सब बैकअप वैक्सीन ही हैं!

कोरोना वायरस की महामारी इतनी भयावह और विशाल है कि दुनिया के सारे देशों ने वैक्सीन बनाने के तमाम स्थापित और मान्य नियमों-मानकों को ताक पर रख कर एक साल की अवधि में बनी वैक्सीन के इमरजेंसी इस्तेमाल की मंजूरी दे दी। इससे पहले जो वैक्सीन सबसे कम समय में बन कर तैयार हुई थी वह मम्प्स यानी घेघा रोग की वैक्सीन थी, जो साढ़े चार साल में बनी थी। उससे पहले आमतौर पर वैक्सीन तैयार होने में सात से आठ साल का समय लगता था। वैक्सीन निर्माण में इतना समय इसलिए लिया जाता था ताकि दुनिया में हर किस्म के इंसान पर इसका परीक्षण हो सके और इसके किसी भी संभावित साइड इफेक्ट का पता लगाया जा सके साथ ही इस बात का भी पता लगाया जा सके कि इसका असर कितने समय तक रहेगा। तब हजारों नहीं, बल्कि लाखों लोगों पर बरसों तक परीक्षण चलते थे उसके बाद वैक्सीन को मंजूरी मिलती थी।

इस बार कोविड-19 की महामारी को देखते हुए दुनिया के देशों ने परीक्षण के मानकों से समझौता किया और एक साल में वैक्सीन तैयार की। विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर दुनिया भर के देशों ने अलग अलग कंपनी की बनी वैक्सीन को मंजूरी देनी शुरू कर दी। दुनिया ने परीक्षण के मानकों से समझौता जरूर किया पर यह सुनिश्चित किया कि हर वैक्सीन का कम से कम तीन चरण का परीक्षण हुआ हो, तीनों चरण के परीक्षण का पूरा डाटा ड्रग रेगुटेलर के सामने हो, वैक्सीन के कारगर होने के साथ साथ उसके संभावित दुष्प्रभावों का डाटा भी उपलब्ध हो, तभी मंजूरी दी जाए। लेकिन भारत सरकार ने भारत बायोटेक की वैक्सीन के तीसरे चरण के परीक्षण से पहले ही इसकी वैक्सीन को मंजूरी दे दी। इस बारे में पूछे जाने पर सरकार के लोग कह रहे हैं कि यह बैकअप वैक्सीन है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, एम्स दिल्ली के निदेशक ने इसे बैकअप वैक्सीन बताया और कहा कि अगर महामारी और फैलती है तो इसका इस्तेमाल होगा। यहीं बात देश के स्वास्थ्य मंत्री ने भी कही। अब सवाल है कि अगर भारत बायोटेक की ‘कोवैक्सीन’ बैकअप वैक्सीन है तो ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की ‘कोवीशील्ड’ कौन सी वैक्सीन है? वह भी तो बैकअप वैक्सीन ही है! असल में दुनिया में अब तक जितने वैक्सीन को मंजूरी दी गई है, सब बैकअप वैक्सीन ही हैं, जिनके इमरजेंसी इस्तेमाल की मंजूरी दी गई है। कोई भी कंपलीट वैक्सीन नहीं है। इमरजेंसी इस्तेमाल का मतलब ही होता है कि वैक्सीन लगने के बाद भी व्यक्ति की निगरानी होती रहेगी, जैसे ट्रायल के समय होती है। यह निगरानी वैक्सीन के संभावित दुष्प्रभावों की चिंता में होती है। इसका मतलब है कि किसी भी वैक्सीन को पूरी तरह से सुरक्षित नहीं माना जा रहा है।

फाइजर, मॉडर्ना या ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन हो, रूस की स्पूतनिक वी और चीन की कोरोनावैक हो सब असल में बैकअप वैक्सीन हैं और महामारी के खतरे को देखते हुए इनके इमरजेंसी इस्तेमाल की मंजूरी दी गई है। इन पर अब भी काम चल रहा है और वायरस के नए वैरिएंट के हिसाब से इनको अपग्रेड भी किया जाना है। ये बैकअप वैक्सीन इसलिए भी हैं क्योंकि ये कोरोना वायरस से इंसान को स्थायी सुरक्षा नहीं दे रहे हैं। जैसे बाकी बीमारियों के टीके से स्थायी सुरक्षा मिलती है, वैसी इससे नहीं मिल रही है। इससे बनने वाली एंटीबॉडी ज्यादा से ज्यादा एक साल तक सुरक्षा देगी। हो सकता है कि कोई वैक्सीन ज्यादा समय भी सुरक्षा दे पर चूंकि उसका परीक्षण ही एक साल से कम अवधि के लिए हुआ है इसलिए कोई भी यह दावा नहीं कर सकता है कि उसकी वैक्सीन एक साल से ज्यादा सुरक्षा देगी। परीक्षण इसलिए नहीं हुआ है क्योंकि बीमारी ही एक साल पुरानी है और वैक्सीन अभी बन कर तैयार ही हुई है। वैक्सीन लगाने के एक साल बाद भी अगर किसी को संक्रमण नहीं हो तब माना जाएगा कि वैक्सीन का प्रभाव एक साल से ज्यादा भी रह सकता है। पर अभी यह दावा ही नहीं किया जा सकता है।

