दुस्साहस भरी दलीलें

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केंद्र सुप्रीम कोर्ट में कहा कि उसकी वैक्सीन नीति उपलब्धता और जोखिम के मूल्यांकन पर आधारित है। यह नीति न्यायसंगत, भेदभाव से मुक्त और दो आयु वर्ग समूहों (45 से अधिक और नीचे वाले) के बीच एक समझदारी भरे अंतर पर आधारित है। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 के अनुसार है। यह विशेषज्ञों, राज्य सरकारों और वैक्सीन निर्माताओं के साथ परामर्श और चर्चा के कई दौरों के बाद तैयार की गई है। इसलिए इस नीति में न्यायालय के किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। केंद्र जोर दिया हैकि महामारी से निपटने के दौरान कार्यपालिका के पास जन हित में फैसले लेने का अधिकार है। ये तमाम तर्क गौरतलब हैं। ये बात तो ठीक है कि केंद्र के पास ऐसे हालात में फैसले लेने का हक है। असल में ऐसे निर्णय कार्यपालिका के दायरे में ही आते हैं। आदर्श स्थिति यही होनी चाहिए कि ऐसे मामलों में कोर्ट दखल ना दे। फिर भी कोर्ट में ये मामला गया और सुप्रीम कोर्ट ने कुछ कड़े सवाल पूछे, तो ये सवाल भी जायज है कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आई?

वो इसलिए आई क्योंकि केंद्र का प्रक्रियागत तर्क भले सही हो, लेकिन उसके पहले जो बातें उसने कही हैं, उनकी अतार्किकता अब पूरी तरह बेपर्द हो चुकी है। वैक्सीन नीति में अगर अलग-अलग मूल्य दर को इजाजत दी गई हो, तो आखिर उसे भेदभाव से मुक्त कैसे कहा जाएगा? यह समझदारी पर आधारित है, ये दावा भी दुस्साहसी ही है। ये तथ्य नहीं भूलना चाहिए कि आजादी के बाद जिन महामारियों पर भारत ने काबू पाया, उनके मामले में टीकाकरण की एकरूप नीति लागू की गई थी। तब देश के पास संसाधन कम थे, फिर भी टीकाकरण मुफ्त में किया गया। नतीजा हुआ कि देश को प्लेग, चेचक, मलेरिया, पोलियो आदि जैसे रोगों से काफी हद तक मुक्ति मिली। प्रश्न है कि अगर तब आज जैसी नीति अपनाई गई होती, तो क्या उन रोगों को उन्मूलन संभव था? ये सरकार इतिहास से कुछ नहीं सीखती। लेकिन वह वर्तमान से भी सबक नहीं लेती। आखिर दुनिया भर के देश- चाहे वो धनी हों या गरीब- कोरोना संक्रमण रोकने के लिए समरूप टीकाकरण की नीति पर क्यों चल रहे हैं? चूंकि सरकार के पास इन सवालों के जवाब नहीं हैं, इसलिए उसके दावों पर किसी को भरोसा नहीं है। बाकी सब कुछ उसके ही हाथ में है, ये तो सबको मालूम है।

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साभार - ऐसे भी जानें सत्य

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