nayaindia Congress rahul gandhi modi कांग्रेस पर हमले का बड़ा मतलब
kishori-yojna
बेबाक विचार | नब्ज पर हाथ| नया इंडिया| Congress rahul gandhi modi कांग्रेस पर हमले का बड़ा मतलब

कांग्रेस पर हमले का बड़ा मतलब

Congress rahul gandhi modi

राजनीति को लेकर कही गई फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट की कई बातें सूत्र वाक्य का दर्जा रखती हैं। उन्हीं में से एक बात यह है कि ‘इन पोलिटिक्स, नथिंग हैपेन्स बाई चांस। इफ इट हैपेन्स, यू कैन बेट इट वाज प्लान्ड दैट वे’। राजनीति में कुछ भी अनायास नहीं होता है। सब कुछ योजनाबद्ध होता है और अगर आपको लगता है कि कोई चीज अनायास हो गई है तो इसका मतलब है कि उसकी योजना उसी तरह से बनाई गई थी। तभी यह मानना चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार दो दिन संसद के दोनों सदनों में कांग्रेस पर बेहद तीखा हमला किया तो वह अनायास नहीं था। वह सुनियोजित था और किसी बड़ी राजनीति का हिस्सा था। ऐसा कतई नहीं है कि प्रधानमंत्री को पता नहीं था कि उनको राष्ट्रपति के अभिभाषण पर सरकार की ओर से पेश धन्यवाद प्रस्ताव पर संसद के अंदर हुई चर्चा का जवाब देना है। वे धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई चर्चा का ही जवाब दे रहे थे, लेकिन कांग्रेस पर हमला करके अभिभाषण में कही गई सारी बातों से सबका ध्यान हटा दिया।

लगातार दो दिन दोनों सदनों में कांग्रेस पर इतने तीखे और जहरीले हमले को भले विपक्षी पार्टियां ‘स्तरहीन’ भाषण बताएं, लेकिन प्रधानमंत्री ने इसका इस्तेमाल सरकार की कमियों को छिपाने के लिए किया। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलते हुए राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने बहुत कायदे की बात कही थी। उन्होंने रेलवे की भर्ती परीक्षा के नतीजों की गड़बड़ी को लेकर आंदोलन कर रहे छात्रों पर लाठी चलाने और आंसू गैस के गोले छोड़ने की घटना का हवाला देते हुए कहा कि छात्रों और नौजवानों की पीड़ा को राष्ट्रपति के अभिभाषण में जगह क्यों नहीं मिली? उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति पूरे देश के होते हैं और उनका अभिभाषण बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है। अगर उसमें हमारे समय की तकलीफों को जगह नहीं मिलेगी तो वह कागज का एक पुलिंदा भर रह जाएगा।

प्रधानमंत्री को भी यह पता है कि देश और उसके नागरिक इस समय किस तरह की तकलीफों से गुजर रहे हैं। उनको यह भी पता है कि उन तकलीकों का जिक्र किसी सरकारी दस्तावेज नहीं किया जा रहा है। उन तकलीफों और नागरिकों की पीड़ा पर चर्चा न हो इसलिए प्रधानमंत्री ने अभिभाषण की बातों पर बोलने की बजाय दूसरा रास्ता पकड़ा। उन्होंने कांग्रेस के बारे में ऐसी ऐसी बातें कहीं कि राजनीतिक भाषणों के प्रत्यक्ष व परोक्ष मतलब को बखूबी समझने वाले भी पलटवार करने लगे और इस तरह से एक सुनियोजित योजना कामयाब हो गई।

कांग्रेस पर प्रधानमंत्री के तीखे हमले का एक मकसद सरकार की विफलताओं से ध्यान हटाना और उन पर चर्चा नहीं होने देना है तो दूसरा मकसद कांग्रेस को वापस राजनीतिक लड़ाई में ले आना है। वह ज्यादा बड़ा मकसद है। देश और राज्यों की राजनीति में कांग्रेस का कमजोर होकर खत्म होना भाजपा के लिए अच्छा नहीं है क्योंकि कांग्रेस को हराना भाजपा के लिए हमेशा ज्यादा आसान रहा है। अगर कांग्रेस खत्म होती है और उसकी जगह कोई दूसरी प्रादेशिक पार्टी मजबूत होती है तो भाजपा उससे लड़ने में सफल नहीं हो पा रही है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी का उभरना इसकी मिसाल है।

भाजपा ने 2013 के चुनाव में कांग्रेस को हरा दिया था। उसने 32 सीटें जीती थीं और आम आदमी पार्टी दूसरे स्थान पर रही थी, जिसको 28 सीटें मिली थीं। लेकिन दिल्ली में जैसे ही कांग्रेस खत्म हुई और आम आदमी पार्टी ने उसकी जगह ली, भाजपा के लिए उसे हराना नामुमकिन हो गया। उसके बाद के दो चुनावों में भाजपा की सीटें दहाई में भी नहीं पहुंचीं और आज भाजपा व नरेंद्र मोदी के लिए आम आदमी पार्टी ज्यादा बड़ी चुनौती बन गई है।

