बजट या सरकारी संपत्तियों की बंपर सेल?


यह समझना मुश्किल है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने देश का आम बजट पेश किया है या देश की संपत्तियों की बंपर सेल का ऐलान किया है? अगर कम से कम शब्दों में वित्त वर्ष 2021-22 के लिए पेश किए गए आम बजट को बताना हो तो कहा जा सकता है कि यह सरकारी संपत्तियों की धमाकेदार बिक्री का ऐलान भर है। इसके अलावा भी कुछ बातें हैं पर मुख्य बात यह है कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को बेचेगी, अलग अलग सेक्टर में निजी भागीदारी बढ़ाएगी और राजमार्गों के जरिए भी पैसा कमाने के उपाय करेगी।

हालांकि ऐसा नहीं है कि यह सरकार या पूर्ववर्ती सरकारें पहले सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की बिक्री नहीं करती थीं। निर्मला सीतारमण ने ही पिछले साल के बजट में कहा था कि सरकार विनिवेश के जरिए दो लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई करेगी। यह अलग बात है कि बजट के तुरंत बाद कोरोना वायरस की महामारी शुरू हो गई है और सरकारी संपत्तियों को बेच कर दो लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई करने के अरमान अधूरे रह गए। चालू वित्त वर्ष में सरकार को विनिवेश से सिर्फ 15 हजार करोड़ रुपए की कमाई हुई है। तभी अगले साल के लिए यानी वित्त वर्ष 2021-22 के लिए विनिवेश का लक्ष्य कुछ कम कर दिया गया है। अगले साल सरकारी कंपनियों को बेच कर सिर्फ एक लाख 75 हजार करोड़ रुपए कमाने का लक्ष्य रखा गया है!

इसमें क्या क्या बेचा जाएगा, उसकी पूरी सूची आनी अभी बाकी है पर वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में ही साफ कर दिया है कि भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी ऑफ इंडिया में सरकार अपनी हिस्सेदारी बेचेगी। इसके लिए आईपीओ लाया जाएगा। माना जा रहा है कि सरकार एलआईसी में 15 से 25 फीसदी तक हिस्सेदारी बेच देगी। इससे बड़ी कमाई होगी क्योंकि एलआईसी भारत की सबसे मूल्यवान दो-चार कंपनियों में से है और दूसरे, बीमा का क्षेत्र बहुत तेजी से बढ़ने वाला वित्तीय क्षेत्र है। सोचें, अब तक सरकार एलआईसी का इस्तेमाल दूसरी कंपनियों को संकट से बचाने के लिए करती रही थी, जैसे आईडीबीआई बैंक को एलआईसी के पैसे से बचाया या एस बैंक को उसके जरिए बचाया लेकिन अब सरकार खुद को बचाने के लिए ही एलआईसी का इस्तेमाल कर रही है। सरकार भले नहीं कहे पर हकीकत यह है कि उसके सामने बड़ा आर्थिक संकट है, जिससे बचने के कई तरीकों में से एक तरीका एलआईसी की हिस्सेदारी बेचने का है।

एलआईसी में हिस्सेदारी बेचने की बात ज्यादा अहम इसलिए हो जाती है क्योंकि सरकार ने बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई की सीमा 49 से बढ़ा कर 74 फीसदी करने का ऐलान किया है। जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने बीमा सेक्टर में एफडीआई 26 से बढ़ा कर 49 फीसदी किया था तब भाजपा ने आसमान सर पर उठा लिया था। पूरे देश में प्रदर्शन हुए थे और भाजपा ने कांग्रेस के ऊपर देश बेचने का आरोप लगाया था। लेकिन अब बीमा क्षेत्र में सीधे 74 फीसदी की इजाजत दी जा रही है। इसका मतलब है कि अब विदेशी बीमा कंपनियों को अपने मालिकाने के साथ बीमा कारोबार करने की इजाजत होगी। इसके अलावा दो सरकारी बैंकों को भी बेचने की बात हुई है, राजमार्गों के मौद्रीकरण की बात हुई है, गेल की गैस पाइप लाइन से लेकर इंडियन ऑयल की पाइप लाइनों को बेचने की बात भी हुई है। वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि नीति आयोग से उन कंपनियों की सूची मांगी गई है, जिन्हें बेचा जा सकता है। सोचें, पहले से सरकार के पास दो दर्जन कंपनियों की सूची है, जिनको बेचना है। अब ऊपर से और कंपनियों की सूची मांगी जा रही है!

सरकारी कंपनियों को बेचने और निजीकरण की बात चली है तो एक और बात की ओर ध्यान दिलाना जरूरी है, जो वित्त मंत्री ने कही है। वित्त मंत्री ने कहा है कि एक सौ सैनिक स्कूल खोले जाएंगे, जिनमें निजी भागीदारी की जाएगी। यानी निजी संस्थाओं की मदद से सैनिक स्कूल खोले और चलाए जाएंगे। सरकार शिक्षा के क्षेत्र में पहले ही निजी और विदेशी संस्थाओं को बड़े पैमाने पर ऑपरेट करने की मंजूरी दे चुकी है। अब सैनिक स्कूलों में निजी भागीदारी उससे भी आगे की चीज है। क्या राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ जैसी किसी संस्था को सैनिक स्कूलों के संचालन में शामिल करने की तैयारी हो रही है?

