पूंजी के कब्जे में लोकतंत्र - Naya India
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पूंजी के कब्जे में लोकतंत्र

राजनीति-शास्त्री और समाजशास्त्री अमेरिकी लोकतंत्र में पैदा हुए संकट की वजह यही बताते रहे हैं। उनका कहना है कि देश के लोकतंत्र पर वॉल स्ट्रीट यानी अमेरिकी शेयर बाजार यानी वहां के कॉरपोरेट सेक्टर का शिकंजा इतना कस चुका है कि लोकतंत्र की मूल भावना दमित हो गई है। इसके विरोध में लोग उग्र दक्षिणपंथ या वामपंथ की धुरियों पर जा रहे हैं। हालांकि ये बात नई नहीं है, लेकिन इस समस्या का समाधान निकालने की कोशिश होती नहीं दिखती। इस कारण लोगों में हताशा का फैलना लाजिमी है। अब सामने आए ताजा आंकड़ों का निष्कर्ष है कि 2020 के चुनाव में पूंजी का बड़ा हस्तक्षेप कायम रहा। एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक बीमा कंपनियां, वित्तीय सेवा कंपनियां और रियल एस्टेट सेक्टर ने पिछले चुनाव में खूब चंदा दिया। सेंटर फॉर रेस्पॉन्सिव पॉलिटिक्स नाम की गैर सरकारी संस्था के आंकड़ों के आधार रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है कि किस पार्टी और किस नेता को किस कंपनी से कितना चंदा मिला।

इसके मुताबिक वॉल स्ट्रीट ने उन 147 रिपब्लिकन नेताओं को भी चंदा दिया था, जिन्होंने सीनेट या हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव का चुनाव जीतने के बाद राष्ट्रपति जो बाइडेन के निर्वाचन को वैध मानने से इनकार कर दिया। कुल अनुमान यह है कि 2020 के संघीय चुनाव पर कम से कम 14.4 अरब डॉलर का साझा खर्च आया। इसमें 1.05 अरब का काला धन भी है, जिसका स्रोत अज्ञात है। इस रिपोर्ट के मुताबिक 2020 का संघीय चुनाव पूरे अमेरिकी इतिहास का सबसे महंगा चुनाव रहा। इस दौरान ऐसे कथित ‘स्वतंत्र’ संगठनों को दिए गए चंदे में दो गुना बढ़ोतरी हुई, जिन्होंने उस रकम का इस्तेमाल चुनाव प्रचार के लिए किया। यानी यह परोक्ष रूप से दिया गया चुनावी चंदा था। तो जानकारों का ये कहना उचित ही है कि वॉल स्ट्रीट के पास जैसा असीमित धन है, चुनाव प्रचार के लिए चंदे से संबंधित सिस्टम लगभग अप्रभावी है, और चुनावी चंदा देने पर कोई व्यावहारिक सीमा नहीं है। तो वित्तीय सेवा कंपनियां अमेरिकी राजनीति में नीतिगत बहसों को अपने मुताबिक ढालने हाथ खोल कर खर्च करती हैँ। जब ये ऐसा करती हैं, तो बाद में नीतियां भी उनके मनमाफिक बनती हैं। इसलिए इसमें कोई हैरत नहीं कि महामारी के दौर में जब आम लोग गहरे मुसीबत में थे, तब अरबपतियों की संपत्ति बढ़ती चली गई। यही अमेरिकी लोकतंत्र की हकीकत है।

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