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Saturday, April 10, 2021
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बंगाल और देश बांग्ला के फर्क में भारत हकीकत!

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हरिशंकर व्यासhttp://www.nayaindia.com
भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

आपको क्या पता है भारत को बांग्लादेश पछाड़ता हुआ है? क्या मालूम है कि प्रति व्यक्ति कुल राष्ट्रीय आय (एनएसडीपी) में राज्यवार पश्चिम बंगाल के प्रति व्यक्ति 1532 डॉलर के आंकड़े से बांग्लादेश कोई साढ़े तीन सौ डॉलर आगे है? बांग्लादेश के आगे 793 डॉलर वाला उत्तर प्रदेश और 682 डॉलर वाला बिहार तो कहीं टिकता ही नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का प्रोजेक्शन है कि सन् 2020 में भारत का प्रति व्यक्ति कुल उत्पाद 1,877 डॉलर बैठेगा तो बांग्लादेश का 1,887.97 डॉलर। मतलब भारत से आगे निकला बांग्लादेश। अपना मानना है कि मोदी सरकार ने लॉकडाउन के बाद झूठे-गुलाबी आंकड़ों की जो गप्पबाजी बनाई है उसकी दो-तीन साल बाद जब असलियत खुलेगी तो बांग्लादेश बहुत आगे मिलेगा। पर जीडीपी, पीपीपी की आंकड़ेबाजी से हट कर सोचें कि पचास साल पहले बांग्लादेश कहां था और आज कहां है? आजादी की उसकी 50वीं वर्षगांठ पर वैश्विक मीडिया ने बांग्लादेश की सफलता के जो तराने गाए वह प्रमाण है कि दक्षिण एशिया का सफलतम नंबर एक देश आज बांग्लादेश है। 50 साल में बांग्लादेश सचमुच ‘सोनार बांग्ला’ होता हुआ है। सोचें, उसके आगे अपना पश्चिम बंगाल कहां है?

एक अपना बंगाल और एक वह बंगाल! बांग्ला लोग, बांग्ला मिजाज, बांग्ला संस्कृति का अमृत कलश कभी हिंदू बांग्ला भद्रो के हाथों में याकि पश्चिम बंगाल में था। कोई 75 साल पहले विभाजन के बाद राजधानी कलकत्ता वाला जो पश्चिम बंगाल बना वह औद्योगिक, व्यापार, बंदरगाह, परिवहन, शिक्षा-दिशा, साहित्य-कला-संस्कृति और बौद्धिकता सभी का केंद्र था। वह भारत का, दक्षिए एशिया का अगुआ इलाका था। ठीक विपरीत पाकिस्तान अधीनस्थ पूर्वी पाकिस्तान की दशा थी। बाद के 25 साल उपेक्षा, पिछड़ने और बरबादी के थे। तभी आजादी का आंदोलन सुलगा। और इंदिरा गांधी ने उसे आजाद देश बनवाया।

तब अमेरिका के विदेश मंत्री किसिंजर ने कहा था उफ! बांग्लादेश। इसके गड्ढे का तो पैंदा भी नहीं मिलेगा। भीख का वैश्विक कटोरा! दुनिया का भीड़ भरा दलदल। न प्राकृतिक संसाधन, खनिज, उद्योग और न पढ़ाई-लिखाई और न सेवा क्षेत्र। रोजी-रोटी के लिए लोग भारत में घुसपैठ कर झुग्गी-झोपड़ियां फैलाते हुए।

ऐसा पश्चिम बंगाल के साथ कभी नहीं था। हिंदू बहुल पश्चिम बंगाल बुद्धि-ज्ञान-विज्ञान-विकास में नेतृत्व करते हुए था। अपना मानना है कि आजादी के बाद पश्चिम बंगाल में नेतृत्व घटिया नहीं रहा। बांग्लादेश के पचास साल के नेतृत्वकर्ता चेहरों को देखें, वहां की सैनिक दखल, इस्लामी उग्रवाद के भभकों को याद करें तो समझ आएगा कि अपने अजय मुकर्जी, सिद्धार्थ शंकर रे से ले कर ज्योति बसु, बुद्धदेव भट्टाचार्य, प्रणब मुखर्जी, ममता बनर्जी की लीडरशीप अपने गुण-अवगुणों के बावजूद बांग्लादेशी नेताओं से अव्वल थी। इस बात को ऐसे भी समझें कि पश्चिम बंगाल से विदेश जाने वाले लोग भद्र, पढ़े-लिखे, डॉक्टर, वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री याकि पेशेवर थे जबकि बांग्लादेश बनने के बाद वहां से लोगों का जो जाना हुआ उसमें अधिकांश ब्रिटेन, यूरोप के रेस्टोरेंटों में खाना परोसने वाले बेयरे या खाड़ी देशों में मजदूरी करते हुए थे।

