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निरंतरता बनाए रखने की राहुल की चुनौती

भारतीय जनता पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में चल रही भारत जोड़ो यात्रा को लेकर जो कहा है वह बहुत महत्व की बात है। इससे पहले अमित शाह ने संभवतः कभी भी राहुल गांधी की राजनीति को लेकर सार्वजनिक रूप से कोई सकारात्मक टिप्पणी नहीं की होगी। लेकिन एक न्यूज एजेंसी को दिए इंटरव्यू में राहुल गांधी की यात्रा को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा- मैं हमेशा मानता हूं कि नेताओं को कड़ी मेहनत करनी चाहिए। यह अच्छा है कि कोई कड़ी मेहनत करता है लेकिन राजनीति में हमेशा निरंतर प्रयासों से सफलता मिलती है इसलिए इंतजार कीजिए और देखिए। मीडिया के एक वर्ग ने इसे ऐसे प्रचारित किया, जैसे अमित शाह ने राहुल गांधी की तारीफ की। उन्होंने तारीफ नहीं की, बल्कि वस्तुस्थिति को बयान किया। उन्होंने स्वीकार किया कि राहुल गांधी कड़ी मेहनत कर रहे हैं। उनके कहे का निष्कर्ष यह है कि अगर इसकी निरंतरता कायम रहती है तो सफलता मिल सकती है।

राहुल गांधी के नेतृत्व में हो रही कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा का यह बेहद वस्तुनिष्ठ आकलन है। अमित शाह ने किस मकसद से यह बात कही, गुजरात के चुनाव को उनकी यह बात कैसे प्रभावित करेगी या भाजपा ने कांग्रेस की इस यात्रा की साख बिगाड़ने के लिए क्या क्या किया वह अपनी जगह है। भाजपा के दूसरे नेता यात्रा को लेकर क्या कह रहे हैं वह भी अलग बात है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस यात्रा को लेकर कहा था कि कांग्रेस के एक नेता पदयात्रा कर रहे हैं लेकिन उनकी यात्रा पद के लिए है। इसके बावजूद अमित शाह ने एक लाइन में यात्रा की सारगर्भित व्याख्या की। इसमें कोई संदेह नहीं है कि राहुल गांधी कड़ी मेहनत कर रहे हैं। उन्होंने अपनी प्रचारित छवि से उलट एक गंभीर और परिश्रमी नेता की छवि बनाई है। यह भी सही है कि उनकी यात्रा को बहुत अच्छा रिस्पांस मिला है। अभी तक यात्रा जहां से भी गुजरी है वहां पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ साथ आम लोगों का समर्थन भी इसे मिला है।

किसी भी यात्रा या राजनीतिक अभियान से लोगों का जुड़ना और उसको समर्थन देना या उसमें भीड़ जुटना बड़ी बात नहीं होती है। भारत बुनियादी रूप से राजनीति पसंद करने वाले और नेताओं के करिश्मे से जुड़ने वाले नेताओं का देश है। यहां हर कार्यक्रम में भीड़ जुट जाती है। हर राजनीतिक अभियान में लोग कुछ न कुछ ऐसा खोज लेते हैं, जो उनकी धारणा के अनुकूल होता है। पिछले दो दशक के तमाम राजनीतिक व सामाजिक अभियानों में इसे देख सकते हैं। चाहे दिल्ली में इंडिया अगेंस्ट करप्शन का आंदोलन हो या काले धन को लेकर किया गया बाबा रामदेव का प्रदर्शन हो या सूचना के अधिकार का आंदोलन हो, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी, उनकी मां और उनकी बहन की पदयात्राएं हों या ममता बनर्जी और शरद पवार के अलग पार्टी बना कर राजनीति करने का मामला हो या अरविंद केजरीवाल के नई पार्टी बनाने का मामला हो, सबके साथ लोग जुटे। उन लोगों को सफलता भी मिली, जिन्होंने अपने अभियान के मोमेंटम को जारी रखा, अभियान से मिली ताकत को समझदारी के साथ नतीजों में बदलने की रणनीति बनाई और अभियान समाप्त होने के बाद भी सक्रियता कम नहीं की। सो, राहुल गांधी की यात्रा की भी असली चुनौती यह है कि वे अगले साल फरवरी के पहले हफ्ते में यात्रा समाप्त होने के बाद कैसे इसके संवेग को बनाए रखेंगे? यात्रा समाप्त होने के बाद की उनकी क्या योजना है? क्या उसके बाद वे कोई नई यात्रा करेंगे या इस यात्रा से बने मोमेंटम का इस्तेमाल अपनी पार्टी के राजनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए करेंगे?

