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Thursday, May 13, 2021
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सांस!

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हरिशंकर व्यासhttp://www.nayaindia.com
भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था।आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य।संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

मैं और मेरा धड़कता जीवन… फिर सुबह चिड़ियों की चहचहाहट पर भन्ना बैठा! इंसान दुबका हुआ, न टहलता, न बोलता और घरों में, कमरों में बंद अपनी सांसें काउंट करता हुआ और चिड़िया की चीं चीं चूं चूं! हां, मैं भी सांस की गिनती करते हुए। फिलहाल 97-98 पर टिकी गिनती में बार-बार… दिन में सैकड़ों बार धड़कते हुए सोचता हूं यदि ये 90 से नीचे चली गई तो क्या होगा! कभी कल्पना नहीं की..भला ऐसे भी गिनना होगा अपनी सांस को अपने हाथों! बनाए रखना होगा पल-पल, क्षण-क्षण धड़कन का बोध! सुबह बॉलकनी में, श्रीमतीजी द्वारा लगवाई ऑक्सीजन की बगिया से श्वांस खींचते हुए मुझे चिड़ियों से रंज होगा कि इन्हें सांस की चिंता नहीं, जबकि मैं उंगली में ऑक्सीमीटर लगाए हुए!

उफ! चिड़ियों का फुदकना और इंसान का दुबकना। चिड़ियों का चहचहाना और इंसान का मुंह पर पट्टी बांधे रहना। चिड़ियों का संग-संग उड़ना, एक-दूसरे को चोंचें मारना, जबकि इंसान का सोशल डिस्टेंसिंग में जीना! चिड़ियों का बेफिक्र-बेपरवाह आना-जाना, अटखेलियां करना, मुक्तता-निश्चितता से झुंड के झुंड घूमना-उड़ना, दाना-पानी का जुगाड़ करना और इंसान…

मैं भी सांस से, चिड़िया भी सांस से…

पर मैं सांस गिनता हुआ और चिड़िया सांस की नैसर्गिक निश्चिंतता में! कैसी यह अनहोनी? इंसान, जिसने दुनिया बनाई जो इस बोध में जीते हुए है कि वह हवा-पानी से जीता है उसी को सांस का सकंट और जिन चिड़ियों को जैविक सत्य का बोध नहीं वे मजे से, सांस, प्राणवायु में इठलाती हुई! इंसान को चिढ़ाती हुई!

यह क्या हुआ! कैसे हुआ?

सांस.. ऑक्सीजन..हवा और उसके चलते फड़फड़ाता-तड़पता आज इंसान!

मैं भावविह्ल हो गया जब बत्रा अस्पताल के डॉ. गुप्ता से घटती सांस (ऑक्सीजन) में एक डॉक्टर संग मरीजों के मरने की व्यथा सुनी। क्या वह वक्त होगा, कैसे क्षण होंगे जब मशीन यह चेतावनी देते हुए थी कि सांस खत्म हो रही है, प्राण पखेरू उड़ रहे हैं, सांस सप्लाई करो लेकिन डॉक्टर फूट-फूट कर रोते हुए थे न कि नली में सांस बनाए रखने की स्थिति में! भारत देश की राजधानी दिल्ली…दिल्ली महानगर का फाइव स्टार अस्पताल, आधुनिक विज्ञान-चिकित्सा की हर मशीन, हर प्रबंध लिए हुए और 45 साल के अनुभव को लिए डॉक्टर लेकिन सब कुछ व्यर्थ-निरर्थक। हवा….ऑक्सीजन….सांस पल-पल खत्म होती हुई और और जिंदा आंखों के आगे जिंदा लोग प्राण छोड़ते हुए!

क्या यह इंसान की असफलता है? क्या यह इंसान की विज्ञान यात्रा पर फुलस्टॉप है? क्या यह आधुनिक विज्ञान-चिकित्सा का फेल होना है?

नहीं!

यह उस आबोहवा, उस परिवेश, पृथ्वी के उस क्षेत्र विशेष का जहर है, वह दुर्दशा है, जिसका विषैलापन, निकम्मापन पूरी इंसानियत की सांस को मार रहा है!

