कहां है साईं बाबा की जन्मस्थली

हम लोग जरा-जरा सी बात को लेकर विवाद खड़ा करने में माहिर है व इसमें किसी को नहीं बखशते हैं। भगवान तक को नहीं छोड़ते हैं। पहले साईं बाबा के नाम पर एक स्वयंभू शंकराचार्य ने विवाद खड़ा किया था। उन्होंने उन्हें देवता मानने से ही इंकार कर दिया था। इन्हें कांग्रेसी शंकराचार्य माना जाता है व उनका नाम स्वामी स्वरूपानंद। हाल ही में महराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के इस बयान से विवाद खड़ा हो गया कि वे शिर्डी के साईं बाबा के जन्म स्थल पथारी को विकसित करेंगे।

उन्होंने औरंगाबाद जिले में आने वाले साईं बाबा के इस जन्म स्थल को धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित करने के लिए वहां 100 करोड़ रुपए खर्च करने की बात कही थी। इसके विरोध में शिरडी में जमकर प्रदर्शन हुआ व दुकानदारों ने अपनी दुकाने बंद कर हड़ताल कर दी। यह काम लगभग वैसा ही था जैसे कि पहले जब राजधानी दिल्ली में तिपहिया रिक्शा चलाने के लिए नए लाइसेंस दिए जानने का ऐलान किया गया था तो मौजूदा रिक्शा चालको ने हड़ताल कर दी थी क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि रिक्शाओं की संख्या बढ़ जाने के कारण उनके लिए चुनौती पैदा हो। अंततः उद्धव ठाकरे ने किसी तरह से इस मामले को सुलझाया। मालूम हो कि पथारी शिर्डी से करीब 125 किलोमीटर दूर स्थित कस्बा है जिसकी आबादी 40,000 है। इसे साई बाबा का जन्म स्थान माना जाता है। बताते हैं कि 1975 में साई बाबा के एक भक्त वीबी खेर ने कहा था कि इस बात की पूरी संभावना है कि 19वीं सदी में साई बाबा इस गांव में रहने वाले यजुर्वेदी देशस्थ ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे। उनके पिता परशुराम भुसारी को पांच बेटे थे। साई बाबा पांच भाईयों में से एक थे।

बताते हैं कि 1978 में श्री साईं स्मारक समिति ने उनके जन्म स्थान पर एक भवन बनाया। इस मामले में ज्यादातर जानकारी बाबा को करीब से जानने वाले ने ही उपलब्ध करवाई थी। किवंदती है कि बाबा 1872 में शिर्डी आए थे व 15 अक्तूबर 1918 को महासमाधि (निधन) में जाने तक वहां रहे। श्री साईं स्वचरित्र में मराठी में गोविंद रघुनाथ दाभोलकर ने संत के पहले जन्म परिचय में इसका वर्णन किया है। साईं बाबा के दो शिष्यों दीक्षित व दाभोलकर ने भी यह लिखने में उनकी सहायता की थी। इनमें से दीक्षित वकालत करते थे व काफी समय तक बाबा के संपर्क में रहे थे व उन्होंने शुरुआत में शिर्डी साईं बाबा संस्थान की शिर्डी में स्थापना करने में मदद की। कहते हैं कि पहली बार 1923 में साईं स्वचरित्र में इस बारे में छपा कि साई बाबा 50 साल पहले वहां आए थे उनके परिवार के बारे में इतना ही कहा जाता था कि जब कोई पथारी से उनसे मिलने के लिए शिर्डी आता तो वे विस्तार से उससे चर्चा करते थे। बाबा के एक शिष्य बीवी नरसिम्हा स्वामी का कहना था कि बाबा यह नहीं चाहते थे कि लोग उनके मूल के बारे में सवाल पूछे। बाबा के बारे में उनके एक शिष्य जो पेश से सुनार था बताया था कि बाबा का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उस समय पथारी निजाम के शासन का हिस्सा था।

जब साईं बाबा बहुत छोटे थे उस समय उनके मा-बाप ने उन्हें एक मुस्लिम फकीर को सौंप दिया था व उसी ने उनको पाला-पोसा। यही वजह रही कि उन्हें एक मुस्लिम की वेशभूषा में दिखाया जाता है व उन्होंने द्वारिका मस्जिद की स्थापना की थी। यह भी माना जाता है कि उनके भक्तो में हिंदू व मुसलमान दोनों ही पर्याप्त संख्या में शामिल हैं। इनमें जब खेर ने उनके परिवार के सदस्यों से मिलने की कोशिश की तो उसने पाया कि पथारी में उनका मकान लगभग उजड़ चुका था। परिवार के एक सदस्य रघुनाथ भुसारी से उनका संपर्क हो गया जो कि हैदराबाद उस्मानिया विश्वविद्यालय में मराठी के प्रोफेसर थे। उन्होंने खेर को बाबा के परिवार वंश वृक्ष तैयार करने में मदद की। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपने बाबा से सुना था कि साई बाबा पांच भाई थे इनमें से तीन तो तभी घर छोड़ गए थे जबकि वे किशोर थे। इनमें से एक हरिबाबू ईश्वर की खोज में घर से निकल गया। उनका मानना था कि हरिबाबू भुसारी ही वास्तव में साईं बाबा हैं। बाद में खेर व पथारी निवासी दिनकर चौधरी ने भुसारी का परिवारिक घर खरीद कर वहां श्री साई स्माकर समिति की स्थापना की। वहां 1999 में एक मंदिर का निर्माण किया।

जब राष्ट्रपति रामनाथ कोबिंद बिहार के राज्यपाल थे तब वह इस मंदिर में आए व स्थानीय लोगों ने उनसे अनुरोध किया कि गलियो स्थित इस मंदिर तक जाने के लिए वे उस जगह का विकास करवाएं। वहां भक्तों के ठहरने के लिए कोई उचित जगह भी नहीं है। रामनाथ कोबिंद ने इस संबंध में महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस से बात की और उनसे हालात बेहतर बनाने के लिए कुछ करने को कहा। इसके बाद स्थानीय लोग भी मुख्यमंत्री से मिले। मुख्यमंत्री ने विकास के लिए पथारी नगर परिषद को 100 करोड़ रुपए देने का ऐलान किया। तब शिर्डी के लोगों के विरोध के कारण इसका ऐलान किया गया और अब उद्धव ठाकरे के इस ऐलान के कारण विवाद खड़ा हो गया था। उनके द्वारा ऐलान वापस लेते ही यह विरोध ठंडा पड़ गया है।

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