cds general bipin rawat सभ्यताओं के संघर्ष की जनरल रावत की समझ
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सभ्यताओं के संघर्ष की जनरल रावत की समझ

cds general bipin rawat

देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत ने गजब बयान दिया है। उन्होंने सैमुअल पी हटिंगटन की सभ्यताओं के संघर्ष की थीसिस की अपनी व्याख्या करते हुए कहा है कि चीन दुनिया भर के इस्लामिक देशों के साथ मिल कर पश्चिमी सभ्यता के खिलाफ संघर्ष की तैयारी कर रहा है। चीन की सभ्यता को उन्होंने सिनिक सिविलाइजेशन कह कर संबोधित किया। सिनिक सिविलाइजेशन को ही कंफ्यूशियन सिविलाइजेशन भी कहा जाता है और इसका दायरा बहुत बड़ा है। इसमें चीन की नस्ल, परंपरा और संस्कृति से मिलते-जुलते दक्षिण-पूर्व एशिया के सारे देश आ जाते हैं। चीन के अलावा ताइवान, कोरिया, वियतनाम, सिंगापुर आदि भी इसके दायरे में आते हैं। तभी सवाल है कि क्या सचमुच ये देश दुनिया के इस्लामिक देशों के साथ समन्वय बना रहे हैं या चीन के ऐसे किसी प्रयास का हिस्सा हैं और पश्चिम की ईसाई सभ्यता के साथ टकराव के प्रयासों में शामिल हैं? cds general bipin rawat

यह बहुत बेबुनियाद बात है और इस क्षेत्र के भू-राजनीतिक नजरिए से देखें तो बहुत खतरनाक व विध्वंसक बात भी है। तभी विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जनरल रावत की बात का तत्काल खंडन किया। उन्होंने इससे असहमति जताते हुए कहा कि भारत सभ्यताओं के संघर्ष के सिद्धांत में विश्वास नहीं करता है। उन्होंने दुशांबे में चीन के विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात के बाद एक बयान जारी किया, जिसमें कहा कि संपूर्ण एशिया की एकजुटता भारत और चीन के उदाहरण से परिभाषित होगी। यह जरूरी था कि भारत सरकार आधिकारिक तौर पर सीडीएस जनरल रावत के बयान को खारिज करे। क्योंकि जनरल रावत ने जो कहा था वे खुद ही उसके असर को समझ नहीं पा रहे हैं। अगर पश्चिमी सभ्यता के खिलाफ सिनिक यानी चाइनीज सभ्यता इस्लाम के साथ हाथ मिलाती है तो पश्चिमी सभ्यता का जो होगा वह बाद में होगा, पहले तो भारत को इसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ेगा! क्या जनरल रावत ने इस बारे में सोचा? यह भी सवाल है कि क्या उन्होंने यह बात कहने से पहले दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों या सिनिक सभ्यता वाले देशों के आपसी अंतर्विरोध के बारे में विचार किया?

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दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में आपसी अंतर्विरोध बहुत गहरे हैं। भौगोलिक सीमा के विवाद से लेकर एक राजनीतिक विचार के तौर पर लोकतंत्र को स्वीकार करने और नागरिकों की आजादी, समानता आदि मसलों पर भी दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में काफी गहरे मतभेद हैं। सभ्यताओं के संघर्ष का सिद्धांत देने वाले सैमुअल पी हटिंगटन ने यह जरूर कहा था कि देर सबेर इस क्षेत्र के देश चीन के वर्चस्व को स्वीकार करेंगे। लेकिन वह समय अभी नहीं आया है। हटिंगटन ने खुद ही माना है कि जापान और दक्षिण कोरिया को छोड़ कर दक्षिण-पूर्व एशिया के बाकी देशों की अर्थव्यवस्था चीन से जुड़ी है। थाईलैंड से लेकर मलेशिया और इंडोनेशिया से लेकर सिंगापुर तक दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था एक तरह से चीन की ही अर्थव्यवस्था का विस्तार है। इस आधार पर हटिंगटन ने भविष्यवाणी की थी कि पूरा एशिया कुछ समय के बाद यूरोप की तरह दिखने लगेगा।

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लेकिन हटिंगटन की भविष्यवाणी के तीन दशक बाद कम से कम अभी इसकी संभावना नहीं दिख रही है। उलटे ताइवान के साथ चीन का संघर्ष बढ़ा है। हांगकांग में लोकतंत्र और आजादी की जंग चल रही है, जिसे दबाने के लिए चीन बंदूक की नली से निकलने वाली ताकत के पुराने सिद्धांत को आजमा रहा है। दक्षिण कोरिया और जापान के साथ उसकी दूरी कम होने की बजाय बढ़ गई है। इसलिए पहले तो सिनिक सभ्यता वाले देशों के शासन के मॉडल में इतना फर्क है और इतने ज्यादा देश पश्चिम की सभ्यता से प्रभावित हैं कि उनका निकट भविष्य में चीन के अधीन होना संभव नहीं है। यह तभी संभव है, जब चीन बदल जाए। चीन पश्चिम की सभ्यता को अपना ले। फरीद जकारिया ने अपनी किताब ‘द पोस्ट अमेरिकन वर्ल्ड’ में एक युवा चीनी पत्रकार के हवाले से लिखा है कि ‘पार्टी के सबसे समझदार लोग अब आर्थिक सुधारों के बारे में नहीं, बल्कि राजनीतिक सुधारों के बारे में पढ़ रहे हैं’। इसलिए यह संभावना है कि आने वाले समय में चीन धीरे धीरे सिंगापुर की तरह हो जाए, जहां एक पार्टी का राज होगा, लेकिन अपेक्षाकृत ज्यादा खुलापन होगा। वैसे भी कार्ल मार्क्स ने कहा था कि ‘बाजारवादी अर्थव्यवस्था अंततः लोकतंत्र की ओर जाती है’। अगर ऐसा होता है तब तो चीन दक्षिण-पूर्व एशिया या संपूर्ण एशिया के देशों की धुरी बन सकता है, लेकिन उससे पहले संभव नहीं है कि सारे देश उसका वर्चस्व स्वीकार करें।