कोरोना वायरस की महामारी के बीच आए इस बजट को लेकर उम्मीद की जा रही थी कि इसमें आम लोगों को कुछ राहत मिलेगी। उनके हाथ में नकद पैसा पहुंचाने का इंतजाम होगा ताकि बाजार में मांग बढ़े और विकास दर पटरी पर लौटे। लेकिन उसकी बजाय सरकार ने लोगों पर और बोझ डाल दिया है। कृषि क्षेत्र के बुनियादी ढांचे का विकास करने के लिए पेट्रोल और डीजल के ऊपर उपकर लगा दिया गया है। सरकार ने पेट्रोल पर ढाई रुपए और डीजल पर चार रुपए प्रति लीटर उपकर का प्रस्ताव किया है। सोचें, भारत सरकार पहले ही पेट्रोल पर 32.83 रुपए और डीजल पर 31.63 रुपए उत्पाद शुल्क वसूल रही है, अब ऊपर से और उपकर लगा दिया गया। अगर सरकार उत्पाद शुल्क में कटौती नहीं करती है तो इसकी मार कृषि सेक्टर के साथ साथ हर तबके पर पड़ेगी।

सरकार ने आय कर स्लैब में भी कई बदलाव नहीं किया है। कोरोना की महामारी और ठप्प आर्थिकी में लोगों की आय का पता नहीं है। इसके बावजूद आय कर स्लैब में बदलाव नहीं किया गया है। वरिष्ठ नागरिकों को यह झुनझुना पकड़ाया गया है कि 75 साल से ऊपर के लोगों को  रिटर्न नहीं भरना होगा। इसका यह मतलब नहीं होगा कि उन्हें कर नहीं चुकाना है। कर तो उनकी पेंशन और बचत पर मिलने वाले ब्याज में से अपने आप कट जाएगा। उन्हें सिर्फ रिटर्न फाइल नहीं करना होगा। सरकार ने कर चोरी करने वालों के लिए भी एक बड़ा विंडो खोल दिया है। अब संपत्ति की जानकारी छिपा कर टैक्स चोरी करने वालों की सिर्फ तीन साल पुरानी फाइल ही खुल सकती है, पहले छह साल पुरानी फाइल खुल सकती थी। इसी तरह किसी की 10 साल पुरानी फाइल तभी खुलेगी, जब कर चोरी के लिए छिपाई गई रकम 50 लाख से ऊपर हो।

विनिवेश की घोषणाओं के साथ साथ सरकार एक और मामले में बजट को साहसिक बता सकती है कि उसने घाटे के बजट के लिए अपना संकल्प जाहिर कर दिया है। वित्त मंत्री ने वित्तीय अनुशासन के सिद्धांतों को खिड़की से बाहर फेंकते हुए कहा कि छह साल तक वित्तीय घाटे की परवाह किए बगैर सरकार खर्च बढ़ाएगी। ध्यान रहे कोरोना संक्रमण की महामारी में सरकार का राजस्व बहुत कम हो गया और उस अनुपात में खर्च कम नहीं हुआ, जिसकी वजह से चालू वित्त वर्ष यानी 2020-21 में वित्तीय घाटा साढ़े नौ फीसदी पहुंच गया, जिसे साढ़े तीन फीसदी रहना था। अगले वित्त वर्ष में वित्तीय घाटा 6.8 फीसदी रहने का अनुमान है और साल 2026 तक यह साढ़े चार फीसदी तक आएगा।

वित्त मंत्री ने सरकारी खर्च बढ़ाने की घोषणा की है। कहां-कहां खर्च बढ़ेगा उसका पता बाद में चलेगा, लेकिन पहली नजर में यह दिखा है कि जिन राज्यों में अप्रैल-मई में चुनाव होने वाले हैं वहां सड़क परियोजनाओं पर बड़ा खर्च होना है। पश्चिम बंगाल में 675 किलोमीटर हाईवे बनाया जाएगा, जिस पर 25 हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे। तमिलनाडु में साढ़े तीन हजार किलोमीटर के राजमार्ग पर एक लाख तीन हजार करोड़ रुपया खर्च करने का ऐलान हुआ है। ऐसे ही केरल में 11 सौ किलोमीटर राजमार्ग पर 65 हजार करोड़ रुपया खर्च होगा और असम में 19 हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे। सरकार ने कोरोना की वैक्सीन के लिए 35 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। स्वास्थ्य सेवाओं पर 94 हजार करोड़ रुपए से बढ़ा कर 2.23 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का प्रावधान किया गया है। सरकार का पूंजीगत खर्च 5.54 लाख करोड़ रुपए रहना है। हालांकि इनमें से कोई चीज ऐसी नहीं है, जिससे सीधे लोगों के हाथ में नकद पैसा जाएगा, जिससे अर्थव्यवस्था की गाड़ी चलने लगेगी। सारी घोषणाएं पिछले साल कोरोना राहत के नाम पर घोषित पैकेज की तरह ही है, जिसका आम लोगों को क्या लाभ मिला, यह पता चलने में बरसों लग जाएंगे! चूंकि सरकार ने निजीकरण को बढ़ावा देने, विनिवेश बढ़ाने, एफडीआई बढ़ाने और सरकारी खर्च बढ़ाने का ऐलान किया है इसलिए शेयर बाजार ने इसका जम कर स्वागत किया है। अगर बजट आम आदमी के हित का होता तब तो शेयर बाजार औंधे मुंह गिरा होता!


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