सच के सामने नीतीश

कहा जाता है कि जीवन काल में ही इनसान को अपने हर सच का सामना करना पड़ता है। ऐसा लगता है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जीवन में अपने सच से रू-ब-रू होने का वक्त आ गया है। उनकी अवसरवादी राजनीति का वो परिणाम अब उनके सामने है, जो कभी उन्होंने शायद सोचा भी नहीं होगा। हमेशा दूसरों पर अपनी शर्तें थोपते हुए मुख्यमंत्री पद पर काबिज रहने के लिए जाने वाले नीतीश कुमार की यह लाचारी ही है कि इस पद में अरुचि दिखाने की मजबूरी उनके सामने आई। बिहार में राजनीतिक उठापटक और अरुणाचल में उनकी पार्टी के विधायकों के दल बदल के बीच पिछले दिनों उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री बनने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी और भाजपा चाहे तो (बिहार में) अपना मुख्यमंत्री बना सकती है।

अरुणाचल प्रदेश में कुछ दिन पहले ही नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के सात में से छह विधायक भाजपा में शामिल हो गए। तब नीतीश कुमार ने कहा था कि अरुणाचल प्रदेश में हो रहे राजनीतिक परिवर्तन से बिहार की राजनीति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। लेकिन हालात बिहार में भी बेहतर नहीं हैं। तमाम संकेत हैं कि भाजपा यहां अब अपनी शर्तों पर ही नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बने रहने देना चाहती है। कभी भाजपा के साथ रह कर भी अपनी कथित धर्मनिरपेक्ष छवि कायम रखने वाले नीतीश कुमार के लिए अब ऐसा करना मुश्किल हो गया है। गौरतलब है कि बिहार विधानसभा की 243 सीटों में से प्रदेश में सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के पास 125 सीटें हैं। एनडीए में शामिल भाजपा के पास 74, जदयू के पास 43, विकासशील इंसान पार्टी के पास 4 और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के पास 4 सीटें हैं। इसलिए इस बार सत्ता के सूत्र भाजपा के पास हैं। नीतीश कुमार को इसकी चुभन अब महसूस हो रही है। जदयू ने अरुणाचल प्रदेश में अपने विधायकों के पाला बदलकर भाजपा में जाने को लेकर नाराजगी जताई है। कहा है कि यह गठबंधन राजनीति का कोई अच्छा संकेत नहीं है। भाजपा को याद दिलाने की कोशिश की है कि गठबंधन सहयोगियों को गठबंधन सरकार चलाते हुए ‘अटल धर्म’ का पालन करना चाहिए। लेकिन यह नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा है। उसके अपने नियम हैं। उस नियम के मुताबिक नीतीश की उपयोगिता अब सीमित है। नीतीश कुमार को अब इसी सच का सामना करना पड़ रहा है।

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