क्या हो गया बॉलीवुड को?

बात गोल्डन ग्लोब अवार्ड समारोह की है। हास्य अभिनेता और निर्माता-निर्देशक रिकी गार्वेस ने फिल्मी जमात से कहा- “असल दुनिया के बारे में आपको कुछ नहीं पता है।” फिर बोले- आप में से ज्यादातर लोगों ने ग्रेटा थनबर्ग के मुकाबले कम ही समय स्कूल में बिताया होगा। आवेश में उन्होंने आगे कहा – “क्या आपको पुरस्कार मिलना चाहिए? यदि हां, तो अपने एजेंट और ईश्वर को धन्यवाद दो और फूटो यहां से!

फिल्मी समुदाय के लोगों के अराजनैतिक रहने के इस उपहास की कलाकारों ने अनदेखी की मगर उस रात हर पुरस्कार विजेता ने मंच पर जाकर जलवायु संकट, लोकतंत्र और राजनेताओं की आलोचना करते हुए अपनी बात रखी।अभिनेता, अभिनेत्रियां, निर्देशक, पटकथा लेखक, संगीतकार, सजृनशील लोग अपनी-अपनी जुबां से राजनीति पर बोले। संदेह नहीं पश्चिम की फिल्मी दुनिया और उसके मंच,  ऑस्कर से लेकर बाफ्टा और ग्रैमी तक पर राजनीति पर बेबाकी से धड़ल्ले से चर्चा होती है। फिल्मकार अपने मंच का उपयोग अपना रोष व्यक्त करने में, अपनी एकजुटता दिखाने  और समाज की दशा पर चिंता, भय, राय व्यक्त करता मिलेगा। फिल्मकार समाज को प्रभावित कर रहे मुद्दों पर बेबाकी से बोलते हुए दिखते हंै। मगर अपने बॉलीवुड में? ऐसा कुछ भी नहीं!

हमारे कलाकार, अभिनेता-अभिनेत्रियां, सेलेब्रिटी सब के सब मानों सरकार की कठपुतली हों। यों हालीवुड में भी कलाकार अपने-अपने विचारों में बंटे दिखते हैं। मगर वहां अलग-अलग सुर, मतभेद बुद्धिमतत्ता, गरिमा, विश्वास की अभिव्यक्ति होती है जबकि अपने यहा उलटा है। सरकार और उसके रवैये के मुद्दे पर अपने-अपने विचारों में  सिने जगत धड़ों में बंटा है तो असभ्य और भद्दे तरीके से। शिष्ट रूप में अपने विचार , मतभेद बताने के बजाय सब लोग सोशल मीडिया पर ट्रोल करने जैसे आक्रामाक तरीके आजमा रहे हैं। तेजिंदर बग्गा से लेकर अनुराग कश्यप, संबित पात्रा से लेकर स्वरा भास्कर और अनुपम खेर से लेकर विवेक अग्निहोत्री तक सबके सब उस भद्दे तरीके पर उतर चुके हैं कि जैसे किसी के बीच कोई फर्क नहीं रह गया हो।

अमेरिका में राजनीति और मनोरंजन एक दूसरे में गुंथे हुए हैं, दोनों को अलग नहीं किया जा सकता जबकि बॉलीवुड़ में राजनीति पर बेबाकी असंभव रही है!  राजनीति से तौबा या फिर जो सत्ता में है उसके आगे-पीछे थिरकना। हमारे गुजरे जमाने के कलाकार कभी भी राजनीतिक एक्टिविस्ट नहीं हुए। कभी किसी ने राजनीति का चरित्र या प्रकृति बदलने में कोई योगदान नहीं दिया। बल्कि राजनीति से दूरी बनाए रखने में ही बेहतरी समझी। फिल्म कलाकारों से इंटरव्यू या बातचीत में राजनीति या राष्ट्र से जुड़े मुद्दे कभी आते ही नहीं।

लेकिन अब बहुत बदला हुआ भी है। मुझे गलत न समझें, मेरा सच्चे तौर पर मानना है कि किसी भी कलाकार या सृजनशील व्यक्ति की आवाज का अर्थ, उसकी महत्ता, उसका सम्मान समाज मेंअधिक होता है, इसलिए उन्हें अपनी राजनीतिक राय खुल कर अभिव्यक्त करनी चाहिए। लेकिन जब हम हमारे सिने जगत, मुंबईयां बॉलीवुड़ की ओर देखते है तो आश्चर्य होता है कि ये हमारे सेलेब्रिटी क्या सच, हकीकत जानते भी हैं, क्या जानते है किविचार और विचारधारा आखिर है क्या? वे जब किसी नेता, राजनीतिक दल के साथ खड़े होते है, समर्थन कर रहे होते हैं तो उनका अपना दिमाग-दिल काम कर रहा होता है या कठपुतली माफिक होते हंै?  सरकार से खौफ, सरकारी मेहरबानी, पुरस्कार की लालसा या पीआर की सलाह मेंतो कहीं नेता और पार्टी के साथ खड़े नहीं होते है?

