की मुस्लिम चिंता का एक-एक अनुभव गुजरते हुए जब छह दिसंबर 1992 को मस्जिद ढांचे का ध्वंस हुआ तो अपना स्टैंड था कि यह तो होना ही था। जनसत्ता में प्रभाषजी तब भैरोसिंह शेखावत के साथ सुलह-समाधान की कोशिशो में थे। जब ढांचे का ध्वंस हुआ और शाम को जनसत्ता दफ्तर में संपादकीय विचार में प्रभाषजी को (बनवारीजी भी थे) मैंने भावावेश में, भाजपा-संघ के धोखे की दो टूक लाइन लेते हुए देखा तो मेरी अपनी दलील रही है कि जन मनोविज्ञान के सैलाब के आगे धोखे, साजिश जैसी बातें सोचना फिजूल है। ढांचा हिंदुओं की टीस था और उस पर स्यापे का अधिक अर्थ नहीं है। पर उनकी उस दिन से अलग लाइन थी। वे और दिलीप पडगांवकर, आरके मिश्रा, शरद पवार आदि धर्मनिरपेक्षता को ले उद्वेलन में रहे। जबकि मैं वहीं लिखता रहा जो मुझे अपने हिंदुपने में समझ आ रहा था।

अगले दिन सात दिसंबर, सोमवार को, मुझे पत्रकारों की भीड़ में भी अपना स्टैंड दिखाना पड़ा। वह मेरे पूरे जीवन का मीडिया जमात से सीधे भिड़ने का अकेला प्रकरण है। हुआ यह कि संसद में प्रतिक्रिया-माहौल बूझने के लिए मैं संसद भवन गया। प्रेस गैलेरी के लिए सीढियां चढ़ पहली मंजिल पहुंचा नहीं कि पत्रकारों की भीड़ प्रेस कक्ष के आगे के गलियारे में भाजपा सांसद मदनलाल खुराना को घेरे हुए खड़ी थी। प्रगतीशील क्रांतिकारी रामशरण जोशी, जावेद आदि खुराना की लगभग कॉलर पकड़ चिल्लाते हुए उनकी ऐसी तैसी करते हुए कह रहे थे-  तुम लोगों ने मस्जिद गिरा दी। धोखा दिया, साजिश की, देश को बरबाद दिया, हम तुम लोगों का बहिष्कार करते हैं आदि, आदि। इन क्रांतिकारी पत्रकारों के साथ संघ की पत्रकार शाखा के स्वंयसेवक राजकुमार शर्मा, दाणी भी खड़े थे। मुझे रामशरण और क्रांतिकारियों के द्वारा खुराना की ऐसी- तैसी करना और प्रेस गैलेरी के पत्रकारों का रूख पहले तो समझ नहीं आया लेकिन जब रामशरण से भाजपा के बायकॉट की बात सुनी तो तान आई मैंने रामशरण पर चिल्लाते हुए कहा‘ऐ रामशरण तुम कौन होते हो मीडिया से किसी पार्टी के बायकॉट का फतवा देने वाले, किस मीडिया की तरफ से अपनी क्रांतिकारिता झांड रहे हो। तुम्हें किसने अधिकृत क्या है यह कहने के लिए हटो, छोड़ो, खुरानाजी को…..’। वह मेरा सचमुच आवेश में फट पड़ना था।  क्रांतिकारी पत्रकारों की सिट्टीपिट्ट्टी गुम। खुरानाजी अब नहीं रहे हैं लेकिन उस दिन मुंह छिपाए घूम रहे भाजपाई खुराना और साथ के सांसद को भी राहत मिली। दो-तीन और पत्रकार भी फिर क्रांतिकारिता के खिलाफ बोलने लगे। लेकिन हां, संघ की पत्रकार शाखा के सेनानी मौन ही रहे।

सोचें, सेकुलर-क्रांतिकारी पत्रकारिता का वह वक्त और आज भगवाई लंगूरी पत्रकारिता का वक्त! यह देश कैसा है, हिंदू कैसे हैं, इस पर यदि ईमानदारी से विचार हो तो क्या लगेगा नहीं कि तब भी झूठ का बोलबाला था और आज भी झूठ का बोलबाला है। सौभाग्य अपना जो इस सबसे बचे रहते हुए अपन अपने लिखते रहे। अलग और बेबाक रहे। क्या सरस्वती की कृपा मानूं या रामजी की!

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