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समाजवादी राज्य से मुक्ति का जश्न!

पिछले कुछ समय से आंखी दास बहुत चर्चा में हैं। वे फेसबुक की पब्लिक पॉलिसी डायरेक्टर हैं। उन पर इल्जाम है कि उन्होंने सोशल मीडिया के इस सबसे बड़े प्लेटफॉर्म का मनमाना इस्तेमाल भाजपा को करने दिया। अमेरिकी मीडिया समूह ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने इस बारे में दो खुलासे किए हैं। उसके दूसरे खुलासे में एक बात खासतौर से ध्यान खींचने वाली है। उसने बताया है कि जब 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा जीती तो आंखी दास ने कंपनी के एक इंटरनल कम्युनिकेशन में कहा था- जमीनी स्तर पर 30 साल की कड़ी मेहनत के बाद आखिरकार समाजवादी राज्य से मुक्ति मिल गई। यानी पूर्ण बहुमत से भाजपा का आना ही राज्य के कामकाज में समाजवादी सिद्धांत के खत्म होने का ऐलान था! आंखी दास ने कैसी पीर-पैगंबर वाली बात कही थी! छह साल बाद आज चौतरफा यह दिख रहा है कि बचा-खुचा समाजवादी राज्य खत्म हो रहा है और क्रोनी पूंजीवाद फल-फूल रहा है।

असल में सार्वजनिक विमर्श में दक्षिणपंथी विचार के लोगों को हमेशा इस बात की शिकायत रही है कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द इंदिरा गांधी ने जोड़ा था। ये दोनों शब्द संविधान की मूल प्रस्तावना में नहीं थे। आपातकाल के समय इंदिरा गांधी की सरकार ने संविधान का 42वां संशोधन किया, जिसमें कई चीजों को बदलने के साथ ये दो शब्द प्रस्तावना में जोड़े गए। हालांकि इसकी शिकायत करने वाले यह भूल जाते हैं कि जनता पार्टी की सरकार ने इंदिरा गांधी सरकार द्वारा किए गए लगभग सारे बदलावों को रद्द कर दिया था। उसके लिए 44वां संशोधन हुआ था। परंतु 44वें संशोधन के जरिए ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द को प्रस्तावना से नहीं हटाया गया। इसका अर्थ है कि गैर-कांग्रेस विचारधारा वाली पहली सरकार भी इस बात से सहमत थी कि ये दोनों शब्द संविधान की प्रस्तावना में रहने चाहिए। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी दोनों उस सरकार का हिस्सा थे।

उस बदलाव के बाद भी ‘समाजवाद’ शब्द भारत के संविधान में रह तो गया पर क्या सरकारों ने समाजवाद की विचारधारा के अनुरूप काम किया? इसका जवाब कोई बहुत मुश्किल नहीं है। भारत में समाजवाद हमेशा एक फैंसी शब्द रहा है, जिसे व्यवहार में आजमाने की कोशिश कुछ नेताओं ने निजी तौर पर जरूर की लेकिन सरकारी कामकाज के तौर पर ज्यादातर नारे ही दिए गए। जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनसंघ के नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी का गठन किया तो ‘गांधीवादी समाजवाद’ को अपनी पार्टी के एजेंडे में शामिल किया। गांधीवादी समाजवाद की बात करने वाले अटल बिहारी वाजपेयी तीन बार प्रधानमंत्री बने। परंतु 13 दिन की पहली सरकार में ही बहुराष्ट्रीय ऊर्जा कंपनी एनरॉन के प्रोजेक्ट को मंजूरी देकर उन्होंने बता दिया था कि गांधीवादी समाजवाद से उनकी क्या मुराद है। 1980 के बाद समाजवाद के सिद्धांतों पर बनी पार्टियों के नेता प्रधानमंत्री भी बने। पर उनकी सरकार इतनी लूली-लंगड़ी थी कि उनसे क्या उम्मीद की जाती!

इसके बावजूद हाल के दिनों तक एक नीति, सिद्धांत के नाम पर, एक विमर्श के तौर पर समाजवाद की चर्चा होती थी। इसे एक बड़ा राजनीतिक मूल्य माना जाता था। अगर कोई भारत की राजनीतिक पार्टियों का विश्लेषण करे तो यह दिलचस्प आंकड़ा निकल सकता है कि समाजवादी या जनता नाम की पार्टियां ज्यादा बनी हैं या कांग्रेस नाम की! बहरहाल, देश की मौजूदा सरकार ने गांधीवाद, समाजवाद या गांधीवादी समाजवाद को हमेशा के लिए तिलांजलि दे दी है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की मिश्रित अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से खत्म करके सरकार सब कुछ पूंजीपतियों के हाथ में देने के रास्ते पर चल रही है। न सिर्फ चल रही है, बल्कि डंके की चोट पर इसका ऐलान भी कर रही है।

भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कुछ समय पहले कहा था कि ‘किसी भी बिजनेस में रहना सरकार का बिजनेस नहीं है’। वाणिज्य मंत्री ही रेल मंत्री भी हैं और प्रधानमंत्री के बार बार यह कहने के बावजूद कि रेलवे का निजीकरण नहीं होगा, रेलवे को निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। छह हवाईअड्डे एक ही कंपनी को देने के बाद नागरिक विमानन मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा है कि सरकार को विमान उड़ाने या एयरपोर्ट चलाने के काम में नहीं रहना चाहिए। इन दोनों से पहले सरकार के आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल ने एक इंटरव्यू में कहा था कि सरकार सार्वजनिक उपक्रमों को बेचेगी और इसे लेकर कोई शर्मिंदगी या हिचक की बात नहीं है। यानी खुलेआम सरकारी संपत्तियों को बेचा जाएगा, क्रोनी पूंजीवाद को बढ़ावा दिया जाएगा और ‘सरकार को किसी बिजनेस में नहीं होना चाहिए’, इस फैंसी लाइन के जरिए इसे जस्टिफाई भी किया जाएगा।

असल में यह समाजवाद के प्रति नासमझी है या उसके लिए प्रतिबद्धता की कमी है, जो सरकार के मंत्री और नेता सेवा के लिए शुरू किए गए कामों को भी बिजनेस समझते हैं। भारत में विमानन सेवा बिजनेस के लिए नहीं शुरू हुई थी। निजी कारोबारी समूह टाटा से लेकर सरकार ने इसे शुरू किया तो उसका मकसद देश के लोगों को एक सेवा देना था। इसी तरह अंग्रेजों ने रेलवे की शुरुआत भारत के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए की थी, लेकिन आजादी के बाद भारत सरकार ने इसे एक सेवा के तौर पर चलाया ताकि देश के करोड़ों-करोड़ लोगों को यातायात की सस्ती सुविधा मुहैया कराई जा सके। इसी सोच के साथ सभी राज्यों ने अपनी परिवहन सेवा भी चलाई। इन सबको कहीं भी बिजनेस नहीं कहा गया है। इनके नाम के साथ सेवा शब्द लगा है। इस सरकार के लोगों ने पहले तो इन सेवाओं को बिजनेस कहना शुरू किया और उसके बाद इसे बेचने लगे। सवाल है कि अगर यातायात की सस्ती सेवा देना बिजनेस है तो सरकारी स्कूल और अस्पताल चलाना भी बिजनेस है, फिर उसमें भी सरकार को क्यों रहना चाहिए?

असल में सरकार जो कर रही है उसका किसी सिद्धांत से कोई लेना-देना नहीं है। यह सिर्फ चुनिंदा उद्योगपतियों को देश की सारी परिसंपत्तियां और सारे प्राकृतिक संसाधन सौंप देने का खेल है। धरती, आकाश और पाताल की सारी चीजें चुनिंदा कंपनियों के हाथों में देना का खेल है। सारे खनिज उत्पाद और खदान निजी कंपनियों को दिए जा रहे हैं। पूरा आसमान उनके लिए खोल दिया गया है। यात्री विमान से लेकर लड़ाकू विमान और सेटेलाइट तक सब उनको सौंपा जा रहा है। धरती पर तो खैर सब कुछ चुनिंदा कंपनियों को दिया ही जा रहा है। तर्क के लिए कहा जा सकता है कि सरकार करोड़ों लोगों को मुफ्त अनाज दे रही है। पर वह लोगों को उनके अधिकार के तौर पर नहीं मिल रहा है वह सरकार माईबाप की कृपा से मिल रहा है, जिसे सरकार जब चाहे बंद कर देगी। यूपीए की सरकार ने समाजवाद के दिखावे के लिए राइट बेस्ड यानी अधिकार आधारित नीतियां बनाई थीं पर मौजूदा सरकार ने उन सबको खत्म करने का फैसला कर लिया है।

मुश्किल यह है कि भारत अभी समाजवाद के दौर से बाहर नहीं निकला है और पूंजीवाद उस तरह से मजबूत नहीं हुआ है, जिस तरह से अमेरिका और यूरोप में हैं। यहां पूंजीपतियों की कोई जिम्मेदारी व्यक्ति, समाज या देश के प्रति नहीं है। वे सिर्फ लूट कर अपना घर भरने की नीति जानते हैं। तभी यहां कैपिटलिज्म नहीं क्रोनी कैपिटलिज्म है। अगर उनके भरोसे सरकार अपने को सारी सेवाओं से अलग कर रही है तो बहुत बड़ा धोखा होगा। समूचा देश औंधे मुंह गिरा मिलेगा। गोरख पांडे ने बहुत पहले एक कविता लिखी थी कि ‘समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई’। उन्होंने जब लिखा- नोटवा से आई, वोटवा से आई, बिड़ला के घर में समाई, समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई। तब उनको उम्मीद थी कि बिड़ला भी एक दिन समाजवादी हो जाएंगे पर यहां उलटा हो गया, यहां सरकार ही अपना पूरा समाजवाद लिए-दिए अंबानी-अदानी के क्रोनी कैपिटलिज्म में समा गई।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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