चरित्र का यह कैसा दर्शन?

मनु बेन के आइने में (2): मनु बेन की डायरी आगे बढ़ती है। अमीषापाड़ा, बिहार, 2 फरवरी 1947: ‘‘आज बापू ने मेरी डायरी देखी और मुझ से कहा कि मैं इस का ध्यान रखूँ ताकि यह अनजान लोगों के हाथ न पड़ जाए क्योंकि इस में लिखी बातों का गलत उपयोग कर सकते हैं, हालाँकि ब्रह्मचर्य के प्रयोगों के बारे में हमें कुछ छिपाना नहीं है।’’ जबकि यह सब गोपनीय चल रहा था।

प्रसादपुर, बिहार, 7 फरवरी 1947: ‘‘ब्रह्मचर्य के प्रयोगों को लेकर माहौल लगातार गर्माता ही जा रहा है। अमृतलाल ठक्कर (ठक्कर बापा) आज आए और अपने साथ बहुत सारी डाक लाए जो इस मुद्दे पर बहुत ‘गर्म’ थी। और इन पत्रों को पढ़ कर मैं हिल गई।’’

हेमचर, बिहार, 24 फरवरी 1947: ‘‘…आज बापू ने अमतुस सलाम बेन को एक बहुत कड़ा पत्र लिख कर कहा कि उन का जो पत्र मिला है उस से जाहिर होता है कि वे इस बात से नाराज हैं कि ब्रह्मचर्य के प्रयोग उन (अमतुस सलाम) के साथ शुरू नहीं हुए।’’ वहीं, 25 फरवरी 1947, ‘‘ … इस पर (ठक्कर) बापा ने (गाँधीजी को) कहा कि ब्रह्मचर्य की उन की परिभाषा आम आदमी की परिभाषा से बिलकुल अलग है और पूछा कि यदि मुस्लिम लीग को इस की भनक भी लग गई और उस ने इस बारे में लांछन लगाए तो क्या होगा? बापू ने कहा कि किसी के डर से वे अपने धर्म को नहीं छोड़ेंगे…।’’  अर्थात्, यह सब बातें लोगों से छिपी हुई थीं। यह कथित यज्ञ गाँधी का ‘निजी’ था, जिसे निकटस्थ लोग छिपा कर रखते थे।

हेमचर, बिहार, 26 फरवरी 1947: ‘‘आज जब अमतुस सलाम बेन ने मुझ से प्यारेलाल से शादी करने को कहा तो मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने कह दिया कि अगर उन्हें उन की इतनी चिंता है तो वे स्वयं उन से शादी क्यों नहीं कर लेतीं? मैंने उन से कह दिया कि ब्रह्मचर्य के प्रयोग उन के साथ शुरू हुए थे और अब अखबारों में मेरे फोटो छपते देखकर उन्हें मुझ से जलन होती है और मेरी लोकप्रियता उन्हें अच्छी नहीं लगती।’’

यानी, जो प्रयोग मनु के साथ हो रहा था, वह पहले अमतुस सलाम के साथ हुआ था! उस से पहले सुशीला नायर के साथ। गाँधी स्वयं को सुशीला का ‘पिता’ कह चुके हैं, और अब अपने को मनु की ‘माँ’ कह रहे हैं। पता नहीं उन्होंने अमतुस सलाम से क्या संबंध जोड़ा था, और ऐसे विचित्र संबोधन की इस ‘यज्ञ’ या  ‘प्रयोग’ में क्या जरूरत थी?

पुनः हेमचर, बिहार, 2 मार्च 1947:  ‘‘आज बापू को (ठक्कर) बापा का एक गुप्त पत्र मिला। उन्होंने इसे मुझे पढ़ने को दिया। यह पत्र दिल को इतना छू लेने वाला था कि मैंने बापू से आग्रह किया कि बापा को संतुष्ट करने के लिए आज से मुझे अलग सोने की अनुमति दें।’’

इस प्रकार, ठक्कर बापा की वेदना से द्रवित होकर, मनु ने गाँधी की इच्छा के विरुद्ध, अपने अलग सोने की अनुमति माँगी। तब से यह प्रयोग, यज्ञ, आदि जो था, सहसा बंद हो गया। गाँधी के परिवारजनों, निकट सहयोगियों ने शांति की साँस ली।

डायरी आगे, मसौढ़ी, बिहार, 18 मार्च 1947:  ‘‘आज बापू ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात का खुलासा किया। मैंने उन से पूछा कि क्या सुशीला बेन भी उन के साथ निर्वस्त्र सो चुकी है क्योंकि जब मैंने उन (सुशीला) से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि वे प्रयोगों का कभी भी हिस्सा नहीं बनी और उन (गाँधी) के साथ कभी निर्वस्त्र नहीं सोई। बापू ने कहा कि सुशीला सच नहीं कह रही, क्योंकि वह बारडोली (1939 में जब पहली बार सुशीला बतौर चिकित्सक उन के साथ जुड़ी थीं) के अलावा आगा खाँ पैलेस, पुणे में उन के साथ सो चुकी थी। बापू ने बताया कि वह उन की मौजूदगी में स्नान भी कर चुकी है। फिर बापू ने कहा कि जब सारी बातें मुझे पता ही हैं तो मैं यह सब क्यों पूछ रही हूँ?’’

