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Wednesday, May 12, 2021
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दिल्ली में भाजपा ने हार मान ली!

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अजीत द्विवेदीhttp://www.nayaindia.com
पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

इसे क्या समझा जाए? क्या नरेंद्र मोदी ने मान लिया कि वे दिल्ली नहीं जीत सकते हैं या यह कि भाजपा दिल्ली में लड़ कर थक गई और इसलिए पिछले दरवाजे से दिल्ली की सत्ता अपने हाथ में ले रही है? दिल्ली के उप राज्यपाल को ‘दिल्ली सरकार’ बनाने का जो विधेयक केंद्र सरकार ने लोकसभा में पेश किया है वह इस बात का सबूत है कि भाजपा और नरेंद्र मोदी ने मान लिया है कि वे चुनाव लड़ कर दिल्ली में नहीं जीत सकते। यह इस बात का भी सबूत है कि भाजपा के मौजूदा नेतृत्व को एक ही जगह एक बार से ज्यादा बार हार पसंद नहीं है। एक बार हारने के बाद भी भाजपा नेता नतीजों को बदलने का प्रयास करने लगते हैं जबकि दिल्ली में मौजूदा नेतृत्व में दो बार और कुल मिला कर छह बार लगातार विधानसभा चुनाव हार गए। आगे भी जीतने की संभावना नहीं दिख रही है। सो, वहां अलग रास्ता अख्तियार किया गया है।

दिल्ली में अख्तियार किया गया रास्ता यह है कि चुनी हुई सरकार के सारे अधिकार उसके हाथ से लेकर एक रिटायर ‘बाबू’ के हाथ में दे दिया जाए, जो सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश से काम करे। यह अलग बात है कि प्रधानमंत्री ‘बाबुओं’ को किसी काम के लायक नहीं समझते हैं। उनकी सरकार ने ‘गवर्मनेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली (अमेंडमेंट) एक्ट, 2021’ लोकसभा में पेश किया है। इस बिल में कहा गया है कि दिल्ली सरकार का मतलब उप राज्यपाल होगा। फिर दिल्ली की चुनी हुई सरकार को क्या कहा जाएगा, यह इस बिल में नहीं लिखा है। ध्यान रहे दिल्ली में विधानसभा है और मतदान के जरिए चुनी हुई एक सरकार है, जिसके अधिकारों की व्याख्या करते हुए चार जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा था कि कानून-व्यवस्था, पुलिस और जमीन को छोड़ कर बाकी सभी अधिकार दिल्ली सरकार के हैं।

संविधान पीठ ने यह भी कहा था कि दिल्ली सरकार को अपने फैसले की सारी फाइलें उप राज्यपाल को भेजने की जरूरत नहीं है। सर्वोच्च अदालत ने बहुत साफ शब्दों में कहा है कि सारे फैसले चुनी हुई सरकार करेगी और इसकी सूचना देने के लिए ही फाइल उप राज्यपाल के पास भेजी जाएगी।

भारत सरकार जो नया बिल लेकर आई है वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट देने वाली है। इस बिल में कहा गया है कि दिल्ली सरकार का मतलब उप राज्यपाल होगा और सारे अधिकार उप राज्यपाल के पास होंगे। विधेयक में कहा गया है कि दिल्ली सरकार रोजमर्रा का भी कोई काम बिना उप राज्यपाल की मंजूरी के नहीं कर सकेगी। उसे अपने फैसले की सारी फाइलें पहले उप राज्यपाल के पास भेजनी होगी और उनकी मंजूरी मिलने के बाद ही उस पर अमल होगा। विधानसभा में कोई भी बिल पास कराने से पहले दिल्ली सरकार को उप राज्यपाल की मंजूरी लेनी होगी। यह भी कहा गया है कि सरकार खुद को या अपनी किसी कमेटी को मजबूत बनाने के लिए कोई भी नियम नहीं बना सकती है। कुल मिला कर उप राज्यपाल को मुख्यमंत्री का दर्जा देने का विधेयक केंद्र सरकार लेकर आई है। यह संघवाद और लोकतंत्र दोनों की अवधारणा पर गहरी चोट करने वाला विधेयक है।

तभी सवाल है कि इसके बाद मुख्यमंत्री की क्या जरूरत रह जाएगी? जब मुख्यमंत्री के तौर पर सारे फैसले उप राज्यपाल करेंगे और विधानसभा भी उनकी मर्जी के बगैर कोई काम नहीं कर सकती है तो विधानसभा और मुख्यमंत्री दोनों को खत्म कर देना चाहिए। केंद्र सरकार का यह विधेयक हो सकता है कि इस दिशा में उठा पहला कदम हो। आखिर 1993 से पहले दिल्ली में विधानसभा नहीं ही थी। या दूसरे कई केंद्र शासित प्रदेशों में न विधानसभा है और न मुख्यमंत्री हैं। तो संभव है कि सरकार की पहल दिल्ली का अर्ध राज्य का दर्जा खत्म करके उसे पूरी तरह से केंद्र शासित प्रदेश बनाने का हो। आखिर इस सरकार ने जम्मू कश्मीर जैसे पूर्ण राज्य का दर्जा खत्म करके उसे केंद्र शासित प्रदेश बना दिया तो दिल्ली तो फिर भी अर्ध राज्य ही है! इसका दर्जा खत्म करना कौन सी बड़ी बात है! दर्जा ही खत्म कर देना है ताकि न चुनाव हो और न लड़ कर हारने की नौबत आए!

