बुद्धि जड़ (जाहिल), जीवन बूढ़ा! - Naya India
बेबाक विचार | हरिशंकर व्यास कॉलम | शब्द फिरै चहुँधार| नया इंडिया|

बुद्धि जड़ (जाहिल), जीवन बूढ़ा!

बुद्धि जड़ bhaarat kaliyugee

कलियुगी दिमाग सोचता हुआ नहीं है। वह ठहरा हुआ, जड़, कुंद, मंद की उस मानसिक विकलांगता में है, जिसमें न चेतना है, न बोध-समझ के तंतु हैं और न जिज्ञासा। पूरी तरह अवैज्ञानिक चित्त, कूपमंडूक वृत्तियां और गैर-साइंटिफिक दिमाग।.. दरअसल सभ्यता का अपना सफर और इतिहास भ्रम और भटकने की कई गांठे लिए हुए है। उनसे बुद्धि बंधी हुई है, जिन्हें सुलझाने, खत्म करने का किसी भी वक्त में, किसी भी युगपुरूष के हाथों प्रयास नहीं हुआ। तभी बुद्धि कैंसर वंशानुगत ट्रांसफर होता गया।

भारत कलियुगी-16: कलियुगी बीमारी और लक्षण

भारत कलियुगी-17: कलियुगी हिंदू शरीर की अबूझ कैंसर गांठ बुद्धि है। दरअसल हिंदू का जीवन सफर विचित्र व उलटा रहा है! बचपन में बुढ़ापे वाले काम और जवानी में बुढ़ापा व भक्ति और गुलामी! मैं विस्तार से पहले लिख चुका हूं कि सभ्यताओं के पालने में सप्तसिंधु के भरतवंशियों की चेतना-बुद्धि गजब दौड़ी थी। उन्होंने वेद रचे। प्रकृति को साधा। सनातन जीवन पद्धति का ध्यान, चिंतन-मनन किया। स्मृति-श्रुति परंपरा में जीवन तत्वों का ज्ञान-विज्ञान-सत्य शोध किया तो वहीं नगर विकास भी सोचा। चार-पांच हजार साल पहले के उस बाल काल में गणित, विज्ञान, दर्शन, पतजंलि, चार्वाक, बुद्ध आदि की तमाम धाराएं थी। वह समझ भारत का अपूर्व बौद्धिक बल था। ….लेकिन जल्द उलटा-पुलटा। बचपन खत्म होता उससे पहले ही बुढ़ापे का वैराग्य दर्शन, पृथ्वी मृत्युलोक और निर्वाण के ख्याल दिमाग में आ पैठे।…. और शुरू हुआ बुद्धि भ्रम में जीना। बुद्धि भटकी, कलियुग बना और धर्म-अध्यात्म में वह गुलगपाड़ा हुआ, जिसने दिमाग में इतने घाव, इतने बंधन, इतनी गांठें बनाईं कि उसके कैंसर में धीरे-धीरे व्यक्ति, समाज, देश सबकी बुद्धि जड़-जाहिल-सड़ी हो गई।

भारत कलियुगी-15: लब्बोलुआबः बेसुध, बेहोश जीवन!

सारा मामला शरीर मष्तिष्क का, बुद्धि के अनुभव व विकास का है। बुद्धि मनुष्य जीवन का आधार है। बुद्धि से ही धर्म-ज्ञान-विज्ञान और सत्य है। बुद्धि से जीवन जीने का अर्थ है कि जिंदगी को रियलिटी में जीते हुए समस्याओं-चुनौतियों का हल निकालें। जिंदादिली से जिंदगी जीएं। कर्म करें और पृथ्वी को स्वर्ग बनाएं। यदि बुद्धि नहीं होती तो पृथ्वी, बह्म, ब्रह्माण्ड के सत्य की इंसान को न सुध होती और न इंसान के भगवान व धर्म बनते और न चिंपांजी के होमो सेपिंयस मानव आज होमो डायस याकि देवता बनने की और बढ़ते हुए होते। सो, जो कुछ भी है उसकी धुरी बुद्धि से खोजी सच्चाईयां हैं।

सब कुछ याकि मनुष्य जीवन, समाज, सभ्यता-संस्कृति की सारी व्यवस्था की जड़ है बुद्धि और विचार।

