किसानों के मामले में फंसी या बेफिक्र सरकार?

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार जो सोच लेती है वह करती है। अब तक छह साल के कार्यकाल में एक ही मौका है, जब सरकार फैसला करके पीछे हटी है और वह मामला भूमि अधिग्रहण का है। केंद्र में सरकार बनने के तुरंत बाद यूपीए राज में पास किए गए भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने का प्रयास किया था, जिसका देश भर में विरोध हुआ और सरकार को पीछे हटना पड़ा। फिर एक बार सरकार किसानों के मामले में फंसी है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश सहित देश के कई हिस्सों में किसान आंदोलित हैं। पंजाब में किसानों ने तीन दिन तक रेल रोको आंदोलन का ऐलान किया है तो किसान संगठनों ने 25 सितंबर को भारत बंद का ऐलान किया है।

किसानों का इस तरह से आंदोलित होना असल में सरकार की राजकाज की शैली को बताता है। मिसाल के तौर पर अकाली दल की नेता और केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल के सरकार से इस्तीफे को लिया जा सकता है। अकाली दल ने कहा है कि सरकार जो तीन विधेयक ले आई है उन पर उनसे बात नहीं की गई। सोचें, अगर सरकार एग्रीकल्चर मार्केट प्रोड्यूस कमेटी यानी एपीएमसी के नियमों को बदलना चाहती है तो सबसे पहले उसे पंजाब की पार्टियों और किसानो से ही सलाह करनी चाहिए थी। इसका कारण यह है कि वहां के किसानों को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिलता है। सबसे पहले उन्हें भरोसे में लेना चाहिए था पर सुखबीर बादल का कहना है कि उनसे कोई बात नहीं की गई।

अभी तक हरियाणा में भाजपा के सहयोगी जननायक जनता पार्टी के नेता दुष्यंत चौटाला ने कहा नहीं है पर संभव है कि उनसे भी सलाह नहीं ली गई होगी, तभी वे भी दबाव में हैं। पंजाब के साथ साथ हरियाणा के किसान भी आंदोलन कर रहे हैं। अकेले पंजाब में 12 लाख से ज्यादा परिवार है, जो खेती-किसानी करते हैं। उनके अलावा 28 हजार रजिस्टर्ड आढ़तिए हैं। इन सबको लग रहा है कि सरकार का नया कानून उनकी पेट पर लात मारने वाला है। सबसे हैरानी की बात है कि प्रधानमंत्री अपनी सारी बातें देश के लोगों को समझा लेते हैं। वे कहते हैं तो लोग ताली-थाली बजाते हैं, बत्ती बुझाते हैं, दीये जलाते हैं आदि आदि पर वे भी कह रहे हैं कि देश भर में किसानों भ्रमित करने के लिए कई ताकतें सक्रिय हैं। तो क्या किसानों को गुमराह करने वाली ताकतें सरकार से मजबूत हैं? क्या उनका प्रचार तंत्र सरकार मजबूत है? कम से कम प्रचार में तो कोई इस सरकार को पीछे नहीं छोड़ सकता है!

बहरहाल, सरकार ने अपनी सहयोगी पार्टियों से सलाह नहीं किया, किसान संगठनों से बात नहीं की, किसान और कृषि उत्पादों के बाजार से जुड़े हितधारकों को भरोसे में नहीं लिया और कोरोना वायरस की वजह से लागू लॉकडाउन में आपदा को अवसर बनाते हुए अध्यादेश के जरिए कृषि से संबंधित तीन कानून बदल दिए। अब इन अध्यादेशों के संसद से पास करा कर कानून बनाया जा रहा है। तभी समझ में नहीं आने वाली बात यह है कि जब किसान इन कानूनों को लेकर इतने नाराज हैं तो सरकार ने किसके लिए आपदा में अवसर बनाया? इन बदलावों का ज्यादा फायदा किसको होगा? ऐसा लग रहा है कि किसान और छोटे आढ़तिए दोनों इससे प्रभावित होंगे और फायदा कॉरपोरेट फार्मिग में दिलचस्पी रखने वाली बड़ी कंपनियों और रिटेल के कारोबार में बड़े धमाके से उतर रही रिलायंस जैसी बड़ी कंपनियों को होगा। उनके लिए औने पौने दाम पर किसानों से उनकी फसल खरीदने का रास्ता साफ किया जा रहा है और दूसरे कानून के जरिए उनको मनमाने तरीके से जमाखोरी करने और कालाबाजारी करने की इजाजत दी जा रही है।

यह भारत सरकार के राजकाज की शैली है, जो उसने उन लोगों से ही सलाह-मशविरा नहीं किया, जिनका भला करने के लिए ये बिल लाए गए हैं। सरकार ने भारत की पारंपरिक खेती की व्यवस्था को समझा ही नहीं और किसी स्वार्थ समूह के समझाने के आधार पर पुरानी व्यवस्था को बदलने की पहल कर दी। सबसे पहले तो भारत सरकार को यह समझना चाहिए था कि भारत में 90 फीसदी से ज्यादा छोटे व सीमांत किसान है, जिनकी जोत डेढ़ से दो एकड़ की है। उनको कारपोरेट खेती की जरूरत नहीं है। इन किसानों को बैंक से आसानी से कर्ज भी नहीं मिलता है और न इनकी इतनी क्षमता होती है कि ये कहीं दूर ले जाकर अपनी फसल बेच सकें। इनके पास इतने पैसे नहीं होते हैं कि फसल को लंबे समय तक स्टोर कर सकें।

सो, छोटे आढ़तिए इनकी मदद करते हैं। वे इनको समय पर खाद और बीज के पैसे देते हैं और उसी समय फसल का सौदा हो जाता है। इस तरह से किसान फसल की चिंता से मुक्त रहता है। जहां सरकारी खरीद का सिस्टम है वहां किसान को सरकार की ओर से तय न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल जाता है और आढ़तियों को उनका कमीशन मिल जाता है। वे किसानों को जो पैसे दिए होते हैं वह वापस आ जाता है। अगर सरकार इस व्यवस्था को बदलना ही चाहती थी तो सबसे पहले किसानों को बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने का काम करना चाहिए था। सिंचाई की सुविधाओं में सुधार, सस्ती या मुफ्त बिजली, खाद-बीज और सिंचाई के लिए समय पर पैसे की उपलब्धता और स्टोरेज के लिए सुविधा बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए था। पर इस तरह से अचानक पुरानी व्यवस्था को बदल देने और किसानों को बाजार के हवाले कर देने से किसानों का भला नहीं होने वाला है। किसान इस बात को जानते हैं इसलिए वे इस तरह से विरोध कर रहे हैं। हरसिमरत कौर बादल का इस्तीफा देने जैसा बड़ा कदम उठाना इसी का संकेत है कि जमीन पर ज्यादा खदबदाहट है।

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