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कनाडा, हिंदी और मंगा बासी

कुछ समय पहले मुझे हिंदी में लिखी ऐसी पुस्तक पढ़ने को मिली जो कि अपने आप में अनोखी थी। पुस्तक का शीर्षक था ”माँ कहती थी” आमतौर पर हर बेटे का अपनी मां से लगाव होता है पर कोई मां पर भावनात्मक पुस्तक ही लिख बैठे ऐसे बहुत कम देखने को मिलता है।  पेशे से व्यापारी मंगा बासी ने वैसे तो करीब एक दर्जन पुस्तकें लिखी हैं यह पुस्तक कनाडा में भारतीय लोगों के बीच बहुत चर्चित हो चुकी है।

कनाडा एक ऐसा देश है जहां आप को हिंदी के अखबार या पत्रिकाएं देखने को नहीं मिलेगी वहां हम हिंदीभाषियों के लिए अपनी मातृभाषा तो रोटी दाल की तरह लगती है। वहा अंग्रेजी भाषा को पिज्जा की तरह खाना पड़ता है। पर कुछ समय पहले मुझे हिंदी में लिखी ऐसी पुस्तक पढ़ने को मिली जो कि अपने आप में अनोखी थी। पुस्तक का शीर्षक था ”माँ कहती थी” आमतौर पर हर बेटे का अपनी मां से लगाव होता है पर कोई मां पर भावनात्मक पुस्तक ही लिख बैठे ऐसे बहुत कम देखने को मिलता है।

पेशे से व्यापारी मंगा बासी ने वैसे तो करीब एक दर्जन पुस्तकें लिखी हैं मगर मां पर लिखी हुई उनकी यह पुस्तक कनाडा में भारतीय लोगों के बीच बहुत चर्चित हो चुकी है। उन्होंने इससे पहले बर्फ दा मरूस्थल, विच प्रदेशा दे, मैं अते कविता, मैं और कविता, नामक काव्य संग्रह लिखे हैं। पंजाबी अंग्रेजी और हिंदी पर पूरा अधिकार रखने वाले साहित्यकार मंगा बासी ने ‘माँ कहती थी’ पुस्तक मूल रूप से पंजाबी में लिखी थी। उनके इस काव्य संग्रह को पुस्तक का रूप देने में गुरुनानक देव यूनीवर्सटी के पूर्व उप कुलपति जरनैल सिंह ने काफी मदद की जबकि पुस्तक का पंजाबी से हिंदी में अनुवाद दिल्ली के माता सुंदरी कालेज की प्रोफेसर डा. गुरजीत कौर ने किया। मंगा बासी से जब उनके इस काव्य संग्रह पर लंबी चौड़ी वार्ता हुई तो उन्होंने बताया कि कनाडा आने के पहले उन्हें उनकी मां हर रात को सोते समय तरह तरह के उपदेश देती थी।

उन्होंने उनकी शिक्षा को जीवन में लागू किया यही वजह है कि आज जो कुछ भी है उसके लिए अपनी मां की शिक्षा को ही जिम्मेदार मानते हैं। वे मां के बारे में बात करते करते भावुक हो जाते हैं और बुजुर्ग होने के बावजूद एक बच्चे की तरह मां को याद करते हुए कहते हैं कि मां हर बच्चे के लिए उंचाई से बहता हुआ ऐसा झरना होता है जो हर बच्चे के दुख, सुख और मुश्किल में बहाव को मिलाकर जिंदगी को सौंदर्य और कामयाबी की दिशा की ओर ले जाता है। चाहे मां की रूह से फूटे झरने के बहाव को ढलान की बजाय ऊंचाई की तरफ ही ना बहना पड़े पर यह निरंतर निस्वार्थ बच्चे के उज्जवल भविष्य की दिशा में बहता रहता है।

