कलियुगी बीमारी और लक्षण - Naya India
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कलियुगी बीमारी और लक्षण

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हम ओलंपिक-नोबेल-ज्ञान-विज्ञान-सत्य की वास्तविकता में गरीब, दरिद्र होने का कलियुगी जीवन लिए हुए हैं तो यह सच श्रीमद्भागवत से चला आ रहा है।…बाकी सभ्यताओं में शरीर ऐसा नहीं क्योंकि कलियुगी कैंसर के मारे सिर्फ हम हैं। बाकी सभ्यताओं ने पृथ्वी और जीवन को यदि कर्मलोक, जिंदगी के भोग का मौका माना है जबकि हिंदू दिमाग, उसका चित्त यदि पृथ्वी को मृत्युलोक व  संसार निसार की मान्यता में जीता हुहै तो हिंदू का शरीर न तो किंगकांग होगा और न दिमाग से अल्बर्ट आइंस्टीन!

भारत कलियुगी-15: लब्बोलुआबः बेसुध, बेहोश जीवन!

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भारत कलियुगी-16:  आखिर कैसे बना हिंदू जीवन का अंधकार काल?  इस पर विचार से पहले जानना चाहिए कि हिंदू धर्मग्रंथों ने हमारे कलियुगी जीवन के क्या लक्षण बताए हैं? जवाब श्रीमदभागवत गीता से लेकर रामचरितमानस आदि ग्रंथों के श्लोक, चौपाई, दोहों में है। इन्हीं के आधार पर मैं हिंदू कलियुगी जीवन के डायग्नोसिस को तीन हिस्सों में बाटंता हूं- हिंदू शरीर-जीवन, हिंदू समाज-धर्म और हिंदू देश-व्यवस्था-राजनीति। इन तीनों अंगों में जीवन जीने के तरीके, दशा-दिशा के सार में ये प्रतिनिधि दस लक्षण गागर में सागर हैं- शरीर-जीवनः1- शारीरिक बल व याद्दाश्त और सत्य में दिनों दिन गिरावट (श्रीमद्भागवत,12.2.1)। 2- लोग छोटी-घटिया दृष्टि-बुद्धि वाले, अभागे, पेटू, कामी व दरिद्र होंगे (श्रीमद्भागवत,12.2.31)| धर्म-समाजः 3- घटिया लोग साधु बन जीविका चलाएंगे और प्रवचनों का ढोंग रचेंगे (श्रीमद्भागवत,12.2.38)| 4- पुरूष-स्त्री का साथ रहना स्वार्थ और मजबूरी में, व्यापार कपट से और ब्राह्मणत्व सिर्फ जनेऊ पहन लेना मतलब ज्ञान-विद्धवता से नहीं (श्रीमद्भागवत,12.2.3)। 5- चिकनी-चुपड़ी, चमचागिरी, झूठ से बात बनाने वाला विद्वान् पंडित माना जाएगा (श्रीमद्भागवत,12.2.4)। 6- गरीब का जीवन दो कौड़ी का और दिखावा सफलता की कुंजी (श्रीमद्भागवत,12.2.5)। 7- जैसे-तैसे जी लें, पेट भरण और परिवार पालन हो जाए तो जीवन सार्थक व धर्म की पालना का मकसद अपनी वाहवाही बनाना  (श्रीमद्भागवत,12.2.6)। देश-व्यवस्थाः 8- पैसे और संपत्ति से ही व्यक्ति को महत्व, जिसकी लाठी उसकी भैंस अनुसार न्याय व्यवस्था (श्रीमद्भागवत,12.2.2)। 9- सर्वत्र भ्रष्टाचार और जो जाति अपने को बलवान दिखलाएगी उसकी सत्ता होगी (श्रीमद्भागवत,12.2.7)| 10- शरीर आकार छोटा, राजा चोर और प्रजा झूठ, चोरी व व्यर्थ हिंसा में जीती हुई और नागरिक गधों जैसे (श्रीमद्भागवत,12.2.15)।

भारत कलियुगी-14: जान लें, जीना नहीं हमारा जीना!