हो सकता है कि कांग्रेस के पास कोई योजना हो क्योंकि जो बात अमित शाह कह रहे हैं वह कांग्रेस के नेता भी समझ रहे हैं। वे जानते हैं कि पांच महीने तक राहुल गांधी पैदल चलने के बाद अगर बैठ गए और नतीजा मिलने का इंतजार करने लगे तो यह सारी कवायद बेकार हो जाएगी। सो, सवाल है कि कांग्रेस यात्रा के बाद की क्या तैयारी कर सकती है? यात्रा पूरी होने के बाद कांग्रेस को क्या करना है यह समझने के लिए पार्टी को बहुत ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है। कांग्रेस को सिर्फ इतना करना कि जिन राज्यों से अभी तक यात्रा गुजरी है वहां के हालात की वस्तुनिष्ठ समीक्षा करे। यह पता लगाए कि यात्रा गुजर जाने के बाद प्रदेश और जिला कमेटियों ने क्या किया? प्रदेश और जिला कमेटियों ने यात्रा की समीक्षा की या नहीं और अगर समीक्षा की तो आगे की उनकी क्या योजना है? वे टेंट, लाउडस्पीकर, कैटर्रस और ट्रांसपोर्ट का हिसाब करने और उसके भुगतान में बिजी हो गए या यात्रा से बने माहौल को राजनीतिक लाभ में बदलने के लिए कोई योजना बनाई?

अगर पत्रकारिता की भाषा में कहें तो स्टोरी ब्रेक करना जितनी बड़ी बात होती है उससे ज्यादा बड़ी और जरूरी बात फॉलोअप स्टोरी की होती है। अगर फॉलोअप स्टोरी नहीं होगी तो चाहे जितनी भी बड़ी खबर रही हो उसे अंत परिणति नहीं पहुंचाया जा सकता है। एक मिसाल गुजरात के मोरबी की पुल दुर्घटना की है। दो-तीन दिन की सनसनी के बाद स्टोरी अखबारों, चैनलों से गायब हो गई। कोई फॉलोअप स्टोरी नहीं हुई और नतीजा यह है कि एक महीने बाद तक न कोई बड़ा अधिकारी गिरफ्तार हुआ और न पुल के रखरखाव में भारी गड़बड़ी करने वाली कंपनी के मालिकों पर कोई कार्रवाई हुई। उसी तरह हर राजनीतिक अभियान की समाप्ति के बाद उसके फॉलोअप कार्यक्रम की जरूरत होती है। जिले से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक कांग्रेस को फॉलोअप प्लान बनाने और उस पर अमल की जरूरत है। तभी कांग्रेस इस यात्रा के मोमेंटम को अगले चुनाव तक जारी रख पाएगी और इसे राजनीतिक पूंजी में बदल पाएगी।

राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश में अपनी यात्रा के दौरान कहा कि भारत जोड़ो यात्रा ने उनको बदला है। पहले वे एक दो घंटे में ऊब जाते थे और चिढ़ जाते थे लेकिन अब आठ घंटे तक धैर्य बनाए रख सकते हैं। ध्यान रहे राजनीति बहुत धीरज का काम है। अगर यात्रा ने राहुल को इतना बदला है कि वे धैर्य रख सकते हैं, लोगों की बात सुन सकते हैं, धीरज के साथ राजनीतिक योजना बना सकते हैं, लोगों से सहज रूप से मिल सकते हैं तो निश्चित रूप से इस यात्रा का लाभ मिलेगा। जिस समय उनकी यात्रा समाप्त होगी उस समय संसद का बजट सत्र चल रहा होगा। सो, वे इस सत्र में शामिल होंगे और उसके बाद जब सत्र के बीच एक महीने का अवकाश होगा तो उस समय कांग्रेस के अधिवेशन की तैयारी हो रही है, जिसमें नए अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के चुनाव पर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की मुहर लगाई जाएगी। उसके बाद फिर बजट सत्र का दूसरा हिस्सा होगा और फिर कर्नाटक के चुनाव शुरू हो जाएंगे। तभी यह देखने वाली बात होगी कि यात्रा के बाद राहुल क्या करते हैं? वे पहले की तरह रिलैक्स होने के लिए विदेश जाते हैं या देश में जमे रहते हैं? वे अभी की तरह रोज 10 घंटे या उससे ज्यादा राजनीति करते हैं, लोगों से मिलते हैं या अपनी कोटरी से घिर कर बैठ जाते हैं? वे राज्यों के सघन दौरे करते हैं और यात्रा से बनी अपनी छवि को कांग्रेस की राजनीतिक पूंजी में बदलने का प्रयास करते हैं या दिल्ली में अपनी कोठी में बैठ कर राजनीति करते हैं? जैसा कि अमित शाह ने कहा है कड़ी मेहनत की निरंतरता जारी रहती है या नहीं? इन सवालों के जवाब जब मिलेंगे, तभी यात्रा के वास्तविक हासिल का अनुमान लगाया जा सकेगा।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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