मोदी सरकार  शुरूआत से ही बॉलीवुड की हस्तियों को गांठने की रणनीति में रही है। सबसे अच्छा उदाहरण अमिताभ बच्चन का है जिन्हे अभी दादासाहेब फालके सम्मान से नवाजा गया है। उनका ताजा सम्मान कुल मिलाकर पांच साल उनकी सरकार की सेवा के बदले पुरस्कार सा है न कि उनके अभिनय जीवन की उपलब्धियों का सम्मान।

मोदी सरकार ने अमिताभ बच्चन से लेकर अक्षय कुमार, करण जौहर और ऐसे ही बॉलीवुड के कई चेहरों को अपने खेमे में इस उद्देश्य से गांठा ताकि वे सरकार के नैरेटिव का हिस्सा बने। सरकार की उपलब्धियों का बखान करने वाली  “टायलेट: ए लव स्टोरी” , ऊरी, एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर, मिशन मंगल से लेकर अक्षय कुमार के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के इंटरव्यू आदि के कई अलग-अलग उपयोग दिखे।  इतना ही नहीं, ऊरी फिल्म के निर्देशकों और कलाकारों के साथ नरेंद्र मोदी की सेल्फी तक का प्रदर्शन देखने को मिला। इस फिल्म के कलाकारों को नेशनल फिल्म पुरस्कार का शो बहुत शौशेबाजी से हुआ। आश्चर्य नहीं जो मोदी युग के आदर्श निर्देशक की स्तुति  में‘मनोरंजक, मुनाफेदार, फोटोजेनिक, सोशलमीडिया का सिद्धहस्त और बहुत सेवाभावी जैसे जुमले थे।

दरअसल बॉलीवुड में हौड बनी याकि बनाई गई कि कौन प्रधानमंत्री मोदी का कृपापात्र है, उनका अनुयायी है। जिन अभिनेताओं ने पहले इस सबसे अपने को अलग रखा था वे भी बाद में कतार में आ लगें। जैसे शाहरुख खान जो राजनीति से तौबा करते हुए दूरी रखते थे या आमिर खान जिन्होने 2015 में असहिष्णुता पर बोला था दोनों बाद में सात, लोक कल्याण मार्ग पर मोदी के साथ सेल्फी लेते नजर आए!

जाहिर है बॉलीवुड आज जैसे समाज का बिगड़ा ढांचा है, वैसे ही स्वरूप में है। इन अभिनेताओं, फिल्म निर्माताओं और निर्देशकोंकी आज पहले के मुकाबले में धमक बहुत फिसली हुई है? हिसाब से हॉलीवुड़ की तरह अपने कलाकार भी समाज पर असर में रचनात्मक भूमिका लिए हुए होने चाहिए। पर क्या ऐसी भूमिका है? और इन्होने जो किया है क्या उस पर इन्हे जरा भी शर्म महसूस नहीं होती? टॉयलेटः एक प्रेम कथा, जैसी फिल्मों से बॉलीवुड की छवि को क्या तो चार चांद लगे है और हीरो-हिरोईन के नाच-गानों के बीच समाज ने शौचालय की फायदे को कैसे क्या समझा-बूझा होगा इस पर ज्यादा विवेचना की जरूरत नहीं है! एक तरफ ह़ॉलीवुड और वैश्विक फिल्मों की दुनिया में  सृजनात्मकता-रचनात्मकता के नए प्रतिमान मं रोमा, टू पॉप, पैरासाइट( दक्षिण कोरियाई) जैसी कृतियों, फिल्मों का निर्माँण है, नए प्रतिमान है तो दूसरी तरफ बॉलीवुड का अपना शो केस है-टॉयलेटः एक प्रेम कथा! कैसा-कितना अधोपतन!

सिनेमा आज वक्त की, युग की संस्कृति की अभिव्यक्ति है। उस नाते 2020  में हमारे अभिनेता और फिल्मनिर्माता देश और समाज की क्या झांकी, संस्कृति दर्शा रहे है? सब हिपोक्रेसी में लथपथ और हर तरह का पाखंड।  दुनिया में हमारी फिल्मों की वह तस्वीर, हमारी वह तस्वीर बन रही है जिसे फिल्मकार शायद समझते हुए भी अपने आपको बदलने में समर्थ नहीं है।जिस तरह की राय वे भारत के बारे में बनवा रहे हैं और दे रहे हैं, उससे नए भारत की बहुत ही अजीब और नकली छवि बन रही है। तभी सोचने वाली बात है कि आखिर किस तरह का नया भारत बनवा रहे हैं ये लोग अपनी फिल्मों से, अपने व्यवहार से?

तभी रिकी गार्वेस की बात समझने वाली है। भारत के फिल्म उद्योग को राजनीति में ताली बजाने या आलोचना करने या टीका-टिप्पणी करने से पूरी तरह दूरी बना लेनी चाहिए। आखिर राजनीति और नेताओं को हैंडल कर सकना हर किसी के बस में नहीं होता। फिर बॉलीवुड के एक्टरों-निर्देशकों ने भी कम ही समय स्कूल व बुद्धी की साधना में बिताया होगा ग्रेटा थनबर्ग के मुकाबले!

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