सरकार थोड़ी हिम्मत और करे - Naya India
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सरकार थोड़ी हिम्मत और करे

भारत में जनता के क्रोध का जो बरगद उग आया है, सरकार ने उसकी डालें और पत्ते तो तोड़ दिए हैं लेकिन उसकी जहरीली जड़ ज्यों की त्यों है। गृह राज्य मंत्री ने संसद में साफ़-साफ़ कह दिया है कि इस समय देश में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर जैसी कोई चीज बनने ही नहीं जा रही है। इस संबंध में सरकार ने कोई फैसला ही नहीं किया है।उन्होंने सांसदों से यह भी कहा कि राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर तैयार करते वक्त याने जन-गणना करते वक्त नागरिकों को बिल्कुल भी तंग नहीं किया जाएगा। उन्हें कोई भी दस्तावेज दिखाने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। वे चाहेंगे तो ही अपना आधार कार्ड दिखाएंगे। दूसरे शब्दों में इस जन-गणना के दौरान नागरिकता अपने आप में कोई मुद्दा ही नहीं होगा।

भारत में उस समय जो भी रहता हुआ मिलेगा, उसे गिन लिया जाएगा। यह तो बहुत अच्छी बात है लेकिन देश में जो विवाद चल रहा है, जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं, विदेशों में भारत की बदनामी हो रही है, वह इसके कारण थोड़े ही हो रही है। वह हो रही है- नागरिकता रजिस्टर और नए नागरिकता कानून के कारण। इसमें से पहले हिस्से पर तो स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रश्न-चिन्ह लगा दिया था।

उन्होंने 22 दिसंबर 2019 को रामलीला मैदान में साफ़-साफ़ कह दिया कि नागरिकता रजिस्टर को लेकर झूठ फैलाया जा रहा है। उस पर कोई फैसला ही नहीं हुआ है। लेकिन गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में दो बार कहा कि नागरिकता रजिस्टर बनेगा और घुसपैठियों को निकाल बाहर किया जाएगा। अब देश के लोग किसकी बात पर भरोसा करें ? मोदी की बात पर या अमित शाह की बात पर?

अपने राज्यमंत्री की जगह खुद अमित शाह को संसद में स्पष्टीकरण करना चाहिए। यहां यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि नागरिकता रजिस्टर का विचार ही देश में इतनी बड़ी बगावत का कारण क्यों बन गया है ? क्योंकि नागरिकता संशोधन कानून इस बगावत की असली जड़ है। पड़ौसी मुस्लिम देशों के शरणार्थियों में से मुसलमानों को बाहर करके सरकार ने फिजूल की मुसीबत मोल ले ली है।भारतीय मुसलमानों या गैर-मुसलमानों का इससे कुछ लेना-देना नहीं है लेकिन उनके दिल में सरकार की नीयत पर शक बैठ गया है। मैं चाहता हूं कि जैसे नागरिकता रजिस्टर के बारे में सरकार ने दो-टूक बात कही है, वैसे ही वह इस नए नागरिकता कानून में सुधार की बात भी कह दे तो लोग अपने आप शांत हो जाएंगे।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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