अब सहमति बनाएगी सरकार?

आखिर विपक्षी नेताओं की पूछ हुई। बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में विपक्षी दलों के नेताओं से कोरोना संकट पर बातचीत की। यानी उनकी राय ली। गौरतलब है कि विपक्षी नेताओं की बारी खिलाड़ियों, फिल्म कलाकारों आदि जैसे सार्वजनिक जीवन के विभिन्न समूहों के बाद आई। इसके पहले प्रधानमंत्री 12 विपक्षी नेताओं से फोन पर बात कर चुके थे। मगर उनकी बारी भी बहुत बाद में आई थी। बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि कभी ना होने से देर अच्छी होती है। लेकिन सवाल है कि विपक्ष की सलाहों पर सरकार कितना ध्यान देगी। यहां यह उल्लेखनीय है कि इस वक्त देश के ज्यादातर राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें हैं। अगर कोरोना से लड़ना है तो उनके सहयोग के बिना यह संभव नहीं है। ऐसे में बेहतर होता कि आरंभ से ही राष्ट्रीय आम सहमति बनाई जाती। मगर ऐसा करना वर्तमान केंद्र सरकार की फितरत में नहीं है। इसलिए ये उम्मीद कम है कि विपक्षी नेताओं से बातचीत महज रस्म अदायगी से ज्यादा कुछ साबित होगी। या सरकार विपक्ष के परामर्श पर गौर करेगी। वो ऐसा करना चाहे, तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कुछ माकूल सुझाव दिए हैं। सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख कर ये सुझाव दिए हैं। मगर वो शायद सरकार के गले नहीं उतरेगी। मसलन, चिट्ठी में मांग की गई है कि सरकार टेलीविजन, प्रिंट और ऑनलाइन मीडिया को दिए जाने वाले सभी विज्ञापनों पर रोक लगाए। इन्हें दो साल के लिए बंद किया जाए, जिससे 1,250 करोड़ रुपये प्रति साल की जो बचत होगी। उसका इस्तेमाल कोरोना से लड़ने में किया जा सकता है। इसी तरह सरकार ने केंद्रीय विस्टा के निर्माण के लिए जो 20 हजार करोड़ आवंटित किए गए हैं, उन्हें रोकने की मांग की गई है। सोनिया ने कहा है कि मंत्रियों के सभी विदेश दौरों पर रोक लगा देनी चाहिए। और इसके आगे जो बात आई है, वो सरकार के लिए संवेदनशील हो सकती है। ये मामला पीएम-केयर्स फंड का है। सोनिया गांधी ने क हा है कि प्रधानमंत्री केअर्स में जितनी भी राशि मदद के रूप में आई है, उसे प्रधानमंत्री राहत कोष में ट्रांसफर करना चाहिए। इससे पारदर्शिता आएगी। अभी प्रधानमंत्री राहत कोष में मौजूद 3800 करोड़ की राशि पड़ी है। ऐसे में दोनों फंड की राशि को मिलाकर इस्तेमाल किया जा सकता है। मगर ऐसा करना होता, तो सरकार आखिर एक नया फंड बनाती ही क्यों?

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