बरबाद, फेल देश छोड़ कहां जाएं लोग?

त्रासदियां भुले हुए को, बिछुड़ों को मिलाती हैं। हाल की त्रासद घटना ने मुझे अपनी उस पुरानी दोस्त से फिर मिला दिया जिसे मैं सालों से भूली बैठी थी। मैं रैने से 2006 में तब मिली थी जब हम दोनों सेंट एंड्र्यू में साथ पढ़ते थे। उस समय मैं पहले साल में थी और वह वहां पहले से एब्राड छात्र के रूप में थी। वह मेरी अध्यापक की खास थी। उन्ही के घर क्रिसमस के मौके पर दिए गए खाने में आखिरी बार रैने से मेरी बात हुई। उस मौके पर जितने लोग आए थे, उनमें सिर्फ मैं ही भारतीय थी और शाकाहारी भी। पर रैने ने मेरा पूरा ख्याल रखा, एक अभिभावक की तरह। रैनेआजी लेबनान की रहने वाली हैं, ऐसी जिन्होंने मुझे एकदम से मोह लिया था। उनका लहजा, बादाम जैसी आंखें, मोहक मुस्कान, अपने देश का रोमानी जोश देख उसके शहर बेरूत पर मुझे सोचने को मजबूर किया।  मुझे याद पड़ता है कि उस वक्त मैंने उससे कहा था कि मैं तुमसे मिलने एक दिन बेरूत आऊंगी।

‘तुम्हें जरूर आना चाहिए, मैं तुम्हें सब घुमाऊंगी, बहुत ही खूबसूरत है… और यह पूरब का पेरिस है, तुम्हें बहुत अच्छा लगेगा।’ वो मुस्कुराई और मैंने वादा किया। लेकिन लेबनान का मेरा प्लान पिछले तेरह साल में कभी पूरा नहीं हो पाया। लेकिन पिछले दिनों जब बेरूत में भयानक विस्फोट हुआ, तबाही देखी तो मुझे उसकी याद हो आई। मैंने उसे खोजा और खोजखबर ली तो रैने का कहना था- यह साल काफी मुश्किलों भरा रहा है, इतना संकटमय कि जो खुशी, उत्साह और जोश 2006 के वक्त में था, वह सब अब खत्म हो चुका है!

बेरूत में हुए धमाकों में रैनी और उसका परिवार तो दूर था, वह बच गया, लेकिन उससे जो तबाही हुई है, उसका मानसिक आघात पूरे परिवार को लगा है। वह कहती है कि मैं इस देश में उम्मीद खो चुकी हूं। लगातार सोच रही हूं कि इस देश को छोड़ दूं। लेकिन दोबारा से सब कुछ शुरू कर पाना भी मुश्किलों भरा है।

उसकी बाते, लेबनान की बरबादी के फोटो -दास्तां से समझ आया कि लीडरशीप यदि खराब हुई तो वह देश भी नहीं बच सकता जो कभी पूर्व का पेरिस था। मध्यपूर्व की वित्तिय- सांस्कृतिक राजधानी था। बेरूत के विस्फोटो को देख दुनिया हिली। धुएं के उठते गुबारों से काला हुआ आसमान, जमीन पर चारों ओर तबाही का मंजर जिसमें लगा मानों जमीन सब कुछ निगल गई। बड़ी संख्या में घर खंडहरों में तब्दील, घरों की दीवारें, दरवाजे खिड़कियां कुछ नहीं बचीं, केवल मलबे का ढेर और जहां इमारते बची भी, वहां सिर्फ जली हुई दीवारें थीं। इन्हीं के बीच जा कर लोग अपना बचा-खुचा खोजने हुए। मलबे के ढेर में दफन यादों पर सोचते हुए।

