लॉकडाउन या पुलिस स्टेट!

भारत में आपातकाल नहीं लगा है। न आंतरिक, न बाहरी, न वित्तीय और न मेडिकल आपातकाल है। फिर भी देश एक पुलिस स्टेट में बदल गया दिख रहा है। सड़कों पर सिर्फ पुलिस दिख रही है। लोगों में कोरोना वायरस से ज्यादा पुलिस का खौफ हो गया है। इस बीच तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने यह कह कर खौफ और बढ़ा दिया है कि अगर किसी ने लॉकडाउन का उल्लंघन किया तो पुलिस मौके पर गोली मार सकती है। सोचें, एक मुख्यमंत्री का यह कहना क्या मायने रखता है और ऐसे हालात में लोकतंत्र, नागरिक स्वतंत्रता, बुनियादी अधिकार जैसी चीजों का क्या मतलब रह जाता है?

तेलंगाना के मुख्यमंत्री अकेले नहीं हैं, जिन्होंने कोरोना वायरस से लोगों की ‘जान बचाने’ के नाम पर लोगों की जान लेने का संकल्प जाहिर किया है। बेंगलुरू में कई दिन से पुलिस लोगों की पिटाई कर रही है। किसी भी काम से बाहर निकले लोगों पर लाठियां बरसाई जा रही हैं। महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री अजित पवार ने कहा है कि पुलिस को खुली छूट दी गई है कि वह  लोगों को काबू में करे। इसी से मिलती जुलती बात तमिलनाडु के स्वास्थ्य मंत्री ने कही है। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई के लिए पुलिस को छूट दी गई है। केरल सरकार ने भी जबरदस्ती लॉकडाउन लागू करने के सारे बंदोबस्त किए हैं।

राज्यों में पुलिस की इस जबरदस्ती की शुरुआत सोमवार को प्रधानमंत्री के एक ट्विट से हुई। असल में रविवार के जनता कर्फ्यू के अगले दिन लॉकडाउन होने के बावजूद लोग बड़ी संख्या में बाहर निकल गए। इस पर नाराजगी जताते हुए प्रधानमंत्री ने ट्विट किया और राज्यों से कहा कि वे लॉकडाउन को लागू कराने के लिए सख्ती करें। इसके बाद जैसे राज्यों को और पुलिस को भी लोगों पर बर्बरता की हद तक सख्ती करने का लाइसेंस मिल गया।

दिल्ली में इलेक्ट्रोनिक मीडिया के एक पत्रकार नवीन कुमार का किस्सा इसकी एक मिसाल है। उन्होंने एक लंबी चिट्ठी लिख कर अपनी तकलीफ बयां की है। उनके पत्रकार होने के बावजूद पुलिस ने उनके साथ जो ज्यादती की उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आम लोगों के साथ कैसा बरताव किया जा रहा होगा।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि कोरोना वायरस के संक्रमण की शृंखला तोड़ने के लिए लोगों का घरों में रहना जरूरी है। सोशल डिस्टेंसिंग को यानी लोगों के आपस में मेल-मुलाकात बंद करने को इससे बचाव का एक बड़ा तरीका माना जा रहा है। लोग खुद ही डरे हुए हैं। कई गुना ज्यादा कीमत पर मास्क खरीद कर उसे लगा रहे हैं, कई गुना ज्यादा दाम पर सैनिटाइजर खरीद कर उसका भी इस्तेमाल कर रहे हैं। अपना काम धंधा चौपट होने की जोखिम लेकर घरों में बंद हुए हैं। लाखों लोगों की नौकरियां खतरे में है। जरूरी सामान की किल्लत और अपने व परिवार के किसी सदस्य के बीमार हो जाने की चिंता अलग से है। ऊपर से पुलिस की लाठी और ज्यादतियां हैं!

पुलिस ने जिस तरह से लॉकडाउन को सफल बनाने का जिम्मा अपने हाथ में लिया है उससे फायदा होने की बजाय कई किस्म के नुकसान होने लगे हैं। पुलिस ने अपनी मनमानी में जगह-जगह पर जरूरी सामान से भरी गाड़ियों को रोका हुआ है। दुकानदारों को परेशान किया है। छोटी छोटी रेहड़ी-पटरी वालों पर ज्यादती है। मारपीट करके उनका सामान नष्ट किया है। गुरुवार की रिपोर्ट है कि लॉकडाउन के पहले दिन पुलिस की ज्यादती से 15 हजार लीटर दूध और दस हजार किलो सब्जियां नष्ट हुई हैं। वास्तविक मात्रा इससे ज्यादा हो सकती है, जिनकी रिपोर्ट नहीं हुई है।

असल में यह सरकारों की विफलता है, जिसके लिए आम लोगों को जिम्मेदार बताया जा रहा है। यह सरकारों की विफलता है, जिसकी भरपाई के लिए लॉकडाउन के बहाने देश को पुलिस स्टेट बनाया जा रहा है। जिन लोगों के हाथ में देश के लोगों ने अपनी किस्मत सौंपी है, जिनको अपना मसीहा चुना है, असल में वे इस खतरे का अंदाजा नहीं लगा सके। वे राजनीति करने में बिजी रहे और इस बीच कोराना का वायरस देश के दरवाजे पर पहुंच गया।

अगर पहले इस खतरे को भांप लिया गया होता तो पहले ही इमरजेंसी उपाय हो गए होते। समय रहते इस वायरस से संक्रमित देशों से आने वाली फ्लाइटों पर रोक लग गई होती, संक्रमित देशों से आने वालों की स्क्रीनिंग हुई होती, टेस्टिंग किट, मास्क, सैनिटाइजर आदि पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराए गए होते। आपात स्थिति के लिए अस्पताल तैयार होते, अस्थायी अस्पताल बनाए गए होते, निजी अस्पतालों को टेस्टिंग किट खरीदने और जांच की छूट दी गई होती। पर ऐसा कुछ नहीं किया गया।

हमारे पास वेंटिलेटर नहीं हैं तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? टेस्टिंग किट की कमी है तो इसके लिए कौन जवाबदेह होगा? मास्क और सैनिटाइजर की कालाबाजारी हुई है तो इसकी जिम्मेदारी किस पर आएगी? लोग संक्रमित देशों से आए और उन्हें हवाईल अड्डों पर न रोका गया और न उनकी चेकिंग हुई तो इसके लिए भी क्या देश की 130 करोड़ जनता जिम्मेदार है या प्राधिकारियों का निकम्मापन है? एक कनिका कपूर का मामला सामने आया तो लोगों ने जाना पर उनके जैसे न जाने कितने लोग थे, जो हवाईअड्डों से बिना किसी जांच के निकल गए!

सरकारों की अदूरदर्शिता, सरकारी एजेंसियों के निकम्मेपन और स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में सरकारों की विफलता का ठीकरा देश की जनता पर फोड़ा जा रहा है। उसके ऊपर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वह अगंभीर है, खतरे को नहीं समझ रही है और अपना व दूसरे नागरिकों का जीवन जोखिम में डाल रहे है। असलियत यह है कि देश की सरकारों ने नागरिकों का जीवन जोखिम में डाला है और अब इस नाम पर हाथ जोड़ कर लॉकडाउन की अपील की जा रही है कि दुनिया के बड़े-बड़े देश इस वायरस से पीड़ित हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares