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खौफ फैलाते मुद्दे

देश में पिछले दो-तीन महीने से नागरिकता संशोधित कानून (सीएए), राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को लेकर लेकर जिस तरह कोहराम मचा है, उससे लोगों के मन में एक तरह का डर पैदा हो गया है। लोग तो खौफ में हैं ही, राज्य सरकारें तक तय नहीं कर पा रही हैं कि इन मुद्दों से कैसे निपटा जाए। इसलिए ज्यादातर गैर-भाजपा शासित राज्यों ने इन तीनों का ही पुरजोर विरोध किया है। केंद्र सरकार बार-बार सफाई दे रही है कि तीनों का ही एक दूसरे से कोई संबंध नहीं है और न ही इससे किसी का नुकसान होने वाला है, लेकिन लोग इसके पीछे सरकार की मंशा को साफ समझ रहे हैं। हाल में बिहार और तेलंगाना ने भी एनपीआर जैसी कवायद का विरोध करते साफ कह दिया कि जिस तरह के फॉर्मेट में केंद्र सरकार इसे करवाने पर तुली है, उसे वे अपने यहां लागू करने वाले नहीं हैं। महाराष्ट्र साफ कह चुका है कि राज्य सरकार की एक त्रिदलीय समिति पहले इसके प्रारूप का अध्ययन करेगी, उसके बाद ही इस बारे में कुछ होगा। कुल मिलाकर देश में इन सीएए, एनआरसी और एनपीआर को लेकर जिस तरह का भ्रम फैला है, वह कोई सामान्य नहीं है और यह कवायद दिनोंदिन स्थिति को खराब करने वाली ही साबित हो रही है।

दरअसल मामला सीएए से शुरू हुआ था और इसके विरोध में पूर्वोत्तर राज्यों से लेकर देश के कई हिस्सों में जो बवाल मचा, वह अभी भी थमने का नाम नहीं ले रहा है। सीएए, एनआरसी के पीछे सरकार का बड़ा तर्क यही रहा है कि इससे घुसपैठियों को बाहर खदेड़ा जा सकेगा। दूसरी ओर सीएए के जरिए अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के सभी हिंदू, सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध और पारसी शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देने का रास्ता साफ हो गया है। लेकिन इसी के साथ असम में एनआरसी का जो हाल देखने को मिला, वह भयावह है। बेहद गरीब लोग जिनके पास खाने और रहने को नहीं है, उन्हें अपने को नागरिक साबित करने के लिए धक्के खाने पड़ रहे हैं। हजारों लोग हिरासत केंद्रों में बंद हैं। कोई सुनने वाला नहीं है। एनपीआर में जिस तरह की जानकारियां लोगों से मांगी जा रही है, वह और भी हैरान करने वाली है। सरकार को यह सोचना चाहिए कि अगर एक लाख घुसपैठिए भी पकड़ में आ गए तो उनको किसके हवाले करेगी, कहां भेजेगी, कौन उन्हें स्वीकार करेगा, अगर भारत के हिरासत के केंद्रों में रखा तो क्या हालात बनेंगे? इसलिए सीएए, अनपीआर और एनआरसी जैसे मुद्दों पर हठीला रवैया छोड़ कर विपक्ष और सभी संबंधित पक्षों के साथ तार्किक संवाद की जरूरत है।

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