बजाज परिवार और उद्योगपति का बोलना

आमतौर पर हमारे देश के व्यापारी व उद्योगपतियो को धन के लालची, डरपोक, सरकार का मुंह देखकर बयान देने वाला माना जाता हैं। उन्हें पूंजीवाद का समर्थक माना जाता है। मगर हमारे देश में ही इसके कुछ अपवाद भी हैं। जैसे कि जेआरडी टाटा, किर्लोस्कर, नारायणमूर्ति से लेकर, कमल मुरारका, बजाज ऐसे कुछ उद्योगपति है या थे जिन्हें खुलकर अपनी बात कहने के लिए जाना जाता है।

किर्लोस्कर को वीपी सिंह ने वित्त मंत्री रहते हुए जमकर परेशान किय। टाटा को सरकारों का सहयोग करने की भारी कीमत चुकानी पड़ी व उनके द्वारा अपनी एयरलाइंस लाने का मामला इस कारण खटाई में ही पड़ गया। हाल ही में वयोवृद्ध उद्योगपति राहुल बजाज न मोदी सरकार के खिलाफ सच्चाई का खुलासा करके सबको चौका दिया। इस प्रख्यात उद्योगपति ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष व केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से सार्वजनिक मंच से सवाल पूछे और कहा कि सरकार से सवाल पूछने पर डर लगता है।

पता नहीं हैकि उन्हे ऐसा कहते वक्त अपने कहे के असर का आकलन था या नहीं। उनके बेबाक बोलन् के तुरंत बाद जिसकी आशंका थी वही हुआ। सोशल मीडिया में उन्हें निशाना बनाया जाने लगा व तमाम भाजपा समर्थक उन्हें खलनायक साबित करने पर तुल गए। मालूम हो कि सरकार की आर्थिक स्थिति पर आयोजित एक सम्मेलन में पूर्व पूधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि लगातार बदत्तर हो रही आर्थिक स्थिति के बावजूद देश के दस शीर्ष उद्योगपतियो और कारोबारियों ने किसी तरह का अच्छा या बुरा बयान नहीं दिया था। जबकि मेरे समय में तो वे लोग मुझे चिट्टियां लिखकर मेरी आलोचना करते थे।

उनकी इस बात के परिपेक्ष्य में भी शायद बुजुर्ग उद्योगपति बजाज ने यह बात कहीं। यह जान लेना चाहिए कि राहुल बजाज कोई ज्यादा सफल उद्योगपति नहीं थे। पर उनके पिता, उनका परिवार देश की आजादी के आंदोलन से जुड़ा रहा था। उनके बाबा जमनालाल बजाज राष्ट्रपति महात्मा गांधी के काफी करीबी सहयोगी थे। व चार साल तक उन्होंने कैद काटी थी।

सेठ जमनालाल बजाज न केवल भारत के एक जाने-माने उद्योगपति थे बल्कि स्वतंत्रता आदोलन में उनकी भूमिका को देखते हुए महात्मा गांधी उन्हें अपना पांचवा पुत्र मानते थे। उन्होंने 1926 में बजाज समूह की स्थापना की थी। उन्होंने महात्मा गांधी से 1932 में महाराष्ट्र में एक आश्रम खोलने का अनुरोध किया। जहां उनका पूरा परिवार महात्मा गांधी की 1948 में हत्या होने तक रहता रहा था।

उनकी कंपनी ने बिजली के उपकरणों से लेकर दो पहिया वाहनो के निर्माण में काम किया और आज देश के सबसे बड़े दो व तीन पहिया वाहन निर्यातक हैं। जमनालाल बजाज मूल रूप से राजस्थान के रहने वाले थे जहां एक मारवाड़ी परिवार में उनका सीकर के निकट जन्म हुआ। वहां रहने वाले सेठ बछराज व उनकी पत्नी सादी बाई ने उनको गोद लिया था। वे काफी धनी थे। वे धंधे के चक्कर में घूमते-घूमते वर्धा (महाराष्ट्र) पहुंचे। सेठ बछराज उनके पिता के दूर के रिश्तेदार थे।

