वाह! फिरोज खान, पढ़ाओ, डटे रहो

पहले मुझे लगता था कि शिक्षा इंसान को उदार बनाती है। मगर पिछले कुछ दिनों से जो कुछ देख पढ़ रहा हूं उससे लगता है कि मेरा सोचना एकदम गलत था। हम जितना पढ़-लिख रहे हैं उतना ही पीछे लौट रहे हैं व कई बार तो ऐसा लगता है कि मानो पाषण काल की ओर बढ़ रहे हैं। नवीनतम मामला एक मुसलमान द्वारा हिंदुओं को संस्कृत पढ़ाए जाने का है। जिसका कुछ कट्टर हिंदू छात्र विरोध कर रहे हैं।

यह मामला बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान विभाग में श्री फिरोज खान द्वारा संस्कृत पढ़ाने का है। इस युवा प्रोफेसर को कुछ छात्र संस्कृत पढ़ाने से रोक रहे हैं। उनके मुसलमान होने के कारण विरोध स्वरूप धरने पर बैठ गए हैं। विरोध का नेतृत्व करने वाले स्कालर कृष्ण कुमार का कहना है कि जो व्यक्ति हमारे धर्म से न जुड़ा हो वह हमारी भावनाओं व संस्कृति को कैसे समझ सकता है?

हालांकि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का प्रशासन उनके समेत तमाम छात्रों को यह कह चुका है कि संस्कृत साहित्य पढ़ाने का धर्म से कुछ लेना देना नहीं हैं। हालांकि जयपुर के निकट बगरू में रहते आए इस युवा प्रोफेसर का कहना है कि उन्होंने दूसरी कक्षा से ही संस्कृत पढ़नी शुरू कर दी थी। मेरे इलाके में 30 फीसदी लोग मुसलमान है मगर कभी किसी ने मुझे ऐसा करने से नहीं रोका। मौलवी तक ने मुझे नहीं रोका। मैं जितना संस्कृत साहित्य के बारे में जानता हूं उतना तो कुरान के बारे में भी नहीं जानता हूं। मुसलमान होने के बावजूद संस्कृत साहित्य के प्रति मेरे ज्ञान को लेकर जाने माने हिंदू पंडित मेरी सराहना करते हैं।

फिरोज खान के पिता रमजान खान ने भी बीए में संस्कृत पढ़ी थी। फिरोज खान कहते हैं कि मैं इस बात पर कैसे सहमत हो सकता हूं कि अगर मुझे वेद, धर्म शास्त्र व ज्योतिष पढ़ानी हो तो मेरा हिंदू होना बेहतर होगा। शिक्षा का जाति व धर्म से कुछ लेना देना नहीं है। बताते हैं कि उनके बाबा जब राजस्थान में हिंदू भजन गाते थे तो उन्हें सुनने वाले हिंदुओं की भीड़ उन्हें घेर लेती थी। असली समस्या तब पैदा हुई जबकि वे संस्कृत पढ़ाने के लिए बीएचयू पहुंचे।

पहले मुझे लगता था कि हमारे देश व समाज में कुछ रंग, खाने-पीने की चीजे व पोशाके ही धर्म से जुड़ी हुई हैं। मगर अब लगता है कि भाषा व विद्वता भी धर्म के साथ जुड़ गई हैं। जैसे कि मेरा शुरू से मानना रहा है कि नारियल हिंदू हैं व खजूर मुसलमान है। हरा रंग इस्लाम का प्रतिनिधितव करता है तो केसररिया हिंदू स्वरूप का प्रतीक हैं। धोती हिंदू धर्म का प्रतीक है तो बुरका इस्लाम का। हिंदू लंबा व चौड़ा पायजामा पहनते हैं तो मुसलमान ऊंचा पतले पायमी वाला पैजामा।

नाग हिंदू है व इजारबंद मुसलमान। खीर हिंदू है व फिरनी मुसलमान। बिरयानी मुसलमान है तो पुलाव हिंदू। हिंदू का प्रिय दिन मंगलवार है तो मुसलमानो का शुक्रवार। हिंदू तवे पर जिस तरह से रोटी सेंकते है उसके विपरित मुसलमान उल्टे तवे पर रोटी सेंकते हैं। हिंदू व्रत खत्म होने पर खाना खाते है व मुसलमान व्रत शुरू होने के पहले रोजे के दौरान सुबह उठकर सरगी खाते हैं। मांसाहारी हिंदू कोई भी मांस खाते हैं जबकि मुसलमान हलाल किया हुआ मीट ही खाते हैं।