मतलब पश्चिम बंगाल की बांग्ला आबादी क्रीमी विकास लिए हुए थी वहीं बांग्लादेश में जैसे-तैसे गुजर करते हुए और जीवन जीने के लिए भटकते लोग! लेकिन आज? बांग्लादेश के एक अखबार ने गर्वोक्ति के साथ लिखा- बांग्लादेश के विपरीत पश्चिम बंगाल में मुश्किल से ही कोई बांग्ला पूंजीपति है। वे उन पूंजीपतियों के मोहताज हैं जो उत्तर और पश्चिमी भारत से हैं। वैश्विक वॉल स्ट्रीट जरनल की मानें तो बांग्लादेश अब दक्षिण एशिया का आर्थिक सांड (“economic bull case”) है।

हां, बांग्लादेश अब वैश्विक गौरव गाथा है। बांग्लादेश का नागरिक भारतीय नागरिक से अधिक प्रति व्यक्ति आय लिए हुए है। कोविड-19 महामारी के बावजूद बांग्लादेश की पॉजिटिव विकास दर है। कभी बांग्लादेश का कर्ज जीडीपी का सात प्रतिशत था अब सिर्फ दो प्रतिशत। भारत से बेहतर वित्तीय प्रबंधन। उसके विकास, जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग, निर्यात का हिस्सा भारत से बहुत अधिक। सन् 2011-19 के बीच जहां भारत का निर्यात 0.9 प्रतिशत की रेट से बढ़ता हुआ था वहीं बांग्लादेश का 8.6 प्रतिशत की रफ्तार से छलांग मारता हुआ था।

मसला सिर्फ विकास का नहीं है, बल्कि तमाम सूचकांकों में बांग्लादेश आगे दौड़ता हुआ है। वहां अंबानी, अडानी याकि क्रोनी पूंजीपति और आर्थिक असमानता की वह विषबेल नहीं है, जिसमें भारत लगातार जकड़ता जाना है। बांग्लादेश में गरीबी घटते हुए है। सन् 2000 में 49 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे थे वह आंकड़ा 2016 में 24 प्रतिशत रह गया। पिछले पांच सालों में और गिरा होगा। बांग्लादेश में जीने की प्रत्याशा याकि उम्र 48 साल से बढ़ 74 वर्ष हो गई है जो भारत (70 साल) व पाकिस्तान (68 साल) से अधिक है। ऐसे ही साक्षरता दर 29 प्रतिशत से बढ़ 75 प्रतिशत हो गई है। 95 प्रतिशत बच्चे प्राथमिक स्कूल और 62 प्रतिशत बच्चे सेकेंडरी स्कूलों में दाखिला लिए हुए हैं।

इस सबका भान भारत में कितने पढ़े-लिखों को है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनके कैबिनेट के मंत्री, प्रदेशों के नेता और नौकरशाही याकि एलिट-प्रभुवर्ग ने क्या कभी सोचा, समझा कि बांग्लादेश यदि दुनिया की सफल कहानी बना है तो भारत के लिए क्या सबक? ममता बनर्जी और कोलकाता का एलिट बांग्लादेश की कथा से अनजान हो यह संभव नहीं है। बावजूद इसके क्या किसी की खोपड़ी में विचार आया कि भारत का भद्र-बुद्धिमना बांग्ला मानुष वह क्यों नहीं कर पाया जो मुस्लिम बहुल बांग्लादेश में हुआ? पश्चिम बंगाल में क्यों नहीं दुनिया की कंपनियां आईं? क्यों बंगाल निर्यात केंद्रित विकास नहीं सोच पाया? आखिर सस्ता और बेइंतहा श्रम बंगाल में भी है। यदि बांग्लादेशी महिलाएं रेडिमेड गारमेंट में सिलाई करके अपनी और देश की तस्वीर बदल सकती हैं तो बंगाल की औरतों के लिए दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में जा कर घरों के काम करने की बदहाल जिंदगी से बेहतर सिलाई का विकल्प क्यों संभव नहीं?