तभी उसका कैंसरग्रस्त होना हिंदुओं का कलियुग है। भरतवंशी लोगों ने बचपन में क्योंकि बुढ़ापे का, संन्यास का, बुद्धम शरणम् गच्छामि का अनुभव ले डाला है तो उससे जीना स्वाभाविक तौर पर परलोकगामी, मुर्दादिली वाला बना। संसार की सांसारिकता देख दिल-दिमाग भटका। सांसारिक दुखों के सोच-विचार में बुद्धि ऐसी भटकी कि दस तरह के मानसिक विकार पैदा हुए। कर्मकांड बने। मूर्तियां बनीं। यही नहीं चक्रवर्ती राजा भी बुद्धि-कर्म को छोड़ निर्वाण के फेर में संन्यासी हुए और तलवार अहिंसा परमो धर्म की बालसुलभ मासूमियत का शो-पीस बन गई।… सब व्यक्तिगत पुण्य, आत्मा और अहम के केंद्र में होते गए। तभी चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक, समुद्रगुप्त, हर्षवर्धन आदि तमाम भरतवंशी राजाओं ने साम्राज्य भले बनाए लेकिन व्यक्ति केंद्रित अहम की घुट्टी में और बिना सामूहिक सभ्यतागत पताका की जागरूकता-समझ बनवाने और फहराने के।

भारत कलियुगी-14: जान लें, जीना नहीं हमारा जीना!

मैं भटका हूं। कह सकते हैं यह हजारों साल के अनुभव का सरलीकरण है। सही बात है। पर जरा नस्ल-भरतवंशी सभ्यता के प्रारंभ-बचपन के उस ‘चित्त’ पर विचार करें, जिसका बचपन प्रतिभा का झंडा गाढ़ते-गाढ़ते अचानक जगत मिथ्या, वैराग्य और निर्वाण का वनवास बना बैठा। ऐसा होना कितना अजब है!

मूल बात पर लौटें। दिमाग अपना पुराना है लेकिन पुराने वक्त को मेमोरी में फिक्स करके हमने बुद्धि के कैंसर को पीढ़ी-दर-पीढ़ी, वंशानुगत ट्रांसफर करने का छद्म अध्यात्म-धर्म पसारा हुआ है। तभी बुद्धि न नई रियलिटी बूझ पाती है और न नया, मौलिक निर्माण हो पाता है। दिमाग हजारों साल पुरानी फंफूद लगी बरनी में सड़ा पड़ा है। ऐसा सड़ा अचार, जिससे लगातार एक सा कलियुगी आचार-विचार-स्वाद है। उसमें वर्तमान, नए वक्त, नए टेस्ट का मतलब नहीं है। सो, आश्चर्य नहीं कि मौजूदा वक्त यदि कोविड-19 वायरस के संकट, रियलिटी को लिए हुए है तो बुद्धि उस पर सत्यता से विचार करने, आचरण और सत्य खोजने में असमर्थ है। पुराना दिमाग हमें ले देकर फंफूद लगी बरनी में जमा याददाश्त से गाय, गोमूत्र, गोबर व काढ़े-आयुर्वेद के उपचार सुझाता है। मतलब महामारी और चुनौतियां नई लेकिन लोक बुद्धि पांच हजार पुराने नुस्खों को याद करते हुए। जाहिर है हमारा शरीर धड़कता हुआ, ऑक्सीजन लेता हुआ आज है लेकिन दिमाग और बुद्धि का जीना पुराने वक्त, पुराने समाधान, पुराने अचार, पुराने अध्यात्म, पुराने जीवन दर्शन व पुराने नुस्खों में है। तभी कलियुगी हिंदू की बुद्धि और उसके शरीर जीवन में तालमेल नहीं है। दोनों एक दिशा में नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे से पीठ किए हुए, एक-दूसरे की विपरीत दिशा में चलते हुए हैं। शरीर वायरस में चलता हुआ और बुद्धि गोमूत्र और गोबर में!

सोचें, जिंदगी 21वीं सदी के सन् 2021-22 में सांस लेती हुई लेकिन बुद्धि वेदकालीन गोवंश आश्रित जीवन पर टिकी हुई! महामारी नई लेकिन उपचार चेचक महामारी के वक्त में जैसे देवी अराधना की थी उस परंपरा में कोरोना देवी की मूर्ति बनाना। नई महामारी की हकीकत, उसकी तासीर को समझ कर नया समाधान निकालने के बजाय बुद्धि पुराने उपायों की जुगाली, जुगाड़ में!

कलियुगी भारत-13: कोरोना मंदिर, मोदी मंदिर!

जाहिर है दिमाग सोचता हुआ नहीं है। वह ठहरा हुआ, जड़, कुंद, मंद की उस मानसिक विकलांगता में है, जिसमें न चेतना है, न बोध-समझ के तंतु है और न जिज्ञासा है। पूरी तरह अवैज्ञानिक चित्त, कूपमंडूक वृत्तियां और गैर-साइंटिफिक दिमाग।

सवाल है 140 करोड़ लोगों के अस्तित्व, हजारों सालों के अनुभव, संकटों-चुनौतियों-समस्याओं के सत्य में बुद्धि, दिमाग के तंतु क्यों नहीं खदबदाते हुए होने चाहिए? दिमाग क्यों नहीं साइंटिफिक होने को फड़फड़ाता हुआ? क्यों नहीं पंख फैला कर वह सत्य खोज में उड़ता हुआ?

