दिसंबर में पसीने पसीने भाजपा!

आमतौर पर झारखंड में मौसम बहुत सर्द नहीं होता है पर इतना गर्म भी नही होता कि दिसंबर में पसीने छूटें। पर इस बार प्रकृति ने दिसंबर में झारखंड में लोगों के पसीने छुड़ा रखे हैं। ऊपर से चुनाव की सरगर्मी अलग से, जिसमें सबसे ज्यादा भाजपा के पसीने छूट रहे हैं। कुछ तो राजनीतिक विरोधियों के मजबूत गठबंधन ने और कुछ अपने सहयोगियों व अपनी पार्टी के नेताओं ने मुख्यमंत्री रघुवर दास के साथ साथ पार्टी आलाकमान के भी पसीने छुड़ाए हैं।

तीस नवंबर को पहले चरण के मतदान के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे बढ़ाने की खबर है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की रैलियों में भीड़ नहीं जुटी। उन्होंने खुद मंच से इस पर नाराजगी जताई और कहा कि इतनी कम भीड़ से चुनाव कैसे जीतोगे। लोगों के खराब रिस्पांस की वजह से उनकी रैलियां रद्द होने की भी खबर है। दूसरी ओर पहले चरण के मतदान के बाद से ही विपक्षी गठबंधन ने जीत का दावा करना शुरू कर दिया है।

पहला चरण भाजपा के असर वाले इलाके में था। इसके बावजूद उसने इस इलाके में दूसरी पार्टियों से तोड़ कर कई बड़े नेताओं को अपनी पार्टी की टिकट दी थी। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और लोहरदगा के निवर्तमान विधायक सुखदेव भगत को भाजपा ने अपनी टिकट से लड़ाया था। पिछली बार जेएमएम की टिकट से लड़ कर सिर्फ दो हजार वोट से हारे हत्या के आरोपी शशिभूषण मेहता को भाजपा में लाकर पार्टी ने पांकी सीट से टिकट दिया था। निर्दलीय चुनाव जीते भानु प्रताप शाही को भाजपा की टिकट पर भवनाथपुर सीट से लड़ाया गया था। इन सबके बावजूद भाजपा भरोसे में नहीं है कि पहला चरण उसके लिए अच्छा बीता है। भाजपा के नेता हिसाब लगा रहे हैं कि उनको सात सीटें मिल गईं तब भी ठीक है।

सोचें, जिस पार्टी ने राज्य की 81 विधानसभा सीटों में से 65 पर जीतने का लक्ष्य रखा है वह पहले चरण की 13 में से आधी सीटों पर जीत को लेकर भी भरोसे में नहीं है। सवाल है कि भाजपा की चुनावी संभावना बिगड़ने की क्या वजह है? जिस प्रदेश की 14 में से 12 लोकसभा सीटें भाजपा ने जीती हैं और भाजपा व उसकी सहयोगी आजसू को मिला कर 55 फीसदी वोट मिले हों उसकी संभावना क्यों खराब हुई है? आखिर लोकसभा चुनाव के बाद छह महीने में ऐसा क्या हुआ, जिससे भाजपा बैकफुट पर आई और विपक्षी गठबंधन को आक्रामक होने का मौका मिला?

इन सवालों का जवाब एक साथ हुई कई राजनीतिक घटनाओं के विश्लेषण से मिलेगा। सबसे पहला कारण रघुवर दास का पांच साल का कार्यकाल ही है। पांच साल के निष्कंटक राज में उनकी छवि किसी की नहीं सुनने वाले, निरकुंश और कुछ हद तक बिगड़े मिजाज वाले मुख्यमंत्री की बनी। उनके आचरण ने पार्टी के नेताओं के साथ साथ अधिकारियों और सहयोगियों सबको नाराज किया। यह नाराजगी चुनाव में भाजपा को भारी पड़ रही है। भाजपा की 20 साल पुरानी सहयोगी आजसू ने भाजपा का साथ छोड़ा तो उसका एक बड़ा कारण मुख्यमंत्री का व्यवहार था। आजसू को भाजपा ने कम सीटों का प्रस्ताव दिया था, इसके बावजूद तालमेल हो जाता, अगर उसके नेता सुदेश महतो के साथ मुख्यमंत्री का बरताव अच्छा होता। आजसू का नाराज होकर अलग होना इस विधानसभा चुनाव का निर्णायक बिंदु लग रहा है।

