भाजपा की ईमानदारी के क्या कहने!

यह किसी ने मजाक में कहा कि ‘पाप धोने के मामले में अब गंगा दूसरे स्थान पर आ गई है, पहला स्थान भाजपा ने ले लिया है’ पर यह देश की मौजूदा राजनीति पर बिल्कुल सटीक बैठने वाली बात है। जिसको भी और जैसा भी पाप धोना हो वह भाजपा नाम की बहती गंगा में डुबकी लगा सकता है। उसमें डुबकी लगाते ही उसके सारे पाप धुल जाते हैं। यह भी मजेदार है कि शंकर भगवान की जटा से निकली गंगा मैली हो गई पापियों के पाप धोते धोते! पर पापनाशिनी भाजपा बिल्कुल मैली नहीं हो रही है। वह वैसे ही पवित्र बनी हुई है, जैसे गंगोत्री से निकलते वक्त गंगा होती है।

उसने 72 हजार करोड़ रुपए की सिंचाई घोटाले के आरोपी अजित पवार को मुंबई की आर्थर रोड जेल भेजने की बजाय अपनी सरकार में शामिल कर उप मुख्यमंत्री बना दिया। परम पवित्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने उनको उप मुख्यमंत्री बनने की बधाई भी दी। पर उन दोनों पर भी कोई दाग नहीं लगा। अजित पवार को जेल भेजने की सौगंध खाने वाले मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने तो अपनी देखरेख में उनकी शपथ ही कराई और जेल की बजाय महाराष्ट्र सरकार के सचिवालय ‘मंत्रालय’ में ऊंची जगह दी। मुख्यमंत्री की अर्धांगिनी अमृता फड़नवीस ने भी अजित पवार को बधाई और शुभकामना दी। और सरकार बनने के 48 घंटे के अंदर उनके घोटालों से जुड़ी फाइलें बंद भी होने लगीं। बहुमत साबित करने से पहले मुख्यमंत्री ने सिंचाई घोटाले से जुड़े नौ मामलों की जांच बंद करने की फाइल पर मंजूरी दी है।

सो, ऐसा लग रहा है कि भाजपा ने महात्मा गांधी के सूत्र वाक्य ‘पाप से घृणा करो, पापियों से नहीं’ को अपना जीवन मंत्र बना लिया है। इसलिए वह चुन चुन कर पापियों का उद्धार कर रही है। वह जम्मू कश्मीर में मुफ्ती मोहम्मद सईद और मेहबूबा मुफ्ती की पार्टी को राष्ट्रविरोधी और आतंकवादियों की हमदर्द बताती थी पर उनके साथ मिल कर सरकार बना ली, फिर भी राष्ट्रवादी बनी रही। वह हरियाणा में चौटाला परिवार को लुटेरा बताती थी पर दुष्यंत चौटाला के साथ मिल कर सरकार बनाई और इसके बावजूद ईमानदार बनी रही। उसने सिंचाई घोटाले में अजित पवार को जेल भेजने की सौगंध खाई, फिर उनके साथ सरकार बना ली और उनकी उसी घोटाले में जांच भी बंद कर दी, फिर भी उसकी ईमानदारी पर कोई दाग नहीं लगा!

उसने असम में जल संसाधन मंत्रालय में रहते घोटाले के आरोपी हुए हिमंता बिस्वा सरमा को गले लगाया, चिटफंड घोटाले के आरोपी मुकुल राय को पार्टी में शामिल किया, अंतरिक्ष घोटाले के आरोपी माधवन नायर को अपनी पार्टी में लिया, कई घोटालों के आरोपी येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री बनाया पर इन सबके बावजूद उसे कोई दोष नहीं लगा है।

उसके जमाने में मुनाफा कमाने वाली सरकारी कंपनियां निजी हाथों में बेची जा रही हैं और हर महीने सरकारी बैंकों से औसतन 16 हजार करोड़ रुपए की लूट हो रही है। पर वह जस की तस बेदाग है।

सवाल है कि यह चमत्कार कैसे हो रहा है? आखिर क्यों इतना सब कुछ होने के बावजूद देश के लोग उस पर भरोसा कर रहे हैं और उससे सवाल नहीं पूछ रहे हैं? असल में जनता की तरफ से सवाल पूछने की जिम्मेदारी मीडिया की होती है, जिसने पूरी तरह से सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार के आगे घुटने टेक दिए हैं। मीडिया के लिए शिव सेना का एनसीपी के साथ जाना पाप है पर भाजपा का एनसीपी को तोड़ कर घोटालों के आरोपी अजित पवार के साथ सरकार बनाना मास्टरस्ट्रोक है!

हिटलर के प्रचार मंत्री जोसेफ गोएबल्स की वैसे तो कई बातें अनेक बार दोहराई जा चुकी हैं। पर मौजूदा सरकार के कामकाज और उसे देखने के मीडिया के नजरिए के लिहाज से एक बात बहुत पते की है। गोएबल्स ने कहा था- थिंक ऑफ द प्रेस एज अ ग्रेट कीबोर्ड, ऑन ह्वीच गवर्नमेंट कैन प्ले। आज बिल्कुल उसी तर्ज पर सरकार ने प्रेस को कीबोर्ड बना रखा है और उस पर प्ले कर रही है। सरकार जैसा चाहती है वैसी ही धुन उस कीबोर्ड से निकल रही है और उस धुन को सुन कर देश की जनता मंत्रमुग्ध है।

देश की जनता को बताया जा रहा है कि अन्याय व अनीति की बातें, असंवैधानिक काम, चोरी और लूट आदि असल में देश की तरक्की के लिए जरूरी हैं। देश तभी आगे बढ़ेगा, जब सत्तारूढ़ दल को तमाम अनैतिक उपायों के जरिए भी अपने विपक्ष को खत्म करने का मौका मिलेगा। जब तक विपक्ष है तब तक न तो भारत महान बन सकता है और न हिंदू राष्ट्र बन सकता है। असल में यह इस सनातन सोच का ही विस्तार है कि ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’। गोपाल विनायक गोडसे ने किताब लिखी- गांधी वध क्यों? उसके लिए 30 जनवरी 1948 को जो हुआ वह राष्ट्रपिता की हत्या नहीं थी, वध था! और वध तो सनातन काल से जायज, पवित्र है! वैसे ही राष्ट्र निर्माण में, हिंदुत्व की राह में, देश को फिर से उसका गौरव वापस दिलाने के रास्ते में अनैतिक या पाप कुछ नहीं है वह तो साधन है, एक महान लक्ष्य को हासिल करने का। हालांकि असलियत यह है कि वह महान लक्ष्य असीमित सत्ता हासिल करना है। पर यह याद रहे- सत्ता भ्रष्ट बनाती है और असीमित सत्ता असीमित रूप से भ्रष्ट बनाती है।

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