सेठ जमनालाल बजाज व्यापार में उनका हाथ बंटाने लगे। तब वे सामान खरीदने-बेचने में दलाली कमाते थै। पैसा कमा लेने पर उन्होने बजाज ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज की स्थापना की। ब्रिटिश सरकार को जब प्रथम विश्व युद्ध के दौरान पैसे की जरूरत हुई तो बजाज समेत अनेक धनी लोगों ने उनकी मदद की। बदले में सरकार में उन्हें आनरेरी मजिस्ट्रेट नियुक्त करने के साथ उन्हें राय बहादुर की पदवी से नवाजा। आजादी आंदोलन में शामिल होने के बाद उन्होंने इस पदवी को त्याग दिया।

जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से वापस आए तो उनसे प्रभावित होकर जमनालाल बजाज ने अहिंसा का पालन शुरू कर दिया। उन्हें लगता था कि ब्रिटिश सरकार वहां से सस्ते कपड़े का आयात कर रही है। वे कुछ समय तक साबरमती आश्रम रहे। बाद में अपनी पत्नी व बच्चों को भी वहां रहने के लिए ले आए। बाद में वे कांग्रेस में शामिल हो गए और भारतीय नेशनल कांग्रेस के नागपुर सत्र के अध्यक्ष बनाए गए। बाद में सविज्ञा आंदोलन में हिस्सा लेने के कारण सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

उन्होने सत्याग्रह व दांडी मार्च आंदोलन में हिस्सा लिया। वे काग्रेस द्वारा 1938 में विधायिक का चुनाव लड़ने के गांधीजी के फैसले के खिलाफ थे। बाद में महात्मा गांधी के प्रयासो से वे कांग्रेस के हरीपुरा सत्र के संयोजक थे। उनके बेटे कमलनयन बजाज के तीन बच्चों में से एक राहुल बजाज है। पद्मभूषण से नवाजे गए इस उद्योगपति ने बाद में बजाज समूह का अध्यक्ष पद संभाला।

हारवर्ड बिजनेस स्कूल में पढ़े इस उद्योगपति ने 1990 के दशक में तत्कालीन सरकार की औद्योगीकरण उदार नीति का जमकर विरोध किया। वे 2006 से 2010 तक राज्यसभा से सदस्य भी रहे। लाइसेंस परमिट के राज में उनकी कंपनी बजाज आटो ने जमकर प्रगति की। इनके उद्योग का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उनके द्वारा निर्मित बजाज सुपर व बजाज चेतक स्कूटर पाने के लिए 15 साल तक वेटिंग करनी होती थी। इसकी जितनी कीमत थी इस पर मिलने वाला प्रीमियम लगभग उतना ही था। यह कंपनी महाराष्ट्र सरकार के लिए भी स्कूटर बनाती थी। जिसे कि प्रिया नाम से बेचा जाता था। कुछ समय पहले इस कंपनी ने स्कूटर बनाना बंद करके मोटर साईकिलो का निर्माण शुरू कर दिया व आज कंपनी बजाज पलसर नामक मोटर साईकिल बनाती है जो अन्य प्रतिस्पर्धी माडलो की तुलना में सस्ती व ज्यादा माइलेज देती है।

उन्हें हीरो होड़ा कंपनी ने चुनौती दी जो आज दुनिया की सबसे बड़ी दुपहिया निर्माता कंपनी है व दूसरे नंबर पर बजाज है। आजकल इस कंपनी को उनका बेटा संभाल रहा है। राहुल बजाज को काफी गंभीरता से लिया जाता है। उनका मोदी सरकार की आलोचना करना बहुत मायने रखता है। कुछ भी हो उन्होंने इटली की जिस वेस्पा स्कूटर कंपनी वाहनो की डीलरशिप से काम शुरू किया था उसी को आगे चलकर अपने वाहन के जरिए चुनौती दी। देखना यह है कि उनकी आलोचना को सरकार किस तरह से लेती है।

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