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एक के बदले दस सैनिक मारेंगे!

भाजपा जब विपक्ष में थी तब शहीद सैनिक हेमराज का सिर काटे जाने के बाद उसकी एक नेता ने संसद में कहा था कि एक के बदले दस सिर लाना चाहिए। यहीं बात केंद्रीय गृह मंत्री ने गुरुवार को महाराष्ट्र की एक सभा में कही। उन्होंने पड़ोसी देश की ओर इशारा करके कहा कि अगर हमारा एक सैनिक मारा गया तो हम दस सैनिक मारेंगे। यह चुन चुन कर बाहर निकालेंग और घर में घुस कर मारेंगे के बाद का बयान है। हालांकि इससे पहले कई बार भारत घर में घुस कर पाकिस्तान को मार चुका है। 1965 और 1971 में भारत ने पाकिस्तान को उसके घर में घुस कर ही मारा था। सिर्फ एक बार 1999 में पाकिस्तान हमारे घर में घुस आया था और उसे निकालने में हमारे चार सौ से ज्यादा वीर जवान शहीद हुए थे। सबको पता है कि उस समय किसकी सरकार थी। हालांकि वह वाली सरकार भी 70 साल में गिन ली जाती है।

बहरहाल, जिन्होंने घर में घुस कर मारा उन्होंने कभी नहीं कहा कि ऐसा करेंगे। पर अब रोज यह बात कही जाती है कि घर में घुस कर मारेंगे। जो सरकार में है उसके ऐसा कहने का कोई मतलब नहीं बनता है। भाजपा जब तक विपक्ष में थी तब तक ऐसा कहती तो समझ में आता है पर वह अब सरकार में है और अगर लड़ाई की नौबत आती है तो युद्ध का मैदान कहां होगा यह चुनना उसका काम होगा। पर रोज लोगों को यह बात बताई जाती है कि उन्होंने जो सरकार चुनी है वह घर में घुस कर मारेगी।

घर में घुस कर मारने की हकीकत 1999 में जाहिर हो गई है। जहां तक एक के बदले दस मारने का सवाल है तो वह दावा भी हवा हवाई है। हकीकत यह है कि पिछले पांच साल में भारतीय सुरक्षा बलों पर होने वाले हमले बढ़ते जा रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2014 से लेकर 2019 के बीच भारतीय सुरक्षा बलों पर हुए हमले में 106 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इस साल पांच फरवरी को भारत के तब के गृह राज्यमंत्री हंसराज गंगाराम अहीर ने संसद में बताया कि पांच साल में अकेले जम्मू कश्मीर में होने वाली आतंकवादी वारदातों में 177 फीसदी की बढ़ोतरी हई है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में सेना और अर्धसैनिक बल व जम्मू कश्मीर पुलिस के जवानों को मिला कर कुल 457 जवान मारे गए हैं। उससे पहले 2017 में यह सख्या 354 थी। जिस अनुपात में सुरक्षा बलों के जवानों के मारे जाने की घटनाएं बढ़ी हैं उसी अनुपात में सीमा पार से होने वाले हमलों में आम नागरिकों के मरने का आंकड़ा भी बढ़ा है। पर चुनाव प्रचार में अब भी यह कहा जा रहा है कि घर में घुस कर मारेंगे और एक के बदले दस को मारेंगे। इस साल फरवरी में पुलवामा में आतंकवादियों ने सीआरपीएफ के काफिले पर हमला कर दिया, जिसमें 40 जवान मारे गए। उसके जवाब में बालाकोट एयर स्ट्राइक हुआ, जिसमें मारे गए आतंकवादियों की संख्या पर अभी तक बहस चल रही है। पर हकीकत यह है कि उसके बाद भी भारतीय जवानों का शहीद होना बंद नहीं हुआ है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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