सचमुच सोशल मीडिया से लेकर टेलीविजन तक पर हम जो कुछ देख-सुन रहे थे, वह दहला देने वाला मंजर था। बेरूत से चीखें निकल रही थीं, और दुनिया यह सोचते हुए आहत दिखी कि आखिर जो कुछ हुआ, वह हुआ क्या, कैसे और क्यों हुआ, क्यों यह विपत्ति आई, खासतौर से ऐसे वक्त में जब दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही है।

शायद लेबनान को अंदाजा था कि आने वाले दिनों में कोई अनहोनी हो सकती है। यह देश दशकों से गंभीर संकटों और समस्याओं से जूझता आ रहा है। गृहयुद्ध से लेकर क्षेत्रीय विवाद, खस्ता माली हालत से लेकर कोविड जैसे संकटों ने देश को पहले से ही अनिश्चितता के भंवर में झोंक रखा था।

आधुनिक लेबनान का आजादी के अस्सी सालों में ज्यादातर वक्त युद्धों और विवादों में बीता है। वक्त-वक्त पर होने वाले विद्रोह, लड़ाईयों के कारण राष्ट्र निर्माण पर ध्यान बहुत कम रहा। कह सकते है भौगोलिक नक्शे पर इस देश की जो सामरिक स्थिति है, वही उसके खराब वक्त का कारण है,। हिसाब से लेबनान पूरब और पश्चिम के बीच एक पुल के रूप में लाभ लिए हुए होना चाहिए था। जैसा कि लेबनानी राजनयिक चार्ल्स मलिक ने 1952 में कहा था कि- लेबनान के साथ दोनों मोर्चों पर विश्वासघात हुआ है, इसके अरब और इजराइली पड़ोसियों द्वारा और साथ ही पश्चिम के दखल से। लेकिन मूल वजह आजादी के बाद इस देश में अपनाई गई राजनीतिक व्यवस्था है। ओटोमन साम्राज्य के दौरान हुए विकास से प्रभावित लेबनानियों को लगा था कि इस राजनीतिक व्यवस्था से वे न सिर्फ अरब जगत में अपनी खास जगह बना लेंगे, बल्कि लोकतांत्रिक रूप से लेबनानियों की एकता भी बनाए रख सकेंगे। नवंबर 1943 में आजाद लेबनान ने राजनीतिक सांप्रदायिकता को स्वीकार-सा लिया। कुछ लोगों का कहना है कि देश में पंद्रह साल तक चला गृहयुद्ध नाकाम राजनीतिक व्यवस्था से था, जबकि कुछ लोगों का दावा हैं कि इस व्यवस्था की वजह से गृहयुद्ध का खात्मा हुआ और अंततः तैफ समझौते का रास्ता बना। 1989 में हुए इस समझौते में जहां विधायी, वित्तीय, सांप्रदायिक सुधार के सुझाव शामिल थे, वही संसद के लिए चुने जाने वाले सांसदों को ईसाई और मुसलमान में समान  संख्या में बांटने का तरीका है तो ईसाई राष्ट्रपति,  शिया मुसलमान को संसद का अध्यक्ष व राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री किसी सुन्नी मुसलमान को बनाने का खांचा है।

