बिहार: फिर से नीतीशे कुमार!

बिहार के चुनाव नतीजों में हेरफेर के राष्ट्रीय जनता दल के आरोपों में कितनी सच्चाई है, यह तो अब शायद ही कभी पता चलेगा। लेकिन अनेक सीटों पर संदिग्ध परिस्थितियों में चुनाव परिणाम घोषित किए गए, यह बात बहुत साफ है। बहरहाल, अब ठोस स्थिति यही है कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए बिहार में फिर से सत्ता में लौट आया है। विपक्ष के लिए सबक यह है कि अगर उसे भाजपा या एनडीए को कहीं हराना है, तो बेहद बड़े अंतर से हराना होगा। कांटे की टक्कर में नतीजा उसके खिलाफ जाएगा, यह तय है क्योंकि प्रशासनिक व्यवस्था को अब उसी रूप में ढाल दिया गया है। वैसे ताजा 2020 के चुनाव परिणाम में खास बात यह सामने आई है कि नीतीश कुमार के जनता दल (यू) की सीटों की संख्या में भारी कमी आई। एनडीए में जद-यू अब तक बड़े भाई की भूमिका में था। इस चुनाव में भाजपा को 74 तथा जदयू को 44 सीटें मिली हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह शायद लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) रही। लोजपा प्रमुख ने उन सभी जगहों पर अपने उम्मीदवार दिए जहां से जदयू के प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे।

चुनाव प्रचार में भी उन्होंने नीतीश कुमार पर तीखा हमला किया। यहां तक की उन्हें जांच के बाद जेल भेजने की भी बात कही। खामियाजा जद-यू को भुगतना पड़ा। अब जब नीतीश कुमार की पार्टी जदयू व भाजपा की सीटों का फासला काफी है। इसलिए यह कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या नीतीश कुमार ही सचमुच पांच साल के लिए मुख्यमंत्री बनेंगे, जैसाकि भाजपा का वादा है या फिर बीच में ही कोई और उनकी जगह ले लेगा? और अगर नीतीश बने भी तो अब उनकी हैसियत क्या होगी? अनेक जानकार मानते हैं कि यही भाजपा की रणनीति थी। वह नीतीश कुमार का कद छोटा करने में सफल भी रही। आम धाररणा थी कि लोजपा उसका खेल खेल रही है। कोरोना संकट के दौरान हुआ यह विधानसभा चुनाव सत्तारूढ़ दल के लिए काफी चुनौतीपूर्ण था। कोरोना के कारण लॉकडाउन के कारण प्रवासियों की स्थिति को लेकर भी बिहार सरकार की किरकिरी हुई थी। फिर तेजस्वी यादव के दस लाख सरकारी नौकरी देने, कांट्रैक्ट पर नियुक्त विभिन्न सेवा संवर्ग के लोगों के मानदेय में इजाफा करने तथा समान काम के लिए समान वेतन जैसी लोकलुभावन घोषणाओं ने एनडीए को काफी मुश्किल में डाला। किंतु परिणामों ने यह साबित कर दिया कि चुनाव असल में किसी और गणित से होता है।

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