यही खतरा नरेंद्र मोदी और भाजपा को उत्तर प्रदेश में दिख रहा है। अगर वहां कांग्रेस कुछ नहीं कर पाती है और समाजवादी पार्टी मजबूत ताकत के रूप में उभरती है तो उसे हराना या आगे के चुनावों में रोकना भाजपा के लिए मुश्किल होगा। प्रधानमंत्री मोदी को असली चिंता 2024 के चुनाव की है। अगर इस बार उत्तर प्रदेश में सपा जीत जाती है तो दो साल बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में भी उससे कड़ी टक्कर होगी। पश्चिम बंगाल में यह खतरा पहले ही खड़ा हो गया है।

कांग्रेस और लेफ्ट के खत्म होने से ममता बनर्जी के रूप में एक ऐसा प्रतिद्वंद्वी उभर गया है, जिससे मुकाबला भाजपा के लिए मुश्किल हो गया है। इसी तरह का संकट भाजपा पंजाब में देख रही है। अगर पंजाब में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी जीत जाती है तो वह देश की राजनीति को बदलने वाला घटनाक्रम होगा। उसके बाद केजरीवाल और उनके ब्रांड की राजनीति को रोकना मुश्किल हो जाएगा। वे दिल्ली मॉडल दिखा कर अगर पंजाब जीतते हैं तो फिर पंजाब मॉडल दिखा कर देश की राजनीति करेंगे।

politics narendra modi opposition

Read also ईश्वर कराए भक्तों के बीच झगड़े?

ध्यान रहे केजरीवाल की कोई विचारधारा नहीं है। उनकी पार्टी ‘पोस्ट आइडियोलॉजी’ वाली पार्टी है और गवर्नेंस मॉडल पर बनी व चल रही है। दूसरे, केजरीवाल की हिंदू पहचान राहुल गांधी की तरह नहीं है। वे वैश्य समाज के हैं और अपने को हर समय किसी न किसी तरह से मोदी से बेहतर हिंदू साबित करने में लगे रहते हैं। वे हिंदू मतदाताओं में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को समझते हैं और तभी उन्होंने मोदी पर हमला बंद कर दिया है। ‘द हिंदू’ अखबार की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस साल अभी तक उन्होंने अपने किसी ट्विट में मोदी का नाम नहीं लिखा है और प्रधानमंत्री पर भी हमला नहीं है। पिछले पूरे साल उन्होंने सिर्फ पांच ऐसे ट्विट किए, जिसमें प्रधानमंत्री को निशाना बनाया लेकिन एक भी ट्विट में नरेंद्र मोदी का नाम नहीं लिखा। वे एक अखिल भारतीय जाति से आते हैं, हिंदुवादी राजनीति करने में नहीं हिचकते हैं और उत्तर भारत में मुफ्त बांटने की राजनीति बिगबैंग की तरह उन्होंने ही शुरू की थी। इसलिए वे बड़ा खतरा बन सकते हैं।

तभी प्रधानमंत्री ने सुनियोजित तरीके से संसद में लगातार दो दिन कांग्रेस पर हमला किया और कांग्रेस को मुकाबले में ला दिया। इसका सीधा मैसेज है कि भाजपा की लड़ाई कांग्रेस से है। भाजपा का विकल्प कांग्रेस है और भाजपा के लिए खतरा भी कांग्रेस है। प्रधानमंत्री की इस रणनीति को जाने-अनजाने में राहुल गांधी ने आगे बढ़ा दिया है। उन्होंने प्रधानमंत्री के भाषण के बाद कहा कि मोदी कांग्रेस से डरते हैं। डरते हैं या नहीं डरते हैं यह अलग बात है। लेकिन वे मैसेज यहीं देना चाहते थे कि कांग्रेस चुनौती है।

इसका तात्कालिक फायदा यह हो सकता है कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट में कंफ्यूजन हो और उनका थोड़ा रूझान कांग्रेस की तरफ भी दिखे। इससे समाजवादी पार्टी को नुकसान होगा। दूसरा फायदा पंजाब में होगा। प्रधानमंत्री के कांग्रेस से सीधी लड़ाई दिखाने से सिख, जाट सिख किसान, जो भाजपा के पूरी तरह से खिलाफ हैं उनमें कांग्रेस के लिए सहानुभूति बनेगी। ऐसा लग रहा है कि भाजपा और नरेंद्र मोदी की पहली प्राथमिकता समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी को रोकने की है। इसलिए कांग्रेस को मुकाबले में लाने की राजनीति हो रही है। लेकिन इसके साथ ही कांग्रेस की साख भी बिगाड़नी है। उसे आम हिंदू और मध्यवर्गीय मतदाताओं के बीच देशविरोधी भी ठहराना है। यह काम भी प्रधानमंत्री के भाषण से बखूबी हुआ है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

1 × 1 =

kishori-yojna
kishori-yojna
ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
मंदिर व मानस विवाद और कांग्रेस की चिंता
मंदिर व मानस विवाद और कांग्रेस की चिंता