इसका साफ मतलब है कि वैक्सीन अभी पूरी तरह से तैयार नहीं है, सारे वैक्सीन अधूरे हैं और मजबूरी में उनका इमरजेंसी इस्तेमाल हो रहा है। परंतु भारत बायोटेक की वैक्सीन इन अधूरे वैक्सीन से भी अधूरी है क्योंकि उसका तीसरे चरण का परीक्षण अभी चल ही रहा है और तीसरे चरण के परीक्षण का डाटा उपलब्ध नहीं है। भारत के ड्रग रेगुलेटर ने दो चरण के परीक्षण के डाटा के आधार पर ही वैक्सीन को मंजूरी दे दी। ध्यान रहे कंपनी ने खुद कहा है कि उसका तीसरे चरण का ह्यूमन क्लीनिक ट्रायल चल रहा है और तीसरे चरण के ट्रायल के लिए वह 26 हजार वालंटियर्स की भरती करने के प्रयास कर रही है। तीन जनवरी को जिस दिन कंपनी की वैक्सीन को मंजूरी मिली उस दिन कंपनी की ओर से कहा गया कि तीसरे चरण के परीक्षण के लिए उसने 23 हजार वालंटियर भरती कर लिए हैं और उसका लक्ष्य 26 हजार वालंटियर भरती करने का है। सोचें, तीसरे चरण के परीक्षण के लिए कंपनी को अभी 26 हजार वालंटियर नहीं मिले हैं, लेकिन भारत सरकार ने उसकी वैक्सीन को मंजूरी देकर पूरे देश को ही वालंटियर बना डाला!

इस बात का भी क्या मतलब है कि यह वैक्सीन बैकअप में रहेगी और इमरजेंसी के समय इसका इस्तेमाल किया जाएगा। क्या इमरजेंसी होने पर कोई भी अनाप-शनाप दवा या वैक्सीन किसी को दी जा सकती है? अगर वैक्सीन सामान्य स्थितियों में दिए जाने के लायक नहीं है तो इमरजेंसी में क्यों दी जाएगी? सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस वैक्सीन को मंजूरी देने की क्या हड़बड़ी है? परीक्षण पूरा हुए बगैर वैक्सीन को मंजूरी देने के जो कारण समझ में आ रहे हैं उनमें से पहला तो यह है कि देश और दुनिया के सामने प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार को श्रेय लेना है कि भारत ने भी स्वदेशी तकनीक से वैक्सीन बना ली। ध्यान रहे दुनिया के बड़े विकसित और सभ्य देशों ने अपनी वैक्सीन बना ली है। अमेरिका, ब्रिटेन, स्वीडन आदि देशों की कंपनियों ने वैक्सीन विकसित की तो रूस और चीन ने भी वैक्सीन विकसित कर ली। सो, भारत क्यों पीछे रहे, इसलिए पूरा परीक्षण हुए बगैर ही वैक्सीन को मंजूरी दे दी गई। लेकिन इससे क्या होगा? क्या दुनिया भारत को फार्मा का विश्वगुरू मान लेगी? कम से कम अभी तक तो दुनिया के किसी देश ने भारत की वैक्सीन में दिलचस्पी नहीं दिखाई है, जबकि रूस और चीन तक की वैक्सीन खरीदने के लिए दर्जनों देश तैयार हैं। इनकी वैक्सीन का परीक्षण भी दूसरे कई देशों में हुआ है।

सो, ऐसा लग रहा है कि झूठी शान के लिए जल्दबाजी में वैक्सीन को मंजूरी दी गई है। इसके अलावा एक कारण यह भी है कि ये वैक्सीन सरकार को सस्ती पड़ेगी क्योंकि सरकारी लैब में इसे विकसित किया गया है। यह वैक्सीन देश के गरीबों में भी बांटी जा सकती है और दुनिया के गरीब मुल्कों को मदद के तौर पर भी भेजी जा सकती हैं। जैसे भारत ने दुनिया के देशों को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की गोलियां भेजीं और कुछ इसी तरह के दूसरे आइटम जैसे पीपीई किट, मास्क आदि भेजे गए और प्रधानमंत्री ने देश के सामने सीन ठोक कर कहा कि भारत ने इस महामारी में भी दुनिया के अनेक देशों की मदद की। हकीकत यह थी कि कोरोना के इलाज की असरदार दवाओं और वैक्सीन तक सब के लिए भारत खुद ही दुनिया के दूसरे देशों पर निर्भर है। जिस वैक्सीन को भारत की सीरम इंस्टीच्यूट की वैक्सीन कहा जा रहा है कि वह भी ब्रिटेन की संस्था ऑक्सफोर्ड और स्वीडन की कंपनी एस्ट्राजेनेका की बनाई हुई है। जिस तरह चीन में असेंबल होने की वजह से एपल के उत्पाद चाइनीज नहीं हो जाते हैं वैसे ही भारत में उत्पादन की वजह से ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन भारतीय नहीं हो जाएगी!

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