यह डायग्नोसिस क्या 21वीं सदी के भारत की हकीकत नहीं है? सोचें, सदियों पहले महर्षि व्यास ने भगवद्गीता लिखते हुए और मध्य काल में रामचरितमानस लिखते वक्त तुलसीदास ने हिंदू जीवन के जीने के अनुभव को जान-समझ कर श्लोक व चौपाई से एक्सरे कर क्या खूब बेबाक-सत्य रिपोर्ट लिखी! तभी सोचें महर्षि व्यास से लेकर आज तक बीमार जीवन जीना क्या हिंदुओं के पाप और पतन का चिरतंन मामला नहीं है? दूसरे शब्दों में हम हिंदू हजारों सालों से लगातार बीमार जीवन जी रहे हैं बावजूद इसके हमारी बुद्धि, हमारी मानसिक दशा ऐसी सड़ी हुई कि हम रोते-चिल्लाते हुए भी नहीं! समझ में नहीं आने वाली बात है कि हजारों सालों में किसी धर्मगुरू, कथित अवतार, समाज-सुधारक, राजा या नेता ने यह आंदोलन क्यों नहीं चलाया कि पहला और सर्वोच्च मकसद घटिया जीवन के कारणों से मुक्ति है। मतलब धर्म, कौम, देश की नंबर एक जरूरत कलियुगी दुर्गुणों को मारना है, उसका पहले वैक्सीन बनाना है।

यह मकसद आधुनिक काल में हर हिंदू का इसलिए भी बना हुआ होना चाहिए था क्योंकि दो सौ सालों से हम बाकी सभ्यताओं, पृथ्वी की बाकी नस्लों, देशों को देखते हुए हैं। उनके जीवन से अपने कलियुगी जीवन की तुलना होनी चाहिए थी। पर शायद हमारा दिमाग छोटा है, कुएं में जीता हुआ है तभी आज तक संभव नहीं हो पा रहा है कि बाकी सभ्यताओं के आइने में हम अपने को देखें-समझें।

कलियुगी भारत-13: कोरोना मंदिर, मोदी मंदिर!

वैसे तुलना कर सकना असंभव काम है। इसलिए कि अपने कलियुगी जीवन में धर्म-अध्यात्म-गुलामी के ऐसे मंत्र, ऐसे अनुभव हैं, जिनके कारण बाकी सभ्यताओं व मानवशास्त्र के इतिहास के आइने में यह सोच पाना टेढ़ा काम है कि उनके और हमारे जीने में जिंदादिली बनाम मुर्दादिली का फर्क कैसे बना? एक अमेरिकी, एक चाइनीज, एक शेख मुसलमान से हिंदू जीवन व्यवहार, आचरण, विचार अलग तरह से विकसित है तो फर्क की वजह को जांचना बहुविषयी शोध से भी मुश्किल बनेगा। मानवशास्त्र (एंथ्रोपोलॉजी), इतिहास, धर्म-राजनीति, समाज-समाजशास्त्र, मनोविज्ञान की मल्टी डिसिप्लनेरी, बहुविषयी पड़ताल के बिना यह जानना-जांचना असंभव है कि कैसे 140 करोड़ लोग कलियुगी बीमारी के मारे हैं? बीमारी की जड़ों में क्या कुछ है? पृथ्वी की बाकी सभ्यताओं के लोग कैसे भीमकाय, ओलंपिक जीतने वाले शरीर लिए हुए हैं तो हम अपना औसत शरीर बकौल श्रीमदभागवत के लक्षणों के अनुसार ‘शारीरिक बल’ में हल्का और औसत दिमाग, ब्रेन छोटी-घटिया दृष्टि व बुद्धि लिए हुए हैं!

मोटे तौर पर हमें और दुनिया दोनों को हिंदू शरीर और उसके जीवन के लक्षण मालूम हैं लेकिन वे कारण याकि शरीर-दिमाग की बीमारी की वजह, जड़ और फिर जड़ का फैलाव वैसे ही गुमनामी में है, जैसे शरीर में कैंसर के रोग या कोविड-19 वायरस की उत्पत्ति का मामला रहस्यमय है!

कलियुगी भारत-12: ठहरा वक्त, रिपीट इतिहास!