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जनरल रावत ने कहा कि सिनिक सभ्यता और इस्लामिक सभ्यताएं करीब आ रही हैं। चीन हाल के दिनों में ईरान के नजदीक गया है और उसने तुर्की से भी संपर्क किया है। वह अफगानिस्तान में अपना आधार मजबूत करेगा। इस आधार पर जनरल रावत का कहना है कि यह पश्चिम के खिलाफ संघर्ष की तैयारी है। सवाल है कि क्या इस्लामिक सभ्यता अपने को सिनिक सभ्यता की छत्रछाया में देखना पसंद करेगी? क्या वह कंफ्यूशियन सभ्यता के वर्चस्व को स्वीकार करने को तैयार है? क्योंकि यह तो तय है कि चीन उनका वर्चस्व स्वीकार नहीं करेगा। चीन को सारी दुनिया पर राज करना है और इस बात को बहुत पहले सिंगापुर के पहले प्रधानमंत्री ली कुआन यू ने समझ लिया था। उन्होंने कहा था कि ‘यह संभव नहीं है कि चीन को सिर्फ एक और बड़ी ताकत माना जाए, वह इंसानी सभ्यता के इतिहास की सबसे बड़ी ताकत है’। दूसरी ओर इस्लामी सभ्यता है, जिसकी जड़ें सिनिक सभ्यता के मुकाबले पश्चिम की ईसाई सभ्यता से ज्यादा जुड़ी हैं। इसके अलावा उनमें ऐसी कट्टरपंथी ताकतें बहुत हैं, जिनकी मंशा पूरी दुनिया को दारूल इस्लाम में बदलने की है। सो, फिर क्या अंत में उनको सिनिक सभ्यता से नहीं लड़ना पड़ेगा?

अगर यह माना जाए कि चीन और इस्लामी दुनिया के देश एक-दूसरे का रणनीतिक इस्तेमाल करने की योजना बना रहे हैं तब भी उसका अंत नतीजा तो दोनों के भीषण संघर्ष में ही होगा! लेकिन अगर ऐसा होता है तो भारत का क्या होगा? क्या इस बारे में जनरल रावत ने सोचा? उन्होंने एक तरफ यह कहा कि चीन इस्लामी दुनिया के साथ समन्वय बना रहा है और पश्चिमी सभ्यता से उसको लड़ना है। दूसरी ओर यह कहा कि उसके साथ हमारी सीमा मिलती है और चीन आक्रामक है। इसलिए भारत को तैयार रहना चाहिए। सोचें, यह कितनी बचकानी बात है! अगर सचमुच ऐसा होता है तो भारत के पास तैयारी करने को कुछ नहीं बचेगा। क्या उन्होंने सोचा कि जब सभ्यताओं के संघर्ष का समय आएगा, धर्म, संस्कृति, पंरपरा व पहचान के नाम पर एकजुटता बनेगी, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश आदि देश एक होकर रणनीतिक रूप से चीन के साथ जाएंगे तब भारत के मुसलमान क्या करेंगे? तब भारत के पड़ोसी क्या करेंगे और भारत किस स्थिति में होगा? यह तो पूरी दुनिया की तबाही की परिकल्पना जैसा है!

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ऐसा लगता है कि जनरल रावत ने कहने से पहले अपने बयान के किसी पहलू के बारे में नहीं सोचा। न उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के अंतर्विरोधों के बारे में सोचा, न कट्टरपंथी इस्लामिक ताकतों के जिहादी संकल्पों के बारे में विचार किया, न चीन के अंदर भविष्य में होने वाले बदलावों पर सोचा और न पश्चिमी देशों की तैयारियों के बारे में सोचा। सो, क्या यह माना जाए कि उनको चीन के खिलाफ कोई सख्त बात कहनी थी और इस्लामी देशों के साथ उसका गठजोड़ बता कर भारत के लिए उसका खतरा दिखाना था इसलिए उन्होंने यह बात कह दी? या उनके कहने का कोई दूसरा संदर्भ है? देश के हुक्मरान अपने राजनीतिक फायदे के लिए बार बार देश के अंदर पानीपत की लड़ाई होने की बात कह रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि तीनों सशस्त्र सेनाओं के प्रमुख ने उस बात को ध्यान में रखते हुए एक राजनीतिक बयान दिया है?

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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