कई वजह है। सभ्यता का अपना सफर और इतिहास भ्रम के कई जाले लिए हुए है। बुद्धि उन गांठों में बंधी है, जिन्हें सुलझाने, खत्म करने का किसी भी वक्त में, किसी युगपुरूष के हाथों प्रयास नहीं हुआ। तभी बुद्धि कैंसर वंशानुगत ट्रांसफर होता रहा।

बुद्धि कैंसर की गांठों में पहला शुरुआती खराब तंतु, धर्म-अध्यात्म का भ्रमजाल है। इसे बारीकी से समझना होगा। सतयुग में मनुष्य और प्रकृति के रिश्तों पर ध्यान-चिंतन-मनन से भरतवंशी ऋषि-मुनियों ने जिंदगी के सनातनी जीवन की एक पद्धति बनाई। उस गंगोत्री की ही उपधाराओं में हमारे पूर्वजों ने एक गलती की। उस धारा को पकड़ कर जीवन-दर्शन, हिंदू फिलॉसफी बनाई गई, जिसमें बीज मंत्र आत्मा, परमात्मा, परलोक और कर्मकांड थे। राजसी-इहलौकिक धारा नहीं पकड़ी, बल्कि परलोक आंकाक्षी सात्विक-तामसी की ऐसी मिक्स फिलॉसफी बन गई कि न घर के रहे और न घाट के। बुद्धि का मामला कैसा दीर्घकालीन, हजारों-हजार साल की सोच, मानसिक दशा और सभ्यता-देश की निर्णायकता बनवाता है इसका सबूत ईसा पूर्व का वह वक्त है, जब भारत ने कर्मकांड, अहिंसा परमो धर्म, बुद्धम शरणम् गच्छामि की धारा में अपने को बहाया।

कलियुगी भारत-12: ठहरा वक्त, रिपीट इतिहास!

तभी बुद्धि भ्रम का दूसरा जाला व्यर्थ संसार और मुर्दादिल जीवन दर्शन का है। यह सर्वाधिक गंभीर मसला है। सवाल है पृथ्वी को क्या मानें? यह जीवन लोक है या मृत्युलोक? हमें पृथ्वी पर दमखम से, पूर्णता से जीवन जीना चाहिए या मौत बाद के परलोक के मुर्दा दर्शन में वक्त पास करना चाहिए? धड़कते शरीर को जिंदादिली से जीयें या मौत की चिंता की मुर्दादिली से? यह संसार जीवन और आनंद के लिए है या मौत और सांसारिक दुखों से पिंड छुड़ाने के लिए? हमें संसार को भोगना है या संसार से मुक्ति की शांति पानी है? यों बाकी धर्मों, सभ्यताओं में भी ईश्वर, जन्नत की फिलॉसफी है लेकिन जितने विस्तार से हिंदू जीवन में पृथ्वी को निसार, मृत्युलोक बना कर लोगों की दैनंदिनी को बांधा गया है वैसा दूसरे धर्मों में नहीं है। इस्लाम में सामूहिक-समुदायी मकसद प्राप्ति व जन्नत का जीवन लक्ष्य है वहीं ईसाईयत में प्रभु को जानना, ईश्वरीय महिमा-उनके किंगडम के बोध, आनंद, सच्चा होते हुए इर्द-गिर्द को बेहतर बनाने का अनुयायियों से आह्वान है। ठीक विपरित हिंदू निजी तौर पर, व्यक्ति स्तर पर, शरीर को परलोक के लिए अजर-अमर बनाने के धर्म-कर्म का ताना-बाना लिए हुए है। व्यक्ति को, शरीर विशेष को जन्म-मरण के पाप-पुण्य में जन्म-जन्मांतर, 84 लाख योनियों में जीने का उसे एक वह चक्र मिला है, जिसे मानने का अर्थ है पृथ्वी सचमुच मृत्युलोक और जीवन मुक्ति यात्रा की महज एक सीढ़ी!

इस चक्र के तीन भयावह दुष्परिणाम हैं। एक, जीने की जिंदादिली हाशिए मे। दो, हिंदू बुद्धि-शरीर का आत्मकेंद्रित, अहम केंद्रित, व्यक्तिवादी केकड़ाई चरित्र! तीन, सब कुछ जीवन चक्र के अनुसार पूर्व निर्धारित। भाग्य-नियति अनुसार।

कलियुगी भारत-11: बड़े दिमाग की छोटी खोपड़ी!