पर यह बंगाल का ही नहीं बिहार, यूपी से लेकर गुजरात याकि पूरे भारत का सवाल है। तथ्य है कि भारत को दस तरह के वे एडवांटेज रहे, जिससे रेडिमेड कपड़ों में भारत दुनिया का हब बनता। कपास, धागा, कप़डा उत्पादन, मौसम, लेबर सब भारत में था और बांग्लादेश में कुछ नहीं। गुजरात या तमाम प्रदेशों की ग्रामीण औरतें अमूल दूध को बेचने के बाद सिलाई की वर्कफोर्स में कनवर्ट हो सकती थीं। लेकिन नहीं हुईं। भारत के बाबुओं ने, नेताओं ने कोटा-परिमट-लाइसेंसी-हुकूमती राज में अपने को, देश को बांधे रखा। जबकि बांग्लादेश ने नब्बे के दशक में ताईवान, दक्षिण कोऱिया, हांगकांग, सिंगापुर में ज्योंहि रेडिमेड कपड़ों को सिलने वाली मजदूरी मंहगी हुई तो वैश्विक कंपनियों को सस्ती मजदूरी का मौका दिया। अपने को निर्यात केंद्रित आर्थिकी में बदल डाला। तभी बांग्लादेश अब दक्षिण कोरिया, चीन, विएतनाम के उस रास्ते पर है, जिससे दुनिया को सप्लाई लेनी ही है। वह दुनिया की फैक्टरी है क्योंकि उसका सामान सस्ता है। और यही भूमंडलीकरण, 21वीं सदी में देशों की संपन्नता-विकास का रास्ता है।

इस सबके बीच हम हिंदू, खासकर नरेंद्र मोदी सरकार विकास कैसे सोचती है? अंबानी-अडानी जैसे दस-बीस खरबपति सेठ बनाओ तो देश आगे बढ़ेगा! सरकारी कंपनियों-बैंकों को बेचो तो धंधा फलेगा-फूलेगा। दुनिया की कंपनियों के आगे सब कुछ आसान का नगाड़ा बजाओ और कंपनियां भारत में कारखाना लगाने लगेगी। अपना मानना है कि सत्ता की मौजूदा हिंदू बुद्धि में, प्रधानमंत्री दफ्तर और नई दिल्ली के नॉर्थ-साऊथ ब्लॉक, वित्त-वाणिज्य मंत्रालय में मंत्रियों-सचिवों में कभी विचार हुआ ही नहीं होगा कि बांग्लादेश द्वारा भारत को पछाड़ना क्या मतलब लिए हुए है? बांग्लादेश ने भारत का अवसर खाया है, क्या इसका भारत राष्ट्र-राज्य को भान है?

जरा विस्तार में जाएं। हिंदू बांग्लादेश को लेकर क्या सोचता है? एक कट्टरपंथी इस्लामी देश! व्हाट्सअप से प्राप्त इमेज कि ईद पर बकरों के खून से भरी सड़कें। घुसपैठिए बांग्लादेशी और भारत में लालफीताशाही, भ्रष्टाचार व व्यवस्था के जैसे हाल हैं वैसे ही सब ढाका में। लेकिन यदि ऐसा होता तो बांग्लादेश कैसे दस सालों में इतना बनता? सवाल है वह बना है, इसे जानने-समझने के लिए भी हिंदू के पास क्या साधन, कौन सा मीडिया? अपने अंधेरे कुएं की टर्र-टर्र में बांग्लादेश पर वहीं सोचेंगे जो सोचने की सीमा और साधन है।