जब कानपुर में रहता था तो वहां आर्यनगर इलाके में एक मांस विक्रेता ने अपनी दुकान के बाहर एक बोर्ड लगाया था जिस पर लिखा था कि यहां हिंदू बकरो का गोश्त मिलता है। मैंने वह तस्वीर खींचकर धर्मयुग नामक प्रतिष्ठित पत्रिका में भेजी। जोकि छपी और उस पर काफी विवाद हुआ। पहले मुझे लगता था कि पढ़ने-लिखने के कारण हमारे अंदर ज्यादा उदारता आती है और हम चीजों को बेहतर ढंग से समझने लगते हैं। मगर कई बार लगता है कि मैं इस बारे में गलत साबित हो रहा हूं।

मेरे एक मित्र ने जोकि पहले बैंक में मैनेजर रह चुके हैं मुझे बताया कि जब मेरी पत्नी बीमार बेटे की नजर उतारने लगी तो उसने चिढ़कर कहा कि आप मेरे ऊपर क्या टोना टोटका कर रही है। पिछले कुछ सालों में महज इस बात पर हमले होते देखें कि कौन क्या खाता-पीता है। पूरे देश में मांस लेकर जा रहे लोगों को गौवंश की हत्या करने पर उन्मादी भीड़ ने अपना निशाना बनाया। दिल्ली में महाराष्ट्र सदन में बीफ (बड़े पशु जैसे भैंसा) आदि के मांस का इस्तेमाल किए जाने पर बवाल हुआ। अब लोग यह तय करेंगे कि कौन क्या खाए और क्या ना खाए।

मुझे अच्छी तरह से याद है कि भाजपा के एक बहुत बड़े नेता ने मुसलमानों की आलोचना करते हुए कहा था कि यह पतले-पतले और ऊंचे-ऊंचे पायजामे पहनने वाले। मगर अब लगता है कि पानी सिर के ऊपर से बढ़ने लगा है। बीएचयू जैसे विश्वविद्यालय के पढ़े-लिखे छात्र यह कहकर आंदोलन कर रहे हैं कि एक मुसलमान को संस्कृत पढ़ाने का कोई अधिकार नहीं है। डाक्टरेट की उपाधि से विभूषित यह छात्र बेहद मेधावी है व संस्कृत के विद्वानो की एक टीम द्वारा इस पद के लिए चुना गया था। इसका चयन करने वाली समिति में शामिल एक पूर्व उपकुलपति के मुताबिक वह तो हीरा है।

मुझे सबसे जयादा गुस्सा नेताओं और विश्वविद्यालय प्रशासन पर आ रहा है जिन्होंने इतने अहम मुद्दे पर चुप्पी साध ली है व आंदोलनरत छात्र उनके खिलाफ भजन कीर्तन कर रहे हैं। मेरा मानना है कि प्रशासन को आंदोलनरत छात्रों को विश्वविद्यालय से बाहर निकाल कर फिरोज खान को पढ़ाई के काम में लगा देना जाना चाहिए।

यह देखकर मुझे एक घटना याद आती है। जब मैं दिल्ली आया था तब यहां रात भर माता के जागरण किया जाना बहुत लोकप्रिय था। जिसमें उनके भजन होते थे। एक बार मैं एक चर्चित मंडली के जागरण में गया। आधी रात होने पर भक्तों को नींद आने लगती है। तब उस मंडली ने रात एक बजे एक सिख गायक को मंच पर उतारा। जोकि हाथ में रंगा हुआ घड़ा लेकर बजाता था। उसने जनता को सक्रिय बनाने के लिए सवाल पूछने शुरू कर दिए कि माता की चुनरी में कितने रंग होते हैं। एक भक्त ने कहा कि बारह। उसने उन्हें मंच पर बुलाकर जोर से पूछा कि मेरे बारह या तेरे बाहर। उसने जवाब में क्या कहा वह तो नहीं पता पर इस घटना के बाद सब लोग फूट-फूटकर हंसने लगे और वहां का माहौल एकदम बदल गया।

चूंकि एक सिख होते हुए उसने ऐसी बात कहीं थी। अतः लोगों ने उसकी काफी सराहना की मगर यहा तो हम फिरोज खान की तारीफ करने के बजाए उसका विरोध कर रहे हैं जिसे सख्ती से कुचला जाना चाहिए। ध्यान रहे कि इसी विश्वविद्यालय में डा. ऋषि शर्मा उर्दू पढ़ाते हैं जबकि काशी विद्यापीठ को संस्कृत की शिक्षिका डा नाहिद आबिदी को पद्मश्री से नवाजा जा चुका है। किसी ने ठीक ही कहा है कि जाति न पूछो साधू की, पूछ लीजिए ज्ञान।

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