तीसरी कैंसर गांठ बुद्धि की भयाकुलता है। जीवन फिलॉसफी जब व्यक्ति केंद्रित मोक्ष की बनी और सामूहिक विचार-मंथन भी जगत मिथ्या, अंहिसा परमो धर्म, बुद्धम शरण गच्छामि का हुआ तो भला तलवार का पौरूष कैसे बचा रह सकता था। तभी ईसा बाद खैबर दर्रों के पार से हमले शुरू हुए तो चुनौती के आगे बुद्धि नासमझ और बिना तैयारियों के थी। करें तो क्या करें और ईश्वर रक्षा करें, रक्षा के लिए भगवान अवतरित होंगे आदि की सोच ने फिर हिंदुओं को विदेशियों का ऐसा गुलाम बनाया कि वैसा पृथ्वी पर दूसरा कोई उदाहरण नहीं। हिंदू सभ्यता की गुलामी का अनुभव सर्वज्ञात है लेकिन यह अहसास कम जानकारों को है कि दीर्घकालीन गुलामी ने हिंदू की बुद्धि, चित्त, वृत्ति, व्यवस्था और मनोदशा को स्थायी तौर पर दास, दीन-हीन बनाया है। 140 करोड़ लोगों का सन् 2021 का वक्त हो या सन् 1950 का वक्त हिंदू हजार साल से सदा-सनातनी ‘हुकूम’ गुलामी और भक्ति में जीता हुआ जैसे था वैसे है। तलवार-सत्ता-कोतवाल-हाकिम का भय हिंदू ‘चित्त’ व दिमाग के तंतुओं-रेशों में इस कदर गहरे जड़ें जमाए हुए है कि व्यक्ति की चेतना हो या नस्ल-देश की वह कभी पंख फड़फड़ा कर उड़ नहीं सकते। गुलामी और भय से हमारी बुद्धि बिना पंख के है सो, उड़ने का सवाल नही। हम वह साहस, वह जज्बा, वह मेहनत, वह साधना, वह उड़ान भरने में समर्थ नहीं हैं, जिससे ओलंपिक, नोबेल जीत सकें या मौलिक और नया निर्माण-अनुसंधान बतौर वैश्विक नेतृत्व से कर पाएं। इसका दुष्परिणाम है जो भय के चलते रियलिटी, सत्य का सामना नहीं करते। सत्यवादी होने की निडरता-निर्भीकता नहीं।

बुद्धि कैंसर की चौथी गांठ अहंकार, अहम, पाखंड, और मुगालतों की है। हम क्योंकि सतयुग भोग कर आए हुए हैं तो अपने को विश्वगुरू समझते हैं। हमें अहंकार है कि सब कुछ जानते हैं। परमज्ञानी हैं। इसी के साथ यह मुगालता व संतोष भी है कि पहले तो हमें जिंदगी की सभी चुनौतियों-समस्याओं से निपटने के टोटके, उपाय, जुगाड़ मालूम हैं। और यदि ज्यादा मुसीबतें आईं तो भगवान खुद अवतार ले कर हमें संभालने आएंगे। सो, एक तो सतयुग की याद, मेमोरी से बना स्वभाव है तो दूसरी और भक्ति-आस्था से भगवानजी का भरोसा! उस नाते हर तरह के सिनेरियो में कलियुगी बुद्धि का जुगाड़ है। सन् 2020 में वायरस आया तो हम ताली-थाली-दीये की ऊर्जा से 21 दिनों में विजय हो गए। कुछ कमी रह गई तो आयुर्वेद की बरनी से हमने काढ़ा, कोरोनिल, गोमूत्र, गोबर आदि को निकाल उनसे निदान बना डाला!

बुद्धि कैंसर की पांचवीं गांठ हजारों सालों से अजब-गजब भटके-गुलाम अनुभवों से दिमाग का बूढ़ा जाना है। इससे औसत हिंदू का शरीर, सभ्यता, नस्ल, कौम सबका मामला घिसा और छोटा है तो छोटे ब्रेन और मन-आत्मा के बूढ़े-बोझिल अस्तित्व का सत्य अलग गंभीर है। दिमाग का तंत्र उन तंतुओं, उन रेशों को लिए हुए नहीं है, जिससे चुनौती आए तो बुद्धि भभका मार, जिंदादिली से आधुनिक तकनीक, ज्ञान-विज्ञान-सत्य को साधने में जुट जाए, बड़ी और जवान हो जाए। दिमाग के तंतुओं का अपना ताना-बाना ऐसा बूढ़ा, जर्जर और सड़ा है कि मष्तिष्क चेतना में कीलिंग इस्टिंक्ट तो दूर फुरफरी भी नहीं बनेगी। हां, झूठ, पलायन, झूठे संतोष, खामोख्याली और मुंगेरीलाल के सपनों से नींद में शरीर का चलना जरूर शुरू हो जाएगा। (जारी)

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
दिल्ली में बिना टीका लगाए लोग कहां से आए?
दिल्ली में बिना टीका लगाए लोग कहां से आए?