सभ्यता, नस्ल की बीमारी की जड़ पकड़ना असंभव मसला है। ले देकर लोगों के आचरण, विचार को पकड़ कर मानसिक दशा की मनोवैज्ञानिक पड़ताल से यह सोचना होगा कि यदि लोग जीवन को ही असार समझ कर मृत्युलोक की धारणा में जी रहे हैं तो ऐसा दिमाग की किन ‘चित्त’ वृत्तियों से है।

यहां वापिस हिंदू धर्म की मान्यता का सहारा लें। व्यक्ति शरीर दरअसल दिल-दिमाग की धड़कनों के ‘चित्त’ की चेतनता लिए हुए होता है। ‘चित्त’ तीन तरह के ट्रैक से उद्वेलित-धड़कते-चलते हुए होता है। ये हैं- मानस, अहंकार और बुद्धि। इससे तर्क-विचार-भावना के जो अंकुर होते हैं वे शरीर व्यवहार की ‘वृत्ति’ बनाए हुए होते हैं।

उस नाते हिंदू शरीर जैसा ‘चित्त’ जैसी ‘वृत्ति’ लिए हुए है वहीं जीवन जीने की बुनावट है। यह बुनावट परंपरा, वंशानुगत संस्कार, मेमोरी-स्मृति, परिवेश और शिक्षा व अनुभव में बनी-पकी और जीती हुई है। उस नाते भौतिक कारकों और बदलते वक्त के मुकाबले अहम रोल संस्कार और शिक्षा और उससे बनी मानसिक अवस्था व बुद्धि का है। यदि दिमाग किसी एक बात या बातों के कुछ सूत्रों में बंधा है तो फिर वह जड़ (जाहिल) है। दिल-दिमाग का चित्त यदि कुएं में स्वर्ग बनाए बैठा है तो शरीर न तो कुएं से बाहर दुनिया मानेगा और न बाहर निकल देखने-समझने का कौतुक, ‘वृत्ति’ लिए हुए होगा। यदि किसी ने मान लिया है कि हजारों साल पुरानी फफूंद लगी बरनी में भरा हुआ पुराना अचार ही जिंदगी का स्वाद है या किसी ने मान लिया है कि पृथ्वी मृत्युलोक है और जीना अगले जन्म या परलोक के लिए है तो फिर उसकी जिंदगी टाइमपास, मुर्दनगी लिए हुए रहेगी।

इसी सत्य के चलते तब शरीर न भीमकाय होगा, न किलिंग इंस्टिक्ट लिए होगा, न ओलंपिक विजेता होगा और न बुद्धि नोबेल पुरस्कारों की हकदार!… याद करें ऊपर उल्लेखित श्रीमद्भागवत में हिंदू जीवन-शरीर के कलियुगी लक्षण के श्लोक एक और दो की इन लाइनों को- शारीरिक बल व याददाश्त और सत्य में दिनोंदिन गिरावट और लोग छोटी-घटिया दृष्टि-बुद्धि वाले, अभागे व दरिद्र होंगे।

कलियुगी भारत-11: बड़े दिमाग की छोटी खोपड़ी!

सो, हम ओलंपिक-नोबेल-ज्ञान-विज्ञान-सत्य की वास्तविकता में गरीब, दरिद्र होने का कलियुगी जीवन लिए हुए हैं तो यह सच श्रीमद्भागवत से चला आ रहा है। तब भी यह समझने में असमर्थ कि हजारों साल से चले आ रहे सिलसिले का नतीजा है जो उपयोग न होने से, बाकी सभ्यताओं के मुकाबले हमारा शरीर बल और ब्रेन छोटे हैं। बाकी सभ्यताओं में शरीर ऐसा नहीं क्योंकि कलियुगी कैंसर के मारे सिर्फ हम हैं। बाकी सभ्यताओं ने पृथ्वी और जीवन को यदि कर्मलोक, जिंदगी के भोग का मौका माना है और हिंदू दिमाग, उसका चित्त यदि पृथ्वी को मृत्युलोक, संसार निसार माने बैठा  है तो हिंदू का शरीर न तो किंगकांग होगा और न दिमाग से अल्बर्ट आइंस्टीन!

तभी कलियुगी कैंसर हिंदू शरीर की वह ‘अबूझ गांठ’ है, जिसकी बीमारी में पृथ्वी और मानवता के लगभग एक-चौथाई मनुष्यों का मर-मर कर जीना है।…. सवाल है कैसे बूझा जाए इस ‘अबूझ गांठ’ को? (जारी)

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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