यह कहीं नहीं हुआ, कभी नहीं हुआ कि विज्ञान के आगे मौत खड़ी हो, मशीन मौत की घंटी बजा रही हो और विज्ञान (चिकित्सा) कुछ लिए हुए न हो। सांस को खींचती हुई मौत लेकिन सांस की सप्लाई नहीं। मैं.. आप, दुनिया सब जानते हैं कि इंसान ने, विज्ञान ने वेंटिलेटर नाम की वह मशीन बनाई हुई है जो मृतप्रायः शरीर में भी सांस फूंकते हुए उम्मीद बनाए रखती है। जबकि आज? मुंह पर सांस की नली है, नाक है, फेफड़े हैं, धड़कते हुए है लेकिन देश-व्यवस्था-शासक-प्रशासक नाम का जो आडंबर है वह उसमें सांस (हवा) की सिलेंडर पर बपौती बना यमराज बना बैठा है!

अहोभाग्य चीडियों का, बिना आंडबरों के जीवन!

संकट क्षेत्र विशेष का है। महामारी पहले भी आई। पूरी दुनिया में है और वह सबकी सांस उखाड़ते हुए है लेकिन जहां भी इंसान सचमुच इंसान है वहां गिरती सांस को रोकने की कोशिश इसलिए फेल नहीं है क्योंकि ऑक्सीजन या कि सांस, हवा देने की सप्लाई, सिलेंडर नहीं है!

फेफड़ा उनका भी है, फेफड़ा चिड़िया का भी है, फेफड़ा मेरा है आपका है लेकिन मेरे-आपके याकि भारत के फेफड़े से जब वायरस प्राणवायु को सोखता है तो वह मौत के अपने मिशन में बेफिक्र होता है! उसे पता है कि हिंदुस्तानियों का योग-प्राणायाम प्रदूषित हवा का शगल है। कौन है दुनिया में दूसरा देश जो इतनी जहरीली हवाएं लिए हुए है, जितना भारत लिए हुए है?… हां, न हवा साफ है न पानी साफ है और न बुद्धि साफ है। सो, जो कुछ है वह लावारिस शरीर के विलोम-प्रतिलोम की उन धड़कनों से है जो जन्म से जैसे बनती हैं वैसे बनी रहती हैं! तभी मैं लिखता रहा हूं कि कोविड-19 के लिए भारत नंबर एक चरागाह होगा!

सांस!

प्राण बनाने वाली, प्राण उड़ान वाली!….तो चेतना में इस टिक-टिक का क्या हो कि 96, 95, 94, 93, 92, 91, 90, 89….चेतो, भागो, अस्पताल जाओ, घर वालों सिलेंडर खरीद-भरवा कर रखो, ऑक्सीजन कंसंट्रेटर लगाओ, रेमडेसिविर इंजेक्शन का जुगाड़ करके रखो, पांच-दस लाख रुपए नकद जमा करके रखो नहीं तो बिना सांस मर जाएंगे। सांस के लिए तो घर भी गिरवी रखेंगे तो चलेगा…. पर सांस… है कहां? अस्पताल में? बाजार में? कहां खरीदे, बेटा धूप में सिलेंडर लिए घंटों लाईन में खड़ा है, टकटकी लगाएं नंबर आने के इंतजार में तो उधर पिता बिस्तर में लेटा स्क्रीन पर घटती सांसों पर अटका हुआ… पत्नी बोल बैठी बेटी से… ले चलो सांस के लंगर… बूंद..दो बूंद…उन्हीं से शायद फेफड़े स्थिर हो जाएं!

काश! मैं चिड़िया होता.. यह सब नहीं सोचना पड़ता! इंसान होना कितना त्रासद है, कैसी यह यंत्रणा है, जिसमें हवा-पानी-बुद्धि-सत्य सबके लिए लगातार फड़फड़ाना है!

सांस!

मेरी चिंता, मेरी व्यथा,…मेरे अपनों, मेरे समाज, मेरे धर्म की यंत्रणा, मेरे देश की रूदाली! क्या होती है 140 करोड़ लोगों की सांस और उसकी यत्रंणा?

क्या अब यह नहीं कि सांस की पल-पल गिनती…और गिनती गिरी नहीं कि घर हो या, एंबुलेंस या अस्पताल क्षण-क्षण भारी होती सांस और सन्न अवस्था… पता नहीं सांस के लिए लड़ते लाखों-करोड़ों दिमागों और परिवारों में उन क्षणों में चेतना कैसे अंधकार में सांस लेते हुए होगी….