क्या गाँधी चिढ़े हुए थे और सुशीला के विरुद्ध स्कोर कर रहे थे? उसी सुशीला के विरुद्ध, जिसे नौ वर्ष पहले अपने पास वापस बुलाने के लिए कितनी मनुहारी, ऊँची-ऊँची बातें कही थी और इस के लिए दर्जनों पत्र लिखे थे। जिसे वे अपनी ‘बेटी’ कहते थे। उसी बेटी को पीठ-पीछे नीचा दिखाना, यह गाँधी के चरित्र में किस चीज का दर्शन कराता है? यह भी देखें, कि इस ‘यज्ञ’ में शामिल लोगों में कैसे मनोभाव हैं।

सुशीला के बारे में वह सब बताते हुए गाँधी किसी यज्ञ की पदावली या सुगंध का आभास नहीं देते। जैसी हल्की बातें गाँधी सुशीला के बारे में मनु को कहते हैं, उस से प्रश्न उठता है कि वर्षों तक एकांत में युवा सुशीला के साथ सोते हुए, या उसे स्नान कराते हुए बापू और वे क्या बातें करते थे? या मौन रहते थे? ब्रह्मचर्य ‘यज्ञ’ या ‘प्रयोगों’ के समय, या उस के बाद होने वाली वार्ताएं क्या अप्रासंगिक थीं? यदि नहीं, तब इस 18 मार्च 1947 वाली गाँधी-मनु वार्ता से याज्ञिक गाँधी के मन का कौन सा भाव प्रकट होता है?

आगे, 18 नवंबर 1947 को मनु की डायरी: ‘‘आज जब मैं बापू को स्नान करवा रही थी तो वे मुझ पर बहुत नाराज हुए क्योंकि मैंने उन के साथ शाम को घूमना बंद कर दिया था। उन्होंने बहुत कड़वे शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा, ‘जब तुम मेरे जीते जी मेरी बात नहीं मानतीं तो मेरे मरने के बाद क्या करोगी? क्या तुम मेरे मरने का इंतजार कर रही हो?’ यह शब्द सुनकर मैं सन्न रह गई और जवाब देने की हिम्मत नहीं जुटा पाई।’’

इस प्रसंग की तुलना (पिछले भाग में उद्धृत) डायरी के 18 जनवरी 1947 वाले विवरण से करें। गाँधी अपनी सेविकाओं के साथ कैसा संबंध और व्यवहार रखते रहे थे? यह सीधे मालिक-सेविका का सूखा मामला दिखता है। इस से किसी प्रयोग या यज्ञ जैसी भावना का कोई ताल-मेल नहीं बैठता।

मनु बेन द्वारा दिए गए विवरण गाँधी के अंतिम पाँच वर्षों की झलक देते हैं। नोट करने की बात यह है कि इन विवरणों तथा और भी पिछले वर्षों की संबंधित बातों, अन्य शामिल व्यक्तियों और प्रत्यक्षदर्शियों द्वारा कही, लिखी बातों से मिलान करने पर कहीं तथ्यों का खंडन नहीं मिलता। (विस्तार के लिए देखें, लेखक की ‘गाँधी के ब्रह्मचर्य प्रयोग’, नई दिल्लीः राजपाल एंड सन्स, 2012)

सुशीला नायर, मीरा बेन, प्रो. निर्मल बोस, परशुराम, आदि जिन भी निकट सहयोगियों ने गाँधी के इस कार्य पर पहले या इस अंतिम दौर में आपत्ति करते हुए जो भी कहा था, वह सब मनु बेन की डायरी से पुष्ट होता है। यह गाँधी के कथित प्रयोगों के बारे में उन बातों की भी पुष्टि करता है जो मीरा बहन, सरदार पटेल, घनश्याम दास बिड़ला, किशोर मश्रुबाला, देवदास गाँधी, बिनोबा भावे, आदि अनेक महत्वपूर्ण महानुभावों ने कहे थे। रोचक यह कि वर्षों से चलते गाँधी के इस विवादास्पद कार्य पर उन के केवल एक निकट सहयोगी की कोई टिप्पणी नहीं मिलती – जवाहरलाल  नेहरू! क्या सभी निकट लोगों में केवल वही थे जो इस मामले में गाँधी को सही, या सही-सही समझ रहे थे?      (जारी)

2 thoughts on “चरित्र का यह कैसा दर्शन?

  1. कोरा ऐप पर एक गांधीवादी ने लिखा , गांधी अपने बेडरूम में क्या करते थे इससे हमें मतलब नहीं होना चाहिए। वाह ये गांधीवाद और गांधीगिरी !

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