नोट रखें बांग्लादेश के 16 करोड़ बांग्ला लोगों की किस्मत बांग्ला मिजाज की उदार भद्रता से बनती-बदलती हुई है। लोगों के मिजाज, उदारता ने विदेशी कंपनियों में सस्ती, टिकाऊ, भरपूर मजदूरी का भरोसा बनाया। घर-परिवार के उदार बंगाली माहौल ने गांव-कस्बों से औरतों, लड़कियों को शहरों में सिलाई के लिए दौड़ाया। प्रधानमंत्री हसीना वाजेद ने समझदारी दिखाई जो विदेशी पूंजी का उदारता से स्वागत किया। विदेशियों को लोकल कंपनियों के सौ फीसद शेयर लेने, जितना मुनाफा हो उसे ले जाने की छूट दी। तभी भारत की कई कंपनियों ने भी ढाका जा कर वहां के खुले माहौल में फैक्टरी लगाना फायदेमंद समझा। भ्रष्टाचार, दादागिरी आदि की हकीकत के बावजूद हसीना वाजेद सरकार ने मनमाने फैसलों याकि नोटबंदी, बिना तैयारी के आधी रात में जीएसटी, अचानक लॉकड़ाउन या कृषि कानून जैसे काम नहीं किए।

हां, बांग्लादेश ने कृषि में भी क्रांति की है। पिछले 34 सालों में चीन के बाद बांग्लादेश दूसरा देश है जहां अनाज उत्पादन लगातार 2.7 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ा है। भला यह कैसे हुआ? कैसे छोटे-सीमांत खेतिहर पैदावार बढ़ाने में सफल हुए? कैसे बच्चों की पढ़ाई, औरतों के बाहर जा कर काम करने का आत्मविश्वास बना? तो जवाब है एनजीओ! सचमुच, बांग्ला लिबरल-सहज मिजाज कट्टरपंथी इस्लाम की हवा में नहीं बहा और वहां जन्मदर घटी, औरतें अग्रणी रहीं, खेत-खलिहान-सिलाई के प्रयोग हिट हुए तो सत्व-तत्व का दूसरा बीज एनजीओ, स्वंयसेवी संस्थाओं का फैलाव और मानवाधिकार आंदोलन है (जिसे भारत में मोदी सरकार ने छह सालों में बुरी तरह दबाया है)। वहां ग्रामीण बैंक, बीआरएसी जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त एनजीओ ने महिलाओं, खेतिहर आबादी को छोटे-छोटे कर्ज दे कर वह प्रभाव बनाया, जिसे नोबेल पुरस्कार कमेटी ने भी सराहा। वहां जनसंख्या वृद्धि की दर यदि 2.8 से घट एक प्रतिशत हुई है, साक्षरता-जीवन प्रत्याशा, स्वास्थ्य सेवा, मानवाधिकार में उपलब्धियां हैं तो निर्णायक रोल एनजीओ का है न कि सरकार के प्रोपेगेंडा का।

सो, बांग्ला लोगों की स्वंयस्फूर्तता से बांग्लादेश बना है। पश्चिम बंगाल में लेफ्ट ने या ममता ने या अभी दिल्ली में मोदी सरकार ने अपनी वैचारिकता, सनक में लोगों को हांकने, बांधने, सरकार का मोहताज बनाने की जो प्रवृत्तियां दिखलाईं उससे राजनीति की गंदगी के बावजूद ढाका के हुक्मरान बचे रहे। सोचें कोविड काल में बांग्लादेश में अधिकांश लोग अपने बूते जीते हुए जबकि मोदी सरकार अस्सी करोड़ लोगों को पांच किलो अनाज व एक किलों दाल बांटते हुए। 

इसलिए बांग्लादेश के तथ्यों पर जितना सोचें उतना ही लगेगा कि दीमक (बांग्लादेश को कभी कहा जाता था) से भी पार पाया जा सकता है बशर्ते लोग खुली हवा लेते हुए हो और उन्हें स्वंयसेवी मदद मिली हुई हो! और हां, याद रखें आने वाले सालों में बांग्लादेश दवा उद्योग, आईटी, शिप बिल्डिंग, शिप-ब्रेकिंग जैसे क्षेत्रों में भी भारत को मात देता-पछाड़ता हुआ होगा। वह भी बिना अंबानी-अडानी के क्रोनी पूंजीवाद के!

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1 COMMENT

  1. आह!

    हिन्दू कभी बांग्लादेश की नकल नहीं करेगा ।

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