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Saturday, April 17, 2021
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तृणमूल कांग्रेस में शुरू भगदढ़

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किसी ने सही ही कहा है कि राजनीति में ना तो कोई स्थाई दोस्त होता है और न ही स्थाई दुश्मन। हाल ही में इसका उदाहरण तब देखने को मिला जब तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी के सबसे करीबी माने जाने वाले नेता सुवेंदु अधिकारी ने उनसे दूर जाने के संकेत दिए। ऐसा माना जाता है कि ममता बनर्जी को सत्ता में लाने में उनकी बहुत अहम भूमिका रही थी। जिस नंदीग्राम से ममता बनर्जी ने सत्ता में आने के पहले अपना आंदोलन शुरू किया था वे उस इलाके में काफी प्रभावशाली नेता माने जाते हैं।

मगर उन्होंने हाल ही में ममता बनर्जी से अपनी दूरी दिखाते हुए कहा कि अब उनके साथ मिलकर काम कर पाना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है। इसके साथ ही उन्होंने ममता बनर्जी के मंत्रिमंडल से इस्तीफा भी दे दिया। अब उनकी भावी रणनीति पर अटकले लगाई जाने लगी है। क्योंकि कुछ माह बाद पश्चिम बंगाल में विधान सभा चुनाव होने जा रहे हैं।

सुवेंदु अधिकारी इस राज्य के बहुत प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। उनके पिता व टीएमसी सांसद शिशिर अधिकारी से ममता बनर्जी ने पार्टी विरोधी काम करने वालों से निकाल पाने का अनुरोध किया। सुवेंदु अधिकारी ने हाल ही में राज्य परिवाहन व सिंचाई मंत्री पद से इस्तीफा दिया है। वे 15वीं व 16वीं लोकसभा के सांसद भी रह चुके हैं। वे तामलुक चुनाव क्षेत्र से टीएमसी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतते आए हैं।

मनमोहन सिंह सरकार में ग्रामीण विकास राज्य मंत्री शिशिर अधिकारी के बेटे सुवेंदु की उम्र 50 साल है। माना जाता है कि वामपंथियों को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए नंदीग्राम में बनाई गई भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति का गठन करने व उसे सक्रिय बनाने में उनकी अहम भूमिका थी। वे कोंटाई विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। उन्होंने माकपा के जाने माने नेता लक्षमण सेठ को हराया था।

जब 2007 में वहां की तत्कालीन वामपंथी सरकार ने नंदीग्राम में 10,000 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर वहां स्पेशल इकोनामिक जोन बनाने व टाटा की नैनो फैक्टरी को लाने की कोशिश की तो उसके खिलाफ सुवेंदु ने ही सबसे पहले अपना आंदोलन छेड़ा था। बाद में ममता बनर्जी उस आंदोलन से जुड़ गई थ। इसकी परिणति वामपंथी सरकार के पतन से हुई। तब राज्य सीआईडी ने आरोप लगाया था कि सुवेंदु ने राज्य सरकार के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष करने के लिए माओवादियों को हथियार सप्लाई किए थे।

नंदीग्राम में अधिकारी की सफलता को देखते हुए ममता बनर्जी ने उन्हें नंगल, महत, पश्चिमी येदिगपुर, पुरूलियां व कुकुम का पर्यवेक्षक बना दिया था। उन्होंने इस जिले में पार्टी का जनाधार बढ़ाया व 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने तामलुक सीट से माकपा व कांग्रेस के साझा उम्मीदवार लक्षमण सेठ को 1.73 लाख वोटो से हराया था। उन्होंने 2016 के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस व माकपा के साझा उम्मीदवार अब्दुल काहिर खान को पराजित किया। उनकी मेहनत का फल यह निकला कि 2011 के विधानसभा चुनावों के दौरान ममता बनर्जी ने वामपंथी सरकार का 34 साल पुराना राज उखाड़ फेंका।

शहरी लोग माकपा के शासन से नाराज थे व ममता बनर्जी का मुसलमानों पर काफी प्रभाव था। जनवरी 2016 में चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार से पश्चिम बंगाल के विधान सभाओं के क्षेत्र का पुर्ननिर्धारण किए जाने की अनुमति मांगी ताकि भारत व बांग्लादेश के बीच हुई भूमि की अदला बदली के बाद यहां आए लोगों को मतदाता सूची में शामिल किया जा सके। जब चुनाव आयोग ने जनवरी 2016 में अपनी मतदाता सूची प्रकाशित की तो केंद्र सरकार घबरा गई क्योंकि वहां जनसंख्या व वोट का अनुपात देश में सबसे ज्यादा था। पश्चिम बंगाल में 6.55 करोड़ मतदाता थे। इनमें से 3.39 करोड़ पुरुष व 3.16 करोड़ महिला मतदाता। वहां 3 जनवरी 2016 को चुनाव के पहले माल्दा के कालीचक इलाके में भीड़ ने हिंसा की। ममता बनर्जी की सरकार पर हालात से ठीक से न निपटने के आरोप लगे।

