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क्या ये सही तरीका है?

उत्तर प्रदेश के बाद अब कर्नाटक ने भी नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ आंदोलन में भाग ले रहे लोगों की संपत्ति जब्त करने का फैसला किया है। जाहिर है, कहा यह गया है कि अगर हिंसा में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान हुआ तो उसकी भरपाई आंदोलन में भाग लेने वाले लोगों से की जाएगी। ये नया ट्रेंड है। आधार अतीत के सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय को बनाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाई कोर्ट के एक आदेश को सही ठहराया था। उस आदेश में हड़ताल या बंद के दौरान सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान के लिए हड़ताल के आयोजक संगठन को उत्तरदायी ठहराने की बात कही गई थी। मगर ये आदेश हमेशा विवादास्पद रहा। अब नागरिकता संशोधन कानून विरोधी आंदोलन के संदर्भ में उस आदेश को बड़े पैमाने पर लागू किया जा रहा है। इससे ये सवाल उठा है कि क्या यह सरकारी दहशत फैला कर आंदोलन पर काबू पाने की कोशिश है। दो सप्ताह से पूरे देश में नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदर्शन चल रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में इस दौरान सबसे ज्यादा हिंसा देखने को मिली। प्रदेश के कई शहरों में प्रदर्शनों के दौरान तोड़फोड़ और आगजनी देखने को मिली। इस हिंसा के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चेतावनी दी थी कि प्रदर्शनकारियों से बदला लिए जाएगा। अब यूपी पुलिस ने प्रदर्शनों की फुटेज देखने के बाद 100 से ज्यादा लोगों की पहचान की है। प्रदर्शनों के दौरान जितनी भी सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान हुआ, उसकी भरपाई के लिए उन्हें नोटिस भेजा गया है। पुलिस ने कहा है कि अगर प्रदर्शनकारी समय रहते भरपाई की धनराशि जमा नहीं कर पाए, तो उनकी अपनी संपत्ति जब्त कर ली जाएगी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पुलिस ने कानपुर, फिरोजाबाद और मऊ में इनामी पोस्टर लगाए हैं। गोरखपुर में संपत्ति जब्त करने के नोटिस लगाए हैं और बिजनौर में तीन वांछित लोगों के बारे में सूचना देने पर 25,000 रुपये के इनाम की घोषणा की है। फिरोजाबाद और गोरखपुर में पुलिस ने पहचाने गए प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें व्हाट्सऐप और फेसबुक पर डाल कर लोगों से उनके बारे में जानकारी मांगी है। प्रदर्शनकारियों से जो भरपाई की रकम मांगी गई है, वो 50 लाख रुपये से भी ज्यादा है। अब कर्नाटक सरकार ने कहा है कि वो उत्तर प्रदेश सरकार के नक्शे-कदम पर चलेगी। मगर सवाल वही है। क्या एक लोकतांत्रिक आंदोलन से निपटने के लिए अलोकतांत्रिक तरीका अपनाया जा रहा है?

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नई दिल्ली | SC on 12Th Board:  देश के ज्यादातर राज्यों में 10वीं और 12वीं की परीक्षाएं स्थगित की जा चुकी इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने स्टेट बोर्ड ओर CBSE को यह निर्देश भी दिया है कि आने वाले 10 दिनों में परिणामों की घोषणा कर दी जाए. लेकिन अभी भी आंध्र प्रदेश अपनी परीक्षाओं को आयोजित करने को लेकर अड़ा हुआ है. अब आंध्र प्रदेश की जीत के आगे सुप्रीम कोर्ट में सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर राज्य के एक भी बच्चे को कुछ भी हुआ तो उसकी सारी जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी. इसका खामियाजा भुगतने के लिए तैयार रहें. उसके साथ ही सर्वोच्च अदालत ने आंध्र प्रदेश की सरकार को किसी भी बच्चे के कोरोना संक्रमित होने और उसकी मौत पर एक करोड़ का मुआवजा तक चुकाने की बात कह डाली.

10 दिन के अंदर 31 जुलाई तक जारी करें परिणाम

SC on 12Th Board: सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश की सरकार को यह साफ कर दिया कि जब तक बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जाती तब तक राज्यों में 12वीं बोर्ड की परीक्षा के लिए अनुमति नहीं देगा. इधर 12वीं के परिणामों में हो रही देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीबीएसई की तर्ज पर राज्य सरकार को बोर्ड के परिणामों की घोषणा करनी चाहिए. सभी स्टेट बोर्ड के ढीले रवैए पर एतराज जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 10 दिनों के अंदर 31 जुलाई तक नतीजों की घोषणा कर दें.

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कोर्ट ने पूछा आंध्र सरकार से यह सवाल

Justice m khanwilkar और Dinesh Maheshwari की पीठ ने आंध्र प्रदेश की सरकार से यह जानने का प्रयास किया कि वह आखिर फिजिकल परीक्षा क्यों लेना चाहता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब देश में कोरोना का नया खतरनाक वैरीअंट चल रहा है तो फिर बच्चों की जिंदगी से रिस्क क्यों लेना है. कोर्ट में आंध्र प्रदेश की सरकार को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि यदि परीक्षा के आयोजन से एक भी बच्चे की मौत होती है तो वह राज्य सरकार को एक करोड़ के मुआवजे का आदेश देगी.

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