1989 के समझौते से नए सिरे से देश के विभिन्न समुदायों के बीच राजनीतिक सत्ता का बंटवारा बना। तैफ समझौते में सीरिया की रवानगी भी हुई।  दो दशकों से सीरिया (जो लेबनान के राजनीतिक फैसलों में भारी दखल रखता था) और इजराइल ने लेबनान के जिन हिस्सों पर कब्जा कर रखा था वहां से 2005 तक विदेशी सैनिकों की वापसी हुई। ईरान के लिए लेबनान किसी जन्नत से कम नहीं रहा है। यही से 2006 में शिया हिजबुल्लाह ने महीने भर तक इजराइल के खिलाफ जंग छेड़े रखा। वह जंग लेबनान में इजराइली कब्जे के विरोध में थी। 2013 में हिजबुल्लाह ने ऐलान किया कि वह सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद की सत्ता के खिलाफ भी है तो उसके बाद लेबनान के राजनीतिक परिदृश्य में दरारें बनने लगी। नतीजा यह हुआ कि उस पर पाबंदियां लगा दी गईं और खाड़ी से आने वाले पैसे में भारी कमी आई। यह पैसा पर्यटन और प्रवासी लेबनानियों से आने वाली करेंसी का था। फिर, सीरिया की लड़ाई का लेबनान पर असर हुआ। बेरूत और इसके आसपास के इलाकों पर  राकेटों से हमले हुए। लेबनान में सीरियाई युद्ध का सबसे भयावह परिणाम यह था जो पैंतालीस लाख की आबादी वाले इस देश में पंद्रह लाख लोग बतौर शरणार्थी घुस आए। अंतरराष्ट्रीय संगठनों को लेबनान ने कई बार चेताया कि शरणार्थियों के कारण उसकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति बिग़डती जा रही है, लेकिन चेतावनी को नजरअंदाज किया जाता रहा।

पूरे घटनाक्रम और हालातों में सांप्रदायिक बंटवारे,  समाज में वैमनस्यता, लोगों के एक दूसरे को संदेह और नफरत से देखने और शर्णार्थियों की समस्या से वह सबकुछ हुआ जिसे देख दुनिया ने लेबनान को अपने हाल पर मरने के लिए छोड़ दिया। लेबनान में कोई एक तानाशाह नहीं है, कई हैं। सत्ता में कई धर्मों और दर्जनों राजनीतिक दलों की वजह से वहां की राजनीतिक व्यवस्था बुरी तरह से ध्वस्त है। तभी अब 1989 का तैफ समझौता खत्म सा माना जा रहा है।

लेबनान आज चौराहे पर खड़ा है। सवाल है कि जिस व्यवस्था ने कभी आपको सर्वश्रेष्ठ होने का गौरव दिलाया हो, उससे अब कैसे निकला जाए? मुल्क अप्रत्याशित आर्थिक संकट से गुजर रहा है। इतिहास में पहली बार इस साल मार्च में इस देश ने अपने कर्ज चुका पाने में हाथ खड़े कर दिए। लेबनान पर 92 अरब डॉलर का कर्ज है जो इसकी जीडीपी का 170 फीसद बैठता है। यह दुनिया में सबसे ज्यादा कर्ज अनुपात है। इस देश में न नौकरियां हैं, न रोजी-रोटी कमाने के मौके बचे हैं। ऐसे में कैसे लेबनान के लोग अपने आंदोलनों, क्रांतियों से देश का पुनर्निर्माण कर पाने में भागीदार बन पाएंगे? लेबनानी लोगों का कहना है कि फोनिक्स दोबारा से और मजबूत बनने के लिए खुद जलता है। सवाल है कि क्या लेबनान फिर से ऐसा कर पाएगा?

रैने कहती है सोच रही हूं कि इस देश को छोड़ दूं। रैनी की तरह ही लाखों लेबनानी परिवार होंगे जो देश छोड़ने के बारे में विचार कर रहे होंगे। पर सवाल है कि जाएं तो कहां। उनके लिए दुनिया में ऐसी कौनसी जगह बची है जहां अब उम्मीदें बाकी हैं?

3 thoughts on “बरबाद, फेल देश छोड़ कहां जाएं लोग?

  1. लेबनान के बारे में पढ़कर बहुत अच्छा लगा कोई देश इस तरह से संकट में गुजर रहा हो उसकी जानकारी पढ़ने को मिलना और मुश्किल होता है लेकिन यह लेख एकदम सटीक जानकारी दे रहा है इसके लिए श्रुति को बहुत-बहुत साधुवाद

  2. लेबनान के बारे में सारगर्भित जानकारी अच्छी लगी। आलेख में आपने सम्पूर्ण खाका खींच दिया है।

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