इस दौरान शारदा वित्तीय घोटाले में ममता बनर्जी के पार्टी नेताओं द्वारा रिश्वत लेने, नारदा स्टिंग आपरेशन के साथ-साथ कोलकत्ता फ्लाईओवर गिरने के मामले भी सामने आ गए। इसके बावजूद ममता बनर्जी किसी तरह से सत्ता में आने में कामयाब रही। ऐसा माना जाता है कि उन्हें सत्ता में लाने में सुवेंदु अधिकारी की अहम भूमिका रही। क्योंकि अधिकारी व उनके परिवार का इस क्षेत्र पर पूरी तरह से अधिपत्य रहा है। माना जाता है पिछले दो दशक से शिशिर अधिकारी व उनके बेटे सुवेंदु अधिकारी लगातार लोकसभा व विधानसभा के चुनाव जीत-जीतकर इस क्षेत्र में टीएमसी का जनाधार बहुत मजबूत कर रहे हैं।

दोनों लोग तीन-तीन बार लोकसभा व विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं। सुवेंदु के छोटे भाई दिव्येंदु अधिकारी भी 2009, 2011 व 2016 की विधानसभा सीट जीतते आए हैं। अन्य भाई सौमेंदु अधिकारी नगर पालिका के अध्यक्ष हैं। ममता बनर्जी भी सुवेंदु अधिकारी व उनके परिवार की भूमिका को देखते हुए उनकी काफी इज्जत करती आई हैं। जंगलमहल, येदीनीपुर इलाके में सुवेंदु का काफी व्यक्तिगत प्रभाव हैं। यहां नौ लोकसभा व 63 विधानसभा की सीटें आती हैं। ऐसा माना जाता है कि सुवेंदु 20-30 सीटो पर चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। वे पार्टी व श्रम यूनियनो में बहुत प्रभावशाली माने जाते हैं। हल्दिया के उद्योगों व पार्टी ट्रस्ट में उनका काफी प्रभाव है।

इसका सीधा अर्थ है कि वे पूर्वी व पश्चिमी मेदिनीपुर में अपनी जीत के लिए टीएमसी के अन्य नेताओं की तरह ममता पर आश्रित नहीं हैं। बताते हैं कि कभी टीएमसी में दूसरे नंबर पर रहे मुकुल राय को सुवेंदु का पार्टी का प्रभाव कम करने के लिए सुवेंदु अधिकारी के समर्थको के पर कतरने शुरू किए थे तब से वह उनसे नाराज हो गए व 2017 मुकुल राय के भाजपा में शामिल होने के बाद जब ममता बनर्जी ने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को अहमियत देनी शुरू की तो उनका व सुवेंदु का आपसी टकराव बढ़ा। क्योंकि ममता उन्हें अपने व टीएमसी के उत्तराधिकारी के रूप में पेश करने लगी थी।

जब अभिषेक ने प्रशांत किशोर की मदद से पार्टी चलानी शुरू की तो यह टकराव और ज्यादा बढ़ गया। लोकसभा में पार्टी नेता. कल्याण बनर्जी व शहरी विकास मंत्री फरहाद हकीम उन पर सीधे हमले करने लगे। ऐसे में सुवेंदु ने मंत्री पद से इस्तीफा देकर पार्टी व भाजपा दोनों को ही संकेत दे दिए हैं। ताकि चुनावो के मद्देनजर भाजपा उनसे मोलभाव करे। माना जाता है कि उनके ऐसा करने से कम-से-कम आधा दर्जन मंत्री व विधायक ममता बनर्जी का साथ छोड़ सकते हैं। देखना यह है कि सुवेंदु बनर्जी का अगला कदम क्या होता है। टीएमसी के लोग दीदी के साथ जाते हैं या दादा के साथ। इस बीच टीएमसी छोड़ों का सिलसिला शुरू हो गया है। एक और मंत्री ने उससे इस्तीफा दे दिया है।

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