एक तरफ राज्य की मुख्य विपक्षी झारखंड मुक्ति मोर्चा ने कांग्रेस और राजद के साथ तालमेल कर लिया तो दूसरी ओर भाजपा की पुरानी सहयोगी उसे छोड़ कर चली गई। इसके बावजूद मुख्यमंत्री इस मुगालते में रहे कि वे जीत रहे हैं और इसलिए चुनाव से पहले ही चुनाव बाद के मसलों को निपटाने में लग गए। उन्होंने अपने विरोधियों और मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदारों की टिकटें कटवा दीं। इससे नाराज कई नेता अंदरखाने पार्टी की जड़ खोदने में लगे हैं तो राज्य के सबसे पुराने भाजपा नेताओं में से एक सरयू राय ने अपनी सीट छोड़ कर सीधे मुख्यमंत्री को चुनौती दे दी। अब मुख्यमंत्री अपने क्षेत्र में ही घिरे हैं। इस तरह के हालात अनेक सीटों पर हैं, जहां भाजपा के बागी खुल कर या परदे के पीछे से पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

इस बीच महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव नतीजे भी आ गए। भाजपा तो इस उम्मीद में थी कि दोनों राज्यों में उसे भारी बहुमत मिलेगा और इसका मनोवैज्ञानिक असर झारखंड में होगा। पर उलटा हो गया। हरियाणा में भाजपा ने जैसे तैसे दुष्यंत चौटाला की पार्टी के साथ गठबंधन करके सरकार बनाई। पर महाराष्ट्र में लंबे सियासी घटनाक्रम के बाद भाजपा सरकार नहीं बना सकी उसकी पुरानी सहयोगी शिव सेना ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिल कर सरकार बना ली। इसका मनोवैज्ञानिक असर झारखंड में यह हुआ कि भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं का मनोबल गिर गया और कांग्रेस में नया जोश आ गया।

महाराष्ट्र में गैर मराठा और हरियाणा में गैर जाट का जो प्रयोग भाजपा ने किया था वैसा ही प्रयोग झारखंड में गैर आदिवासी का किया गया था। भाजपा ने पहली बार गैर आदिवासी रघुवर दास को मुख्यमंत्री बनाया। इससे पहले दिन जो आदिवासी नाराज हुए वे अभी तक नाराज हैं। इस बीच सरकार ने जमीन पर उनके मालिकाना हक से जुड़े दो अहम कानूनों को खत्म कर दिया। इससे उनकी नाराजगी और बढ़ी। पांच साल के राज के बाद यह धारणा भी बनी है कि सत्ता का समूचा लाभ सिर्फ वैश्य समाज को मिला। इससे भाजपा का कोर वोट समूह यानी सवर्ण नाराज हुआ। रामटहल चौधरी जैसे नेता की टिकट कटने और आजसू के अलग होने से कुर्मी मतदाता भी भाजपा के बहुत पक्ष में नहीं हैं।

आमतौर पर बहुकोणीय लड़ाई का फायदा भाजपा को मिलता है पर इस बार झारखंड की बहुकोणीय लड़ाई भी उसको नुकसान पहुंचाती दिख रही है। इसका कारण यह है कि अलग अलग लड़ रही तमाम पार्टियां भाजपा की ही नई या पुरानी सहयोगी हैं। भाजपा से निकले बाबूलाल मरांडी, भाजपा से अलग हुई आजसू, भाजपा की दो सहयोगी पार्टियां- जनता दल यू और लोजपा, सब इस बार अलग लड़ रहे हैं। ये सब भाजपा की संभावना को नुकसान पहुंचा रहे हैं। तभी दिसंबर के महीने में भी भाजपा के पसीने छूट रहे हैं।

झारखंड के जटिल जातीय गणित पर कल विचार करेंगे।

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