उखड़ती सांस में मौत से साक्षात्कार… अस्पताल का डॉक्टर हो या परिजन सब मौत की दस्तक की आहट, उसकी खटखट को पल-पल घटती ऑक्सीजन के साथ अनुभव करते हुए!… और सिलेंडर खत्म.. हे राम!

सोचें, घटती सांस में शरीर से उखड़ते प्राण, जीवन और उसे बचाने के लिए बैठे लोग सभी मौत के अनुभव, उससे साक्षात्कार में क्या कुछ-विचारते हुए.. बत्रा अस्पताल या उस जैसे असंख्य अस्पतालों के डॉक्टरों के आगे उखड़ती सांसों में नाचती मौत के साक्षात्कार से आज देश और समाज जैसे गुजर रहा है क्या वह देश मानवता के इतिहास में वह नया नरसंहार नहीं रच रहा है, जिसमें संवेदना का रंच मात्र रंज नहीं! हिटलर ने गैस चैंबर बना कर मौत का जो प्रायोजन बनवाया था वह सुविचारित था, कंपूचिया में एक तानाशाह पोल पोट ने लाशों का अंबार लगा खोपड़ियों के ढेर पर अपने राज की नरसंहार पताका का जो इतिहास बनाया था वह भी क्रूरता-बर्बरता की मनोबुनावट में था लेकिन 21वीं सदी के सन् 21 में सांस के लिए, सांस की तड़पड़ाहट में तड़पा-तड़पा कर लोगों को मरने देना (इस झूठ के साथ कि मर कहां रहे हैं और कितने मर रहे हैं!), घर-अस्पताल में मौत की दस्तक से लेकर आखिर तक का जीवंत साक्षात्कार बनवाना, मौत के चौके-छक्के बनना मानवता के इतिहास में, पृथ्वी के इतिहास में पहले भला कब हुआ? यह नरसंहार है या सांसों का संहार!

काश! मैं चिड़िया होता! इंसान होना तो जंजाल है! अपनी सांस की खुद गिनती करना….उस नाते शायद भाग्यशाली हूं जो गिनती का ऑक्सीमीटर लिए हुए हूं! सत्य को देख-समझ सकता हूं। देश और सत्ता के झूठ से पार सांस के सत्य में जीते हुए हूं!

यह जीना है या फड़फड़ाना? वे लोग, उनका जीना क्या अच्छा नहीं जो बिना बोध, बिना सत्य के जीते हैं। जब सुनने को मिलता है कि आसपास के देहात से सांस के बेखबर मतलब ऑक्सीमीटर पर 70-60 की गिनती लिए मरीज पहुंच कर मर रहे हैं तो जाहिर है उनका मरना जुखाम-बुखार की बेफिक्री में था। उन्होंने कोई सत्य जाना हुआ नहीं था। वे अपने लिए भी आसान थे, अस्पताल और सरकार के लिए भी आसान! वे न सरकार का आंकड़ा बने और न वायरस संक्रमण का! जीवन आदिम था.. उसी में अनजान-गफलती मौत में प्राणपखेरू गंवा बैठे!

सांस!

फिर भी सबका अंतिम सत्य!

वह सांस, जो गैस चैंबर में घुट-घुट कर दम तोड़े या घर-अस्पताल में मरे, गुमनामी-झूठ में मरे या चेतना-सत्य में मौत से साक्षात्कार करते हुए लुप्त हो। सांस है तो सत्य…..यह सत्य झूठ में कितना दबा रहेगा…कितनी जानें लेगा, कितने परिवार अधमरे होंगे… कल्पना न जमीन का प्राणी कर सकता है और न आकाश में उड़ती चिड़िया। चिड़िया यदि जाग्रतता लिए हुए होती तो यही विचारती कि शरीर तब मरता है जब अंग-प्रत्यंग बुढ़ाते हैं, वे दुर्घटना, आदि से क्षत-विक्षत होने पर सांस न ले सकने की असमर्थता से मरते हैं। मगर अंग स्वस्थ है, जवान है, काम करते हुए है तो सांस खुद ही उन सबको खत्म कर खुद खत्म हो जाए तो यह इंसान का कैसा विकास! मौत का कैसा यह नया तांडव कि शरीर सांस लेने में समर्थ है लेकिन ऑक्सीजन नहीं है, उसके सिलेंडर, कंसंट्रेटर नहीं है।

हे प्रभु, यह क्या लीला! सांस भी सांस तोड़ती हुई!

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