विडंबना यह है कि दिल्ली के कई चुनावों में भारतीय जनता पार्टी प्रचार में कह चुकी है कि उसकी सरकार बनी तो वह दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देगी। 2013 के चुनाव में अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और डॉक्टर हर्षवर्धन ने भाजपा का घोषणापत्र जारी किया था, जिसमें लिखा गया है कि उसकी सरकार बनी तो वह दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाएगी। हालांकि इसके बावजूद दिल्ली में एक बार के बाद भाजपा की सरकार दोबारा नहीं बनी। दिल्ली के लोगों ने भाजपा को लगातार छह चुनाव हरवाए। शायद तभी केंद्र की उसकी सरकार ने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की बजाय अर्ध राज्य का दर्जा भी खत्म करने की पहल कर दी है। नरेंद्र मोदी भी दो बार प्रयास करके देख चुके और जब उनको लगा कि दिल्ली नहीं जीत सकते हैं तो उसे हासिल करने का यह तरीका निकाला गया है।

दिल्ली जीतने की पहली लड़ाई नरेंद्र मोदी ने जनवरी 2015 में लड़ी थी। उससे सात-आठ महीना पहले ही उनकी कमान में भाजपा ने लोकसभा का चुनाव जीता था। उनकी कमान में भाजपा को पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल हुआ था और 30 साल के बाद किसी पार्टी को केंद्र में सरकार बनाने के लिए पूर्ण बहुमत मिला था। पूरे देश में मोदी की लोकप्रियता की लहर चल रही थी, जिसे भाजपा के नेता सुनामी बताते हैं। सो, सबको यकीन था कि जनवरी 2015 का दिल्ली विधानसभा चुनाव भाजपा जीतेगी। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने रामलीला मैदान से प्रचार अभियान की शुरुआत की थी और दिल्ली जैसे छोटे से राज्य में चार बड़ी रैलियां की थीं। उन्होंने मध्य दिल्ली के रामलीला मैदान से शुरू करके पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी दिल्ली में बड़ी रैलियां की थीं और केजरीवाल को नक्सली बता कर उन्हें हराने की अपील की थी। भाजपा ने देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी को मुख्यमंत्री का दावेदार बना कर चुनाव लड़ा था। किरण बेदी खुद भी हार गईं और मोदी के अथक प्रयास के बाद भाजपा दिल्ली की 70 में से सिर्फ तीन सीट जीत पाई।

दिल्ली जीतने का दूसरा अभियान पांच साल बाद जनवरी 2020 में चला। इससे सात-आठ महीना पहले लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की कमान में भाजपा तीन सौ सीट लाने में कामयाब हुई थी और लगातार दूसरी बार प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र में उसकी सरकार बनी थी। इस बार भी दिल्ली जीतने के संकल्प के साथ नरेंद्र मोदी प्रचार में उतरे। इस बार उन्होंने पहले जितनी सभा नहीं की और मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया, फिर भी तीन की संख्या बढ़ कर आठ हुई। दूसरी बार भी वे केजरीवाल को नहीं हरा सके। इस बीच कुछ ऐसी राजनीतिक घटनाएं हुईं, जिसने भाजपा नेतृत्व को चौकन्ना कर दिया। किसान आंदोलन को केजरीवाल का समर्थन और गुजरात के शहरी व ग्रामीण निकायों के चुनाव में आम आदमी पार्टी का खाता खुलना ऐसी घटना है, जिसने भाजपा नेतृत्व के माथे पर बल ला दिया।

गुजरात में सूरत की नगरपालिका में केजरीवाल की पार्टी को 27 सीटें मिलीं और कांग्रेस का खाता नहीं खुला। पंचायत चुनावों में भी आम आदमी पार्टी को अलग अलग जगहों पर 44 सीटें मिलीं। उसके बाद दिल्ली नगर निगम की पांच सीटों के लिए उपचुनाव हुए, जिनमें आप ने चार और कांग्रेस ने एक सीट जीती। भाजपा का खाता नहीं खुल सका। इसके तुरंत बाद केंद्र ने दिल्ली सरकार के सारे अधिकार छीन कर उप राज्यपाल को देने का बिल पेश किया। दिल्ली के मुख्यमंत्री के नाते केजरीवाल के हाथ में जो थोड़े-बहुत अधिकार हैं वह भी केंद्र सरकार छीन लेना चाहती है क्योंकि भाजपा को लग रहा है कि इतने थोड़े से अधिकार में ही केजरीवाल ने ऐसी राजनीति की है, जिससे वे लोगों की नजर में कांग्रेस के विकल्प के तौर पर स्थापित हो रहे हैं। अगर उनकी बढ़ती ताकत को नहीं रोका गया तो वे आने वाले दिनों में भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। सो, एक तीर से कई शिकार हो रहे हैं। दो बार की हार के अपमान का बदला भी लिया जा रहा है और केजरीवाल की आगे की राजनीति का रास्ता भी बंद किया जा रहा है।

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