हर माँ की दिली तमन्ना होती है कि उनका बच्चा, बीते समय को मन में बसा कर, वर्तमान को जीता हुआ भविष्य के लिए नई राहों के निशान देही करता, सच्चे और स्वच्छ जीवन का धारणी बने और अपने से ऊपर उठ समाज के लिए कुछ कर दिखाए। वे कहते हैं कि मैंने इस काव्य रचना द्वारा मां की अंतरिम भावना को काव्यिक रंग में प्रगट करने का प्रयास किया है। ये पुस्तक तैयार करने में मदद करने वाले सरदार जरनैल सिंह सेत्वाजी, जरनैल सिंह व गुरूनानक देव यूनीवर्सिटी के पूर्व उपकुलपति डा. एस पी सिंह के भी बहुत आभारी है जिन्होंने अपने रचनात्मक सुझावों से उन्हें नवाजा।

वे कहते हैं कि जिस दिन मैंने अपनी मां के आलिंगन से कनाडा के लिए उड़ान भरी थी, उनके कहे शब्द परछाई की तरह मेरे साथ चलते रहे, चाहे मेरी मां बहुत समय से कनाडा में मेरे पास आकर रह रही है पर मैं जब भी उनके साथ बैठता हूं व बात भी करता हूं या संवाद रचता हूं तो हर समय वह मुझे बचपन की ओर खींच ले जाते हैं और मैं बचपन को जीता हुआ गांव, बीड़ बासियां के जूह की परिक्रमा महसूस करता हुआ ढलती उम्र में भी, एक छोटे से बालक के जीवन में परिवर्तित हो जाता हूं। मैं खुश किस्मत हूं कि अपने मां बाप का प्यार मैंने भरपूर रूप से अनुभव किया। उनके हर सपने और हर चाहत की पूर्ति के लिए निरंतर प्रयत्न किया और कर रहा हूं। मेरी इस भावना से मेरे मां-बाप बहुत संतुष्ट है।

बेशक मेरी मां से बिछुड़ कनाडा प्रवास करने के समय के पलों में ही मैं लंबी काव्य रचना ‘‘मां कहती थी” को रचने को जब प्रेरित हुआ। यह काव्य रचना हर मां की रूह की वेदना है। इसमें मैंने हर मां के मन की बात और उसके सपनो की कथा कही है। वे बताते हैं कि गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी के शब्दों में अगर एक जिंदगी किसी दूसरी में जी जा सकती है तो वह सिर्फ मां ही है। मां-प्रेम जीवन को एक ऐसी देन है जितना समय है, है पर जब खो गई तो फिर ढूंढने से भी नहीं मिलती है। या कहा जा सकता है कि ‘‘नहीं लमणे लाल गुआये’। हम सभी मां के ओठो से निकले शब्दों को सुनकर बोली का उच्चारण सीखते है।

मां की कर्म कमाई पर चलते जिंदगी की इमारत की नींव रखते हैं। बाद में चाहे हम कुछ भी बन गए हो या बन जाए पर मां हर बच्चे की पहली अध्यापक होती है जिनकी शिक्षाओं को कबूल कर जिंदगी का पौधा, फल फूल और छाया देने योग्य बन जिंदगी के बागो को हरा भरा रखने के लिए अनुकूल वातावरण का सृजन कर लेता है।

अपनी पुस्तक के 17 अध्यायों में उन्होंने मां की आंतरिक भावना को कविता में ढालने की कोशिश करते हुए लिखा हैं ‘‘मां कहती थी, लौट आना बेटा, सफर करके, कमाई करके, बीते मौसमों के रंग में रंगी, विरह की लोई, तन में लपेटे वापस आ जाना, तार तार घिस जाने पर। गर्मी, सर्दी पतझर ऋतुएं, खिला सा चैत्र, महक फूलों की, लड़ना झगड़ना, रूठना मनाना फिर मिल बैठना। भूल न जाना खो न देना मां के सपने इच्छा, बाप की, बहन की राखी, मोह के चरखे हसरते काती। सुख लिए माला संभाल के रखना, दुख तकलीफें, जीत हार का लेता जो त्वा मन के कोने बाप की कड़ी मशक्कत की नारे, चप्पे मोठो का ऋण हर माला की तरह हरदम सीना लगाना पल भर मन से दूर न करना मां कहती की बेटा लौट आना। रहे न मेरा स्वप्न अधूरा, जो बोली थी, कही थी तुझ से, जब घर से दूर गया था लौट आना बेटा।

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