टकराव की भावना क्यों?

क्या केंद्र सरकार कोरोना संकट के बहाने केंद्र- राज्य अधिकारों के दायरे को फिर से परिभाषित करने की कोशिश में है? ये सवाल उसके कुछ हालिया कदमों से उठा है। एक तरफ उस पर आरोप है कि उसने राज्यों की कोई वित्तीय मदद नहीं की है- बल्कि खुद उसने उनके जीएसटी का कई महीनों का हिस्सा दबा रखा है, उलटे वह राज्यों को कामकाजी स्वायत्तता से भी वंचित कर रही है। सबसे ताजा विवाद पश्चिम बंगाल में उठा, जहां बिना राज्य सरकार को सूचना दिए लॉकडाउन के जायजे के लिए केंद्रीय टीम भेज दी गई। इस पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पत्र लिखकर विरोध जताया। तब राज्यपाल ने पत्र लिखकर मुख्यमंत्री को सलाह दे दी कि वे केंद्र से सहयोग करें। बेशक आपदा प्रबंधन कानून के तहत केंद्र ने कुछ अतिरिक्त अधिकार हासिल कर लिए हैं। फिर भी उसे कोरोना जैसे अभूतपूर्व संकट के समय सबके सहयोग से चलाना चाहिए। यह सोच उचित नहीं है कि बुद्धि और प्रबंधन कौशल सिर्फ एक जगह सीमित है। इसके पहले केरल से विवाद उठा।

20 अप्रैल से देश भर में तालाबंदी में कुछ ढील दी गई। लेकिन कई तरह की रियायतें को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों में सहमति नहीं बन पाई है। मसलन, केरल सरकार ने कुछ जगहों पर होटलों, बाल काटने की दुकानों, किताब की दुकानों जैसे संस्थानों को भी खोलने की इजाजत दे दी थी, जिसे केंद्र सरकार ने गलत और तालाबंदी के नियमों का उल्लंघन बताया। केंद्र के आपत्ति व्यक्त करने पर केरल ने बाद में इस तरह के संस्थान बंद कर दिए। उसके बाद खबर आई कि केंद्र सरकार ने छह ऐसी टीमें बनाई हैं, जो राज्यों में जा कर स्थिति का आकलन करेंगी और जरूरी निर्देश देंगी। केंद्र का कहना है कि राज्यों को तालाबंदी केंद्र से ज्यादा सख्ती से लागू करने की इजाजत तो है, लेकिन केंद्र ने जिन रियायतों की घोषणा की है उससे ज्यादा छूट देने की इजाजत नहीं है। इसलिए जिन राज्यों से इस तरह के उल्लंघन की खबर आई है, वहां ये केंद्रीय टीमें जाएंगी, स्थिति का जायजा लेंगी, राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन को निर्देश देंगी और फिर केंद्र को रिपोर्ट देंगी। यहां यह अवश्य उल्लेखनीय है कि भारत में अब तक कोरोना के खिलाफ जंग में अगर कोई एक संभावित सफलता की कहानी है, तो वह केरल है। सवाल है कि क्या वहां की सरकार को स्थानीय स्थितियों के अनुरूप निर्णय लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए?

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