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उठे सवाल जायज हैं

कथित जांच की रिपोर्ट अब बीबीसी के हाथ लगी, तो वह उसे एक न्यूज स्टोरी के रूप में दिखा सकता था। लेकिन उसे लेकर मोदी के पूरे राजनीतिक जीवन पर दो किस्तों की डॉक्यूमेंटरी बनाने की इस समय क्या जरूरत थी, यह प्रश्न अवश्य उठाया जाएगा।

बीबीसी ने 2002 के गुजरात दंगों की पृष्ठभूमि में नरेद्र मोदी के राजनीतिक जीवन पर अभी डॉक्यूमेंटरी क्यों बनाई, यह सवाल जायज है। ‘द मोदी क्वेश्चन’ नाम की इस डॉक्यूमेंटरी की पहली किस्त पिछले हफ्ते प्रसारित हुई और दूसरी मंगलवार को होगी। बताया गया है कि दूसरी किस्त में बतौर प्रधानमंत्री मोदी के शासनकाल में अपनाई गई कथित अल्पसंख्यक विरोधी नीतियों की पड़ताल की जाएगी। जहां तक पहली किस्त का सवाल है, तो उसमें नई बात सिर्फ यह थी कि गुजरात दंगों की तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने अपने राजनयिकों के जरिए ‘जांच’ कराई थी। जांच इस नतीजे पर पहुंची थी कि दंगों के लिए सीधे तौर पर बतौर मुख्यमंत्री मोदी जिम्मेदार थे। अगर उस कथित जांच की रिपोर्ट अब बीबीसी के हाथ लगी, तो वह उसे एक न्यूज स्टोरी के रूप में दिखा सकता था। लेकिन उसे लेकर मोदी के पूरे राजनीतिक जीवन पर दो किस्तों की डॉक्यूमेंटरी बनाने की इस समय क्या जरूरत थी, यह प्रश्न अवश्य ही उठाया जाएगा।

इसलिए पहली किस्त में जो बातें दिखाई गईं, वह एक तरह का दोहराव भर थीं। वे तमाम पहलू पिछले दो दशक में चर्चा में रहे हैं। बीबीसी के पास जो जानकारी आई है, उससे मोदी या भारतीय जनता पार्टी पर कोई नए सवाल नहीं खड़े होते हैँ। बल्कि उससे ब्रिटिश सरकार जरूर सवालों के घेरे में आती है। यह पूछा जा सकता है कि उस कथित जांच के निष्कर्षों को लेकर ब्रिटेन ने क्या किया? शुरुआती दिनों में उसने मोदी की आलोचना जरूर की थी। लेकिन जब राष्ट्रीय क्षितिज पर मोदी का सितारा चढ़ने लगा, तो उसके बाद से जिस तरह ब्रिटेन समेत तमाम पश्चिमी देशों के बीच उनसे तार जोड़ने की होड़ लगी, वह लोगों को याद है। 2014 के बाद भी ब्रिटेन या यहां तक कि बीबीसी ने भी भारत की सत्ताधारी पार्टी की वैचारिक जड़ों की पड़ताल की कोई गंभीर कोशिश नहीं की। तो क्या अब यूक्रेन युद्ध में मोदी सरकार की नीति से पश्चिम में पैदा हुई नाराजगी नए प्रयास का कारण है? या पिछले अगस्त में ब्रिटेन के लीस्टर में हुए दंगों ने